दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार प्रथा संबंधित याचिका पर 11 अक्टूबर को फाइनल सुनवाई करेगा SC

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 36 साल पुराने मामले की जांच को खत्म करने के लिए तारीख मुकर्रर कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कल अपने आदेश में कहा कि वह उस याचिका पर 11 अक्टूबर को फाइनल सुनवाई करेगा जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार करने वाली प्रथा के मुद्दे को उठाया गया है. […]

दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मामले का निपटारा अक्टूबर में कर सकता है सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 36 साल पुराने मामले की जांच को खत्म करने के लिए तारीख मुकर्रर कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कल अपने आदेश में कहा कि वह उस याचिका पर 11 अक्टूबर को फाइनल सुनवाई करेगा जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार करने वाली प्रथा के मुद्दे को उठाया गया है. जस्टिस एसके कौल के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि वह इस बात की पड़ताल करेगा कि क्या दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा संविधान के तहत ‘संरक्षित’ है या नहीं.

जस्टिस एसके कौल की अगुवाई वाली पीठ में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस एएस ओका, जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी भी शामिल हैं. पीठ को बताया गया कि बंबई बहिष्कार रोकथाम कानून 1949 रद्द कर दिया गया है और महाराष्ट्र सामाजिक बहिष्कार से लोगों का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2016 लागू हो गया है.

सामाजिक बहिष्कार निषिद्ध

2016 के इस कानून की धारा तीन में समुदाय के एक सदस्य का 16 प्रकार से सामाजिक बहिष्कार किए जाने का उल्लेख है और धारा चार में कहा गया है कि सामाजिक बहिष्कार निषिद्ध है और ऐसा करना अपराध है और इसके तहत सजा का प्रावधान भी किया गया है. इन 16 में से एक प्रकार समुदाय से किसी सदस्य के निष्कासन से संबंधित है.

पीठ यह फैसला भी करेगा कि किसी सदस्य के बहिष्कार के परिणामस्वरूप पूजा स्थलों में प्रवेश पर रोक के अलावा, सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा.

2004 में 5 जजों की पीठ को भेजा गया मामला

शीर्ष अदालत की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 1962 में फैसला सुनाया था कि बंबई बहिष्कार रोकथाम कानून 1949 संविधान के अनुरूप नहीं है. बाद में, 1986 में एक याचिका दायर कर 1962 में सरदार सैयदना ताहिर सैफुद्दीन साहेब बनाम बंबई राज्य के मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया था.

1994 में, दो जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई सात जजों की पीठ द्वारा करने का निर्देश दिया. लेकिन करीब 10 साल बाद 2004 में, देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले की जांच पहले पांच जजों की पीठ द्वारा की जानी चाहिए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि इसके लिए सात जजों की पीठ के पास भेजने की जरुरत है या नहीं.

दिसंबर 2004 में, शीर्ष अदालत ने कहा था कि मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए रखा जाना चाहिए, न कि सात जजों की बड़ी पीठ के समक्ष.

इनपुट- एजेंसी/भाषा

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