President Election 2022: राष्ट्रपति चुनाव में दस साल बाद गठबंधन धर्म निभाएंगे नीतीश कुमार

Nitish Kumar

18 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव (President Election) के लिए आदिवासी महिला नेता द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) को एनडीए के उम्मीदवार के रूप में पेश कर बीजेपी ने अपनी गुगली से एक और नेता को फंसा दिया है. ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के मुखिया नवीन पटनायक, जो तटस्थ थे, पहले ही ओड़िया महिला मुर्मू को समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं. उन्होंने इसे ओडिशा के लिए गर्व की बात बताया. इसके बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के लिए कोई विकल्प नहीं रह गया. और उन्होंने बीजेपी के इस मास्टरस्ट्रोक का स्वागत करते हुए मुर्मू का समर्थन करने की घोषणा की.

बुधवार को, नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट में, एक आदिवासी महिला को देश के शीर्ष संवैधानिक पद के लिए नामित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया और अपनी खुशी जाहिर की. उन्होंने खुलासा किया कि पीएम मोदी ने उन्हें फोन किया था और मुर्मू के नामांकन के बारे में पहले ही सूचित कर दिया था. इससे पहले जेडीयू के वरिष्ठ नेता राजीव रंजन (ललन) सिंह ने ट्वीट किया कि सीएम नीतीश कुमार हमेशा महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए खड़े रहते हैं, एक गरीब परिवार में जन्मी आदिवासी महिला का नाम बढ़ाने का बीजेपी का फैसला स्वागत योग्य है.

मुर्मू को समर्थन देने का जेडीयू का फैसला बीजेपी के लिए अच्छी खबर है

जबकि सोमवार तक जेडीयू बीजेपी के खिलाफ आग उगल रही थी और कई मुद्दों पर उसके साथ बढ़ते मतभेदों के कारण एनडीए से बाहर निकलने की धमकी दे रही थी. बीजेपी अब चैन की सांस ले सकती है. नीतीश कुमार अब जनादेश का मजाक उड़ाने की हैट्रिक बनाने नहीं जा रहे हैं. बीते सालों में भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार को अस्थिर रुख वाले नेता के तौर पर देखा जाता रहा है. वे बीजेपी और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बीच पाला बदलते रहे हैं. हालांकि, पाला बदलने से पहले उनका एक निर्धारित पैटर्न होता है. राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उनका रवैया, उनके भविष्य के कदम की भविष्यवाणी करने के लिए बैरोमीटर के रूप में देखा जा सकता है.


2012 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान नीतीश कुमार बीजेपी के सहयोगी थे, लेकिन उन्होंने एनडीए के उम्मीदवार पीए संगमा के बजाए कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को वोट दिया. बीजेपी के साथ गठबंधन में 2010 का बिहार चुनाव जीतने के बाद, उन्होंने 2013 में उसका साथ छोड़ दिया और आरजेडी व उसके सहयोगियों के बाहरी समर्थन से अपनी अल्पमत की सरकार चलाई. 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में, जब वे आरजेडी और कांग्रेस पार्टी के साथ महागठबंधन सरकार के सीएम थे, तब उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार राम नाथ कोविंद के पक्ष में मतदान करने का फैसला किया. जबकि कांग्रेस पार्टी ने मीरा कुमार को खड़ा किया था. जल्द ही, उन्होंने महागठबंधन को छोड़ दिया और जूनियर पार्टनर के रूप में बीजेपी से हाथ मिला लिया.


बीजेपी द्वारा द्रौपदी मुर्मू का नाम बढ़ाने से पहले नीतीश कुमार बीजेपी के खिलाफ जाने को तैयार नजर आ रहे थे. ऐसा लग रहा था कि वे बीजेपी के उम्मीदवार के खिलाफ वोट करेंगे और आरजेडी के महागठबंधन में वापसी करेंगे. हालांकि, मुर्मू के महिला होने के कारण रातों-रात हालात बदल गए. नीतीश कुमार दो बार जनादेश को धोखा दे चुके हैं. वे सत्ता में अपना साथी बदलने के बावजूद अगर बिहार के सीएम बने रहे तो इसकी वजह उनका महिला वोट बैंक है. बिहार में शराबबंदी कर उन्होंने महिला मतदाताओं के बीच एक ठोस पैठ बनाई है. एक महिला राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के खिलाफ जाना, भले ही वह बिहार की न हो, जोखिम भरा हो सकता था. वैसे भी 2020 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ काफी नीचे आ गया था. इस चुनाव में आरजेडी और बीजेपी के बाद, जेडीयू तीसरे स्थान पर रही थी. कुछ भी हो, मुर्मू को समर्थन देने का जेडीयू का फैसला बीजेपी के लिए अच्छी खबर है. क्योंकि नीतीश कुमार फिलहाल बीजेपी के सहयोगी बने रह सकते हैं. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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