2007 के बाद मायावती को फिर ब्राह्मणों की आयी याद, करेंगी वोट देने की फरियाद

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  • सतीश मिश्रा करेंगे ब्राह्मण सम्मेलन, 23 से अयोध्या से करेंगे शुरूआत
  • 2012 में मुसलमानों को तरजीह देने वाली मायावती को समझ चुके हैं ब्राह्मण

उपेन्द्र राय
लखनऊ।‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।’ का नारा देने वाली बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को 2007 के बाद फिर ब्राह्मणों की याद आ गयी है। बसपा इस बार पुनः ब्राह्मण कार्ड खेलने जा रही है। इसकी शुरूआत करने के लिए भी मायावती ने श्रीराम की नगरी अयोध्या को चुना है। सतीश मिश्रा पहला ब्राह्मण सभा करने जा रहे हैं। 29 जुलाई तक लगातार पहले फेज की ब्राह्मण सभाएं चलेंगी। 2007 में उन्होंने अपना नारा बदल कर एक नारा दिया था ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’। इसके सहारे ही बसपा 14 अप्रैल 1984 में हुए गठन के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी लेकिन वह समय कुछ और था। उसके इतिहास पर नजर डालें तो इस बार बसपा का ब्राह्मण कार्ड सफल होने की संभावना क्षीण ही दिख रही है।

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2007 के उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव व सीटों का आंकलन करें तो उससे पहले 2002 में त्रिशंकु विधानसभा थी। 3 मई 2002 को मायावती भाजपा और रालोद के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थी लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया। बसपा के कुछ बागी विधायकों व कांग्रेस के सहयोग से नाटकीय घटनाक्रम में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गये। समाजवादी पार्टी की जब भी सरकार रही अराजकता चरम पर पहुंच जाती है। उसी के बाद 2007 का चुनाव हुआ। मायावती समझ चुकी थीं कि सिर्फ दलित के भरोसे सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सतीश मिश्र को ब्राह्मण-दलित गठजोड़ के लिए मैदान में उतारा। ब्राह्मणों में उस समय शासन सत्ता को लेकर बहुत नाराजगी भी थी। भाजपा अथवा कांग्रेस की सरकार बनती नहीं दिख रही थी। बसपा ने इसका भरपूर फायदा उठाया।

2007 में 86 ब्राह्मणों को दिया था टिकट
मायावती ने वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के अंतर्गत 139 सीटों पर सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। तब बसपा ने 114 पिछड़ों व अतिपिछड़ों, 61 मुस्लिम व 89 दलित को टिकट दिया था। सवर्णो में सबसे अधिक 86 ब्राह्मण प्रत्याशी बनाए गए थे और इसके अलावा 36 क्षत्रिय व 15 अन्य सवर्ण उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे थे।

206 सीटों पर बसपा का हुआ था कब्जा
इस ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का नतीजा रहा कि 14 अप्रैल 1984 में गठित हुई बसपा को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला और 206 सीट पाकर मायावती ने सरकार बनाई। समाजवादी पार्टी को 97 सीट मिली, जबकि 2002 में 88 सीट पाने वाली भाजपा 51 सीट पर सिमट गयी। कांग्रेस 25 से 22 सीट पर आ गयी।

2012 में फेल हो गया सोशल इंजीनियरिंग
बहुजन समाज पार्टी ने वर्ष 2007 से 2012 तक बहुमत की सरकार चलायी। इस बीच वह अपने जनाधार को बचाए न रख सकी। वर्ष 2012 में उसके पांच प्रतिशत वोट कम हो गये। उसे 25.91 ही वोट मिल सका और वह सरकार से बाहर हो गयी। हालांकि वर्ष 2012 में बसपा अध्यक्ष ने इस फॉर्मूले को त्याग दिया था। बसपा ने वर्ष 2012 में सोशल इजीनियरिंग में फेरबदल किया। सवर्ण उम्मीदवारों की कटौती करते हुए मुसलमानों को तरजीह दी। बसपा ने 113 पिछड़े- अतिपिछड़े, 85 मुस्लिम, 88 दलित व 117 सवर्ण प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। सवर्णो में 74 ब्राह्मण, 33 क्षत्रिय और 10 अन्य उम्मीदवारों को टिकट दिया गया परन्तु बसपा को करारा झटका लगा था।

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