वो राजू श्रीवास्तव ही थे, जो बम से भी गुफ्तगू कर लेते थे…

Raju Srivastava Passes Away

90 के दशक के शुरुआती साल की बात होगी. ऑडियो कैसेट का दौर था. जेब खर्च के लिए मिलने वाले पैसे से कैसेट खरीदने का चस्का लग चुका था. इलाहाबाद में सिविल लाइंस में एक बड़ी दुकान थी. मुझे पुराने फिल्मी गाने, गजलें, कव्वालियां सुनने का शौक था. उस दुकान में अच्छा संगीत चलता भी रहता था. मुझे याद है एक रोज उस दुकान में संगीत की बजाए कुछ और ही चल रहा था. एक कलाकार किसी गंवई परिवेश वाले व्यक्ति की नकल में बता रहा था कि वो शहर से शोले देखकर आया है.

मामला दिलचस्प लगा. मैं भी खड़ा होकर सुनने लगा. हंसी भी आ रही थी. जब उस कलाकार ने बताया कि किस तरह स्क्रीन पर सिक्का फेंकने के चक्कर में उसे थप्पड़ पड़ गए. किस तरह हॉल में एक आदमी टॉर्च लेकर घूम रहा था. टिकट को ‘टिकस’ जैसे उच्चारण से भी देसी बोली झलक रही थी. मैंने वो कैसेट खरीद लिया. वो कलाकार राजू श्रीवास्तव थे और ये मेरा राजू श्रीवास्तव से पहला परिचय था. इससे पहले उन्होंने कुछ बड़ी फिल्मों में छोटे रोल जरूर किए थे, लेकिन वो किरदार नोटिस नहीं हुए थे.

आवाज की दुनिया से टीवी के परदे पर पहुंचे राजू

इसके बाद राजू टीवी के कार्यक्रमों में एक बड़े कॉमेडियन के तौर पर नजर आए. इस बीच उन्होंने कुछ और फिल्में कीं, कुछ टीवी शो में हिस्सा भी लिया, लेकिन उनकी बड़ी पहचान बनी कॉमेडी शो से. राजू की कॉमेडी अलग थी. उस कॉमेडी में ‘ऑब्सरवेशन’ का कमाल था. वो निर्जीव चीजों में जान डाल देते थे. किसी भी किरदार को जीवंत कर देते थे. आप इसे ‘पर्सोनफाइ’ कह सकते हैं. तभी तो राजू श्रीवास्तव बम से भी बात कर लेते थे.

आप उनकी वो स्किट याद कीजिए- बम मेरे पास आए और कहने लगे- मैं बम हूं फट लूं… मैंने कहा अब आ ही गए हो तो फट लो.

अपने समकालीन कॉमेडी कलाकारों से वो इस कसौटी पर कोसों आगे थे. राजू अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी ये खासियत ही उन्हें बरसों-बरस जीवित रखेगी.

राजू के कई किरदार कमाल के थे

राजू श्रीवास्तव का गजोधर बहुत हिट हुआ. तमाम दूसरे किरदार भी लोगों ने पसंद किए, लेकिन राजू की खासियत थी उनके निर्जीव कलाकार. उनके किरदार में झालर का बल्ब था. प्लेट में रखा रसगुल्ला था. ऐसे किरदार कोई सोच नहीं सकता. लेकिन राजू अपनी बोली, अपने चेहरे के हाव-भाव से इन किरदारों में जान डालते थे.

दीपावली की झालर का जलना और बुझना… शादी की दावत में प्लेट में पड़े व्यंजनों का आपस में बात करना. और तो और सड़क के बिल्कुल बीचों बीच बैठे जानवर का ‘हॉर्न’ बजाने पर ‘रिएक्शन’. ये सब कुछ राजू श्रीवास्तव के बेमिसाल ‘ऑब्सरवेशन’ का नतीजा था. ये उनके ‘ओरिजिनल’ आइटम थे. आप राजू श्रीवास्तव की मेहनत के बारे में सोचिए, कैसे उनकी आंखे और चेहरे के हाव भाव झालर में तब्दील हो जाते थे.

मुर्गे की तस्वीर बनानी है तो मुर्गे के साथ रहना होगा…

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी. एक राजा ने कलाकारों से मुर्गे की तस्वीर बनाने को कहा. एक बुजुर्ग कलाकार ने कहा कि मुर्गे की तस्वीर बनाने में कई साल लग जाएंगे. राजा ने चौंक कर कहा कि आप इतने बड़े कलाकार हैं और मुर्गे की आसान सी तस्वीर बनाने में कई साल का समय लेंगे? कलाकार का जवाब था- जहांपनाह तस्वीर तो मैं मिनटों में बना दूंगा लेकिन मुर्गे को समझने के लिए पहले मैं महीनों तक उनके साथ ही रहूंगा. उन्हें समझूंगा.

बाद में उस कलाकार ने मुर्गे की जो तस्वीर बनाई उसे देखकर असली मुर्गे भी उसके साथ चहलकदमी करते दिखे. इस कहानी का सार विषय को समझने का था. राजू श्रीवास्तव की यही सबसे बड़ी खूबी थी.