Maharashtra Political Crisis: हाल में रिलीज हुई एक फिल्म की स्क्रिप्ट में छुपी है एकनाथ शिंदे की बगावत की कहानी, सलमान खान ने किया था उस फिल्म को सपोर्ट

Eknath Shinde Pti

महाराष्ट्र के राजनीतिक उठा पठक (Maharashtra political crisis) के बीच अब जो खबर आ रही है कि 55 विधायकों की शिवसेना में 41 विधायक शिंदे गुट में शामिल हो चुके हैं. आज 8 विधायक शिंदे गुट में शामिल होने गुवाहाटी पहुंचे. आज (23 जून, गुरुवार) जो हुआ है, उसकी स्क्रिप्ट एक हाल में रिलीज हुई फिल्म की कहानी लिखे जाते वक्त ही तैयार हो चुकी थी. यह फिल्म खुद एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) ने प्रोमोट की थी. इसके ढेर सारे टिकट उन्होंने शिवसैनिकों को बांटे थे. इस फिल्म का लॉन्च करने खुद सीएम उद्धव ठाकरे पहुंचे थे. इस फिल्म के लॉन्च के वक्त बॉलीवुड स्टार सलमान खान मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे थे. उनके अलावा रीतेश देशमुख और अमिषा पटेल जैसे बॉलीवुड स्टार पहुंचे थे. ‘धर्मवीर-ठाणे मुक्काम पोस्ट’ नाम की यह मराठी भाषा की फिल्म एकनाथ शिंदे के राजनीतिक गुरु आनंद दिघे के जीवन पर बनी थी.

मुंबई से सटे ठाणे और उसके आस-पास के इलाके में शिवसेना की जड़ें फैलाने वाले नेता थे आनंद दिघे. मुंबई में जो लोकप्रियता बालासाहेब ठाकरे की थी, वही लोकप्रियता ठाणे और ग्रामीण इलाकों में आनंद दिघे की थी. स्वभाव से बगावती दिघे कई बार बालासाहेब ठाकरे के आदेशों का उल्लंघन कर जाते थे. कई पुराने शिवसैनिकों के मुताबिक बालासाहेब ठाकरे और आनंद दिघे के बीच जिस तरह का ‘कभी ठंडा, कभी गरम’ रिश्ता हुआ करता था, ठीक वैसा ही रिश्ता आनंद दिघे के शिष्य एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच रहा है.

अगर शिंदे अलग नहीं होते तो दिघे हो जाते? आखिर उद्धव ठाकरे ने फिल्म आधी ही क्यों छोड़ दी?

एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद पुराने शिवसेैनिक और अब बीजेपी के कद्दावर नेता केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने एक अहम ट्वीट किया और अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि अगर एकनाथ शिंदे बगावत नहीं करते तो उनकी भी आनंद दिघे वाला ही हाल होता. राणे यह बात याद दिलाते हैं कि आनंद दिघे की जब हत्या हुई उससे पहले ‘मातोश्री’ के दरवाजे उनके लिए बंद हो चुके थे. उन्हें शिवसेना प्रमुख से मिलने की इजाजत नहीं मिलती थी. बता दें कि उद्धव ठाकरे धर्मवीर फिल्म आधी ही छोड़ कर बाहर आ गए थे. उन्होंने कहा था कि वे इस फिल्म का क्लाइमैक्स नहीं देखना चाहते थे.

दिघे सिर्फ तेवर दिखा कर रह गए, शिष्य शिंदे का तरीका अलग है

आनंद दिघे की फिल्म में एकनाथ शिंदे की भूमिका को भी काफी प्रोमिनेंटली दिखाया गया है. एक रिक्शावाले एकनाथ शिंदे को आनंद दिघे ने राजनीति में लाकर ऊंचाई तक पहुंचाया. आनंद दिघे के बाद ठाणे और ग्रामीण इलाकों में उनका सही उत्तराधिकारी साबित करने में एकनाथ शिंदे को ज्यादा वक्त नहीं लगा. एकनाथ शिंदे अपने गुरु आनंद दिघे से कई मामले में एक जैसे हैं और कई मामलों में अलग हैं. आनंद दिघे एक धारदार नेता थे, संगठन में पकड़ रखने वाले नेता थे, उनका भाषण काफी ओजस्वी होता था. एकनाथ शिंदे की बात करें तो वे आज के संजय राउत की तरह काफी मुखर नहीं रहते हैं. वे ज्यादा बोलते नहीं हैं. लेकिन एकनाथ शिंदे की संगठन में पकड़ गजब की है, यह अब साबित भी हो गया है.

