Tour of Duty: भावी रोजगार के लिए 4 साल बाद अग्निवीरों को फिर से कुशल बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी

Indian Army Soilder

Lt General Rakesh Sharma: इस योजना के तहत, चार साल की सैन्य सेवा के बाद रिटायर हुए हजारों पूर्व सैनिकों की समस्या का समाधान करने की जरूरत है. साथ ही इसे सेना में भर्ती सिस्टम को संतुलित बनाने की आवश्यकता है. सशस्त्र बलों (Indian Armed Forces) में ज्यादातर भर्तियां ग्रामीण भारत से होती हैं. कई राज्यों में, विशेष रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे इलाकों में, कई पीढ़ियों ने सालों से सेना में सम्मानपूर्वक अपनी सेवा दी है. पिछले युद्धों की वीरता की कहानियां लोक कथाएं हैं, और कई सड़कें और गांव ऐसे हैं जो सेना में सर्वोच्च बलिदान देने वाले के नाम पर हैं. सशस्त्र बल, पहली पसंद का पेशा है. 60,000 सेना रिक्तियों की भर्ती रैलियों में सालाना हजारों युवा शामिल होते हैं. वे अपनी पेंशन और सम्मानजनक रिटायरमेंट के लिए 15, 17 या 19 साल तक सेवा करते हैं.

सरकार की प्रस्तावित टूर ऑफ ड्यूटी (Tour of Duty) इनटेक योजना में लगभग 40,000 लोगों की भर्ती करने की योजना है. भर्ती किए युवा 15 से 19 साल के बीच के बजाय केवल चार साल के लिए सेवा देंगे. यह सेना के उम्मीदवारों को बहुत प्रभावित करेगा. सरकार निर्णय पर पहुंच गई है. इस मुद्दे पर प्रिंट, ऑडियो-विजुअल और सोशल मीडिया वगैरह में बहस जारी है.

ऐसे में इस योजना के औचित्य की जांच करना महत्वहीन है और आलोचना अनावश्यक है. हालांकि, इसके व्यापक प्रभाव पर विचार किया जाना आवश्यक है, और योजना को सफल बनाने के लिए पूरे दिल से प्रयास करने के लिए व्यावहारिक सिफारिशें की जानी चाहिए. इसके कार्यान्वयन को लेकर तीन आवश्यक पहलूओं पर ध्यान देना चाहिए. सबसे पहले, कोई दूसरा रास्ता उपलब्ध नहीं होने के कारण, सेना में शामिल होने के इच्छुक उम्मीदवारों की संख्या पर्याप्त होगी. वे स्थायी सैनिक बनने या अवधि पूरी होने के बाद पेमेंट हासिल करने की उम्मीद में आएंगे. इसके अलावा, संगठन वैकल्पिक नौकरी के लिए प्लेसमेंट की सुविधा प्रदान कर सकता है.

टूर ऑफ ड्यूटी (TOD) कर्मियों के साथ भी कमांडिंग ऑफिसर पहले की तरह काम करते रहेंगे. नियंत्रण रेखा पर पोस्टिंग करते समय, बैट (BAT) की कार्रवाइयों, गश्त और घात लगाकर घुसपैठ को रोकने के लिए और अप्रिय घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया के लिए, बड़ी संख्या में सैनिकों की आवश्यकता बनी रहेगी. कमांडिंग ऑफिसर या एक सब-यूनिट कमांडर के लिए, एक टीओडी सैनिक (अग्निवीर) और एक स्थायी सैनिक के बीच कोई अंतर नहीं होगा, दोनों को एक साथ और एक साथ काम करना होगा.

ऐसे में चार साल के लिए एक सम्मानजनक, पारदर्शी और सरल तरीका बनाना बिल्कुल अनिवार्य हो जाता है. गलत काम या पक्षपात के सवाल लाजिमी होंगे. इन पर ध्यान देने की जरूरत है और एक ऐसी प्रणाली तैयार की जानी चाहिए जो पूरी निष्पक्षता अपनाएं. स्थायी होने वाले सैनिक के मामले में, उसकी संविदात्मक सेवा को उसके अंतिम लाभों में शामिल किया जाना चाहिए, ऐसा न हो कि हालात मुकदमेबाजी वाले बन जाए. विशेष रूप से, यदि किसी कारण से, उसकी पेंशन योग्य सेवा कम रह जाती है.

