Maharashtra Political Crisis: शिंदे हिंदुत्व की बात कर रहे हैं, लेकिन इस विद्रोह के पीछे दूसरे कारण भी हैं

Eknath Shinde

एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) चर्चा में हैं. उनकी वजह से मौजूदा महाविकास आघाडी (Maha Vikas Aghadi) गठबंधन सरकार के पतन की राह पर है. इस सरकार में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस शामिल हैं. शिंदे को बीजेपी (BJP) का साथ मिला हुआ है. शिंदे के करीबियों का कहना है कि वह दिवंगत बालासाहेब ठाकरे के कट्टर अनुयायी हैं और मौजूदा सत्ताधारी सरकार के कामकाज से निराश हैं. शिंदे गुजरात में डेरा डाले हुए थे और बुधवार सुबह महाराष्ट्र के विधायकों के एक समूह के साथ, एक चार्टर विमान से बीजेपी शासित राज्य असम की राजधानी गुवाहाटी पहुंचे.

वह शहर के बाहरी इलाके में स्थिति एक लग्जरी होटल में हैं. जहां बीजेपी सांसद पल्लब लोचन दास और सुशांत बोरगोहेन की कड़ी सुरक्षा है. शिंदे का दावा है कि उनके पास 40 से ज्यादा विधायकों का समर्थन है. हालांकि, सोमवार रात शिवसेना ने उनसे संपर्क करने की पूरी कोशिश की, लेकिन शिंदे संपर्क में नहीं आए. ऐसा लगता है कि शिवसेना के नेतृत्व वाली महाविकास आघाडी टूटने की कगार पर है.

एकनाथ शिंदे क्यों नाराज हैं?

शिंदे खुद को पक्का शिवसैनिक मानते हैं और उन्होंने हमेशा शिवसेना के प्रति वफादारी दिखाई है. शिंदे का मानना है कि शिवसेना को बालासाहेब की विचारधारा का पालन करना चाहिए. लेकिन शिवसेना हिंदुत्व के अपने मूल सिद्धांत से भटक गई है. इसकी वजह उद्धव की ढाई साल के लिए सीएम बनने की महत्वाकांक्षा है. वह उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अजीत पवार के कामकाज से भी नाराज हैं. आरोप लगाया जा रहा है कि पवार ने शिवसेना विधायकों को उनके निर्वाचन क्षेत्रों की देखभाल के लिए पर्याप्त धन आवंटित नहीं किया.

शिंदे की छवि एक शांत राजनेता की है, जो जल्दबाजी में निर्णय नहीं लेते. वे काफी समय से पार्टी से नाराज हैं, क्योंकि पार्टी में आदित्य ठाकरे जैसे नए लोगों के उदय के बीच उन्हें दरकिनार किया जा रहा था. कहा जाता है कि राज्य के शहरी विकास और लोक निर्माण मंत्री के रूप में, शिंदे को अपने विभागों को चलाने के लिए खुली छूट नहीं दी गई थी. उनके विभागों में महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण भी शामिल है. शिंदे से विधायक आसानी से मिल लेते हैं. वे छगन भुजबल और नारायण राणे की याद दिलाते हैं. ये नेता शिवसेना को पहले भी तोड़ने में कामयाब रहे थे.

एकनाथ शिंदे कौन हैं?

शिवसेना का शक्तिशाली नेता बनने से पहले शिंदे ऑटो-रिक्शा चलाते थे. शिवसेना के साथ उनका जुड़ाव 1980 के दशक से है. शिंदे ने अपने बच्चों को खोने के बाद राजनीति छोड़ने का फैसला किया था, लेकिन उनके गुरु आनंद दिघे उन्हें दोबारा राजनीतिक जीवन में लेकर आए. ठाणे के नेता दीघे ने उन्हें ठाणे नगर निगम में सदन का नेता बना दिया. 2001 में दीघे की मौत के बाद शिंदे की लोकप्रियता काफी बढ़ गई. उन्होंने ठाणे और पूरे राज्य में शिवसेना को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी. महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में यह बात जगजाