Tour of Duty: गेम चेंजिंग रिफॉर्म साबित होगा सेना की नई पहल

Tour Of Duty

पिछले साल की ही तो बात है जब 29 अगस्त 2021 को देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक ट्वीट कर बताया था कि उनका मंत्रालय Tour of Duty पर गंभीरता से विचार कर रहा है, जो उनकी समझ से आगे जाकर एक Game Changing Reform के रूप में तब्दील होगा. इससे सेना की औसत उम्र को कम करने में मदद मिलेगी और उन्हें और अधिक सशक्त बनाया जा सकेगा. ठीक नौ महीने बाद अब वो घड़ी आ गई है, जब सेना में भर्ती के लिए भारत सरकार एक नई प्रक्रिया एक नई योजना लेकर आई है. नाम है इसका अग्निपथ प्रवेश योजना (Agneepath Recruitment Scheme). इसके तहत सेना में भर्ती प्रक्रिया का नाम होगा ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ जिसके तहत युवाओं को 4 साल के लिए सेना में भर्ती किया जाएगा. इन्हें ‘अग्निवीर’ के नाम से पुकारा जाएगा. कहने का मतलब यह कि आजादी के बाद से लेकर अब तक भारतीय सेना में सीधी भर्तियों की जो प्रक्रिया चली आ रही थी वो आने वाले वक्त में पुरानी कहानी बन जाएंगी.

तकनीक से लैस सैन्य ताकत वक्त की मांग

2014 में जब देश में सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तभी से वो इस बात के संकेत दे रहे थे कि देश को चुस्त बलों की ज़रूरत है. देश को आधुनिक तकनीक आधारित सेना चाहिए न कि लोगों की दिलेरी पर निर्भर सेना. भारत जैसे देश को उस सैन्य क्षमता की जरूरत है, जिसमें युद्ध आसानी से जीता जा सके न कि युद्ध को लंबा खींचा जाए. समय-समय पर सेना के मौजूदा अधिकारी, सेवानिवृत्त अधिकारी और रक्षा मामलों के जानकार भी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि 21वीं सदी में भारतीय सेना को तकनीक से लैस होना चाहिए, जो तत्काल कार्रवाई कर सके. खासतौर से भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में यह और जरूरी है. क्योंकि परमाणु हथियारों की वजह से अब पारंपरिक युद्ध संभव नहीं है. लिहाजा सबसे पहले सेना के आकार को कम करना होगा. क्योंकि बड़ी सेना गुणवत्ता पर भारी पड़ती है. हमें गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है. भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और रक्षा बजट को लगातार बढ़ाना मुमकिन नहीं है. ऐसे में सेना में लोगों की तादाद को कम करने के फॉर्मूले पर आगे बढ़ना होगा.

गेम चेंजिंग रिफॉर्म साबित होगा सेना की नई पहल

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सेना में अभी जितने लोग हैं, उसमें कमी लाने की पूरी गुंजाइश है. भारत दुनिया के उन देशों में से एक है, जहां सेना में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है. और हालत यह है कि भारत के रक्षा बजट का आधा से ज्यादा हिस्सा सैन्य कर्मियों की सैलरी और पेंशन बिल देने में खर्च हो जाता है. लिहाजा सेना के आधुनिकीकरण और उपकरणों के लिए पैसे बहुत कम बचते हैं. चीन भी अपने रक्षा बजट का एक तिहाई ही सैनिकों की सैलरी पर खर्च करता है, जबकि भारत 60 प्रतिशत करता है. चीन का पूरा जोर तकनीक पर है और वह लोगों की तादाद लगातार कम कर रहा है. ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स की मानें तो भारत की सेना दुनिया की चौथी सबसे मजबूत सेना है. भारत से बेहतर सेना के मामले में अमेरिका, रूस और चीन अभी भी आगे हैं. ऐसे में भारत की सरकार भी अगर अपनी सैन्य क्षमता को तकनीकी तौर पर मजबूत करने की योजना पर आगे बढ़ रही है तो राजनाथ सिंह की कही वो बात सच साबित होगी कि ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ आगे जाकर ‘गेम चेंजिंग रिफॉर्म’ में तब्दील होगा.

क्या है नई भर्ती प्रक्रिया ‘टीओडी’ का रोडमैप

भारतीय सेना में करीब सात दशकों से चली आ रही खुली भर्ती प्रक्रिया को हम देखते आ रहे हैं, लेकिन टूर ऑफ ड्यूटी के तहत जो नई भर्ती प्रक्रिया अपनाई जाएगी उसके बारे में जानने की उत्सुकता लोगों में बहुत ज्यादा है. टीओडी यानी टूर ऑफ ड्यूटी के बारे में अभी तक मोटे तौर पर जो जानकारी निकलकर आई है उसके मुताबिक, सरकार जिन युवाओं की भर्ती करेगी उसकी कार्य अवधि चार साल के लिए ही होगी. बाद में तय किया जाएगा कि इनमें से कितने लोगों को स्थायी सेवा में एंट्री दी जाए. किसे स्थायी सेवा में बहाल किया जाएगा इसका फैसला एक चयन कमेटी करेगी जिसका आधार सैनिकों की प्रोफेशनल दक्षता होगा.

जानकारों की मानें तो जिस तरह ऑफिसर रैंक में काबिलियत के हिसाब से पदोन्नति दी जाती है उसी तरह से सैनिक भी अपनी योग्यता के हिसाब से स्थायी सेवा में जगह पाएंगे. अभी भी शॉर्ट सर्विस कमिशन के तहत जो अधिकारी आते हैं उनमें से भी करीब 20-25 प्रतिशत को ही स्थायी कमीशन में जगह मिल पाती है. जो युवा टूर ऑफ ड्यूटी के तहत भर्ती होंगे उनकी छह महीने की बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग होगी. अमूमन 18 साल में युवा सेना में आएंगे और चार साल बाद 21-22 साल की उम्र में बाहर होंगे. सेना से निकलकर ये युवा सिविल और कॉरपोरेट की दुनिया में आगे का करियर बना सकेंगे जिसमें उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी.

ताकि दुनिया को भारत की सैन्य ताकत का अहसास हो

भारतीय सेना के इतिहास से पता चलता है कि प्राचीन काल से यहां युद्ध की पारंपरिक पद्धति का पालन किया जाता रहा है. दशकों से देश के लिए मर-मिटने वाले भारतीय नौजवानों में सेना में भर्ती होने का जबरदस्त क्रेज रहा है. आजादी के बाद की बात करें तो भारतीय सेना से औसतन हर साल 60 हजार कर्मी रिटायर होते हैं. सेना इन खाली पदों पर अभी तक खुली भर्तियों के माध्यम से सालाना 100 से ज्यादा भर्ती रैलियां आयोजित करती रही है और बड़ी संख्या में नौजवानों को भर्ती कर दुनिया को अपनी सैन्य ताकत का अहसास कराती रही है. इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय सेना इस बात का आश्वासन देती है और सुनिश्चित करती है कि वो देश की सीमा के प्रहरी के तौर पर हर नागरिक की सुरक्षा करेंगे. लेकिन वक्त काफी बदल चुका है.

देश आजादी के अमृत महोत्सव काल में पहुंच चुका है और ऐसे में जब बात देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता की आती है तो भारतीय सेना के सतत विकास की प्रक्रिया की तुलना दुनिया के अन्य देशों से करनी पड़ती है. अब वो वक्त नहीं रहा जब युद्ध की पारंपरिक पद्धति को जारी रखते हुए हम चीन जैसे देशों से मुकाबला कर लें. इसीलिए आजाद भारत के इतिहास में शायद पहली बार सेना में खासतौर पर भर्ती प्रक्रिया को लेकर सरकार आमूल-चूल परिवर्तन करने जा रही है. माना जा रहा है कि यह ऐतिहासिक बदलाव भारत की रक्षा प्रणाली को बेहद सशक्त बनाएगी ताकि दुनिया के देशों को भी इस बात का अहसास हो सके (खासतौर पर उन देशों को जिनकी बुरी नजर भारत की सीमा पर टिकी है) कि भारत की सैन्य ताकत दुश्मनों को का अहसास हो सके.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

Similar Posts