टीओडी के बाद संविदा-सैनिक के लिए सबसे अच्छा विकल्प पुलिस/सीएपीएफ या इसी तरह की सेवा में शामिल होना हो सकता है. पैरामिलिट्री फोर्स में चार साल की ट्रेनिंग, अनुभव, अनुशासन और टीम भावना का बहुत महत्व होगा. लेकिन ऐसा होना संभव नहीं लगता! अनुबंध की समाप्ति पर, चार साल की सेवा के बाद, एक सैनिक को प्रति माह करीब 40,000 रुपये का वेतन मिलेगा. युवाओं के लिए इसे अच्छा माना जा सकता है, खासकर तब, जब कोई युवा सुरक्षा कंपनियों के गार्ड या एक सफेदपोश नौकरी करता है.

TOD कमीशन खत्म होने के बाद क्या?

इस सेवा से ‘त्वरित फायदा’ हासिल के प्रयास से बचने के लिए, संबंधित संस्थाओं में व्यक्तिगत रुचि के अनुसार दोबारा कौशल तैयार करने के तरीके विचार करना आवश्यक है. इसकी लागत भी किफायती होगी. इसमें एक सेवरेंस पैकेज (ऐसी रकम जो सेवा अवधि पूरी होने के बाद मिलती है) होगा, जो दस लाख रुपये या अधिक से अधिक होने की संभावना है, जिसका उपयोग कोई छोटा कारोबार शुरू करने के लिए किया जा सकता है.

सेना, विभिन्न बैंकों के साथ एमओयू करती है (तीन साल में एक बार). इनमें अनुबंध की समाप्ति पर टीओडी सैनिकों के लिए, कारोबारी लोन की सुविधा के लिए बैंकों से एक समझौता शामिल होना चाहिए. अनुबंध के बाद सैनिकों की एक बड़ी संख्या वेतनभोगी रोजगार की तलाश करेगी, जहां दोबारा कौशल हासिल करने से मदद मिलेगी. चौथे वर्ष के बाद 40,000 वार्षिक इनटेक और 30,000 डिस्चार्ज के साथ, 2027 तक, सेवा में अग्निवीरों की संख्या 1,60,000 हो जाएगी और यह आंकड़ा स्थिर रहेगा.

‘रिटायर्ड’ टीओडी कर्मियों के लिए विकल्प तैयार करने की जरूरत

2032 तक सेना में भर्ती होने वाले अग्निवीरों की संख्या (चयन प्रक्रिया के बाद) 60,000 होनी चाहिए. पेंशन पाने वालों सहित सालाना रिटायर होने वालों की कुल संख्या करीब 90,000 होगी. मौजूदा अनुमानों के अनुसार, पुनर्वास महानिदेशालय (डीजीआर), एमओडी, हर साल 10,000 नई नौकरियां प्रदान करता है, उसे कुल मिलाकर 35,000 सालाना नौकरियां पैदा करना होगा. इसके अतिरिक्त, आर्मी वेलफेयर प्लेसमेंट ऑर्गनाइजेशन (AWPO) 10,000 लोगों को, IN करीब 3,000 और AF लगभग 2,000 लोगों को नौकरियां देंगे. डिफेंस सिक्योरिटी कोर भी 5,000 कर्मियों को नौकरी देगा.

सामान्य रूप से रिटायर हुए सैनिकों के अलावा सभी टीओडी कर्मियों के रोजगार के लिए डीजीआर और एडब्ल्यूपीओ द्वारा एक ठोस प्रयास की आवश्यकता होगी. ये अवसर सरकारी और निजी क्षेत्रों में पैदा किए जा सकते हैं. एक सशस्त्र बल अनुबंध भी होना चाहिए, जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों को टीओडी सैनिकों के लिए 5-10 फीसदी नौकरियों को आरक्षित करने की व्यवस्था करता हो. किसी उद्योग विशेष द्वारा मांगे गए कौशल के अनुसार, पहले से योजना बनाई जा सकती है.

ऑल इंडिया ऑल क्लास इनटेक (AIAC) भर्ती के बारे में क्या?

दूसरा मुद्दा, ऑल इंडिया ऑल क्लास इनटेक (AIAC) भर्ती का है. नई नीति देश भर इस भर्ती को संतुलित करेगी. हालांकि, इसका बड़ी संख्या में सिंगल क्लास यूनिट और सब-यूनिट वाले लोगों, जिनमें से कई सैनिकों के पास स्वतंत्रता पूर्व और उसके बाद के युद्धों का इतिहास है, पर प्रभाव पड़ेगा. एआईएसी के संतुलन के साथ, बेस रिक्रूटमेंट पैटर्न को ध्यान में रखते हुए, सेना के लिए उसी क्षेत्र आधारित रेजीमेंटों और इकाइयों में बने रहना तर्कसंगत और अच्छा हो सकता है.