एक सबसे बड़ा फर्क यह है कि आनंद दिघे बालासाहेब ठाकरे के खिलाफ जाकर काम कर देते थे, लेकिन कभी उन्हें छोड़ कर अलग मुकाम बनाने की कोशिश उन्होंने नहीं की. वे चाहते तो एकनाथ शिंदे की तरह ऐसा कर सकते थे. एक समय में तो उनकी लोकप्रियता बालासाहेब ठाकरे के लगभग बराबर हो चुकी थी. लेकिन एकनाथ शिंदे आदित्य ठाकरे और संजय राउत के तेजी से उदय के बाद अपने आप को साइडलाइन होते हुए मूकदर्शक बनकर देखने को तैयार नहीं थे और आखिर में बगावत का बिगुल फूंक दिया.

इस तरह सामने आई मजबूरियां, जानिए क्यों आई ठाकरे परिवार से दूरियां

एकनाथ शिंदे का विद्रोह अचानक नहीं हुआ. जब बीजेपी और शिवसेना की सरकार थी तब सीएम देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें सार्वजनिक निर्माण मंत्री के तौर पर पूरी छूट दी. इस बीच वे लगातार देवेंद्र फडणवीस के करीब होते गए. कहा जाता है कि आखिरी के छह महीने में देवेंद्र फडणवीस उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाने को तैयार थे. जब शिवसेना महा विकास आघाड़ी में शामिल होकर सरकार बना रही थी तब भी एकनाथ शिंदे का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सामने आया था. तब शरद पवार उद्धव ठाकरे को ही मुख्यमंत्री के पद पर बिठाना चाह रहे थे.

इस वक्त भी शिवसेना में दो गुट साफ दिखाई दे रहा था. एक गुट का नेतृत्व एकनाथ शिंदे कर रहे थे जिनका मानना था कि बीजेपी का साथ छोड़ना एक बड़ी भूल साबित होगी. जबकि दूसरा गुट संजय राउत के साथ था जो शरद पवार के साथ जाना चाह रहा था. इसके बाद उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए. बात यहीं तक नहीं रुकी.शरद पवार के करीबी होने की वजह से संजय राउत का कद बढना शुरू हुआ. इसी बीच आदित्य ठाकरे की पर्यटन मंत्री ,पर्यावरण मंत्री , मुंबई के संरक्षक मंत्री और राज शिष्टाचार मंत्री के तौर पर एंट्री हो गई. एकनाथ शिंदे हाशिए पर चले गए.

नॉट रिचेबल ठाकरे की जगह आधी रात में भी रिचेबल बने रहे शिंदे

कोविड दौर में एकनाथ शिंदे ने चुपचाप पार्टी के संगठन में अपनी पकड़ और मजबूत बनाई. शिवसेना के कई विधायकों की यह शिकायत थी कि उनके क्षेत्रों में फंड देने में एनसीपी के उप मुख्यमंत्री अजित पवार आनाकानी करते हैं. ज्यादातर फंड एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं के खाते में जा रहे हैं. लेकिन शिवसेना के विधायकों की शिकायतों पर गौर करना तो दूर, उद्धव ठाकरे से विधायकों से मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता जा रहा था. ऐसे में शिवसेना के विधायकों को यह बात समझ आने लगी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने में शिवसेना का पार्टी के तौर पर अस्तित्व खत्म होता जा रहा है.

इसी कोविड दौर में एकनाथ शिंदे राज्य के विधायकों से आसानी से मिलते थे. आधी रात में भी उनके कॉल्स अटेंड करते थे. ना सिर्फ ठाणे और उसके आस-पास के इलाकों में बल्कि राज्य भर के ग्रामीण इलाकों के विधायकों में अपनी पकड़ मजबूत बनाते गए. यही वजह है कि शिवसेना के 41 विधायक आज एकनाथ शिंदे के खेमे मेें आ चुके हैं और सिर्फ 14 विधायक उद्धव ठाकरे के पास बचे हैं.

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