यह वहीं प्रभावी होगा, जहां एआईएसी में समय के साथ धीरे-धीरे ट्रांजिशन होगा. 2032 तक, पूरी सेना में 1,60,000 एआईएसी अग्निवीर और 60,000 सैनिक शामिल हो जाएंगे. जब योजना को अंतिम रूप दे दिया जाएगा, तो आंकड़े भिन्न हो सकते हैं. गणना से पता चलता है कि यह आज की सिंगल क्लास यूनिट में एक से कम सब-यूनिट एआईएसी हो सकती है. इसलिए यह दोहराया जा रहा है कि सिंगल क्लास यूनिट या सबयूनिट (जैसे बख्तरबंद रेजिमेंट में स्क्वाड्रनों की संरचना) की रेजिमेंटल संस्कृति पहले की तरह जारी रहनी चाहिए, एआईएसी को इसके हिस्से के तौर पर शामिल करना चाहिए.

जैसा कि वर्तमान में है, करीब 10 फीसदी सिंगल क्लास यूनिट AIAC के तौर पर हैं. यह अनुमान लगाया गया है कि दस वर्षों में, यूनिट के संगठन और सेना के चरित्र पर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा.

क्या यह सेना को और मजबूत बनाने में मदद करेगा?

तीसरी मुद्दा, सेना की मजबूती का है. पिछले दो वर्षों की भर्ती में कमी को पूरा करने की पद्धति का अभी तक प्रचार-प्रसार नहीं किया गया है. कम हुई भर्ती, मैनपावर की मौजूदा कमी को और बढ़ाएगी. इसके लिए सरकार द्वारा तय की गई अधिकतम सीमा तक, संख्या के लिहाज से सेना को मजबूत करने की जरूरत पड़ सकती है.

भारत के दो विरोधी हैं, जिनकी सीमाएं विवादित हैं और उनके बीच गहरी मिलीभगत है. मार्डन वायफेयर में निवेश, एक प्रमुख आवश्यकता है. इनमें रॉकेट/मिसाइल, ड्रोन/काउंटर-ड्रोन, नए और आधुनिक प्लेटफॉर्म, साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे डोमेन शामिल हैं. इनमें से अधिकतर डोमेन सेना के दायरे में नहीं आते हैं।

साथ ही तीनों सेवाओं का एकीकरण, सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है. इसलिए सेना को प्रभावशाली और मजबूत (ऑप्टिमाइजेशन) बनाना अनिवार्य है. ‘हम कैसे लड़ेंगे’, किसके साथ लड़ेंगे, किस हद तक लड़ेंगे और इसके लिए किन क्षमताओं की आवश्यकता होगी, इन बातों को ध्यान में रखना होगा. तेजी से बदलते सैन्य तकनीकी परिवर्तनों के व्यापक दायरे के तहत, इन सभी पर ध्यान देना चाहिए. इसलिए ऑप्टिमाइजेशन, तीन सेनाओं को ध्यान में रखता है और एक की कमी को दूसरी सेना पूरी करती है.

टीओडी और एआईएसी से अधिक, सैन्य बल के ऑप्टिमाइजेशन की स्टडी सबसे अहम है. संक्षेप में, तर्क को एक तरफ रखते हुए, गंभीर चुनौतियों के युग में, टीओडी के दूरगामी प्रभाव हैं. इसलिए इस योजना प्रभावशाली बनाने के लिए समग्र रूप से इसके प्रभावों पर विचार करने और पूरी प्रक्रिया को पेशेवर व निर्बाध बनाने की आवश्यकता है! इससे ऊपर उठकर, आर्मी और तीनों सेनाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सेना पहली पसंद का करिअर बनी रहे, हमारा देश और उसकी चुनौतियां, यही मांग करती हैं.

(लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ) राकेश शर्मा को 1977 में गोरखा राइफल्स में कमीशन दिया गया था, और उनका सेना में चालीस साल का करियर रहा. वह मानव संसाधन प्रबंधन के लिए जिम्मेदार, भारतीय सेना के एडजुटेंट जनरल थे और 2017 में रिटायर हुए.)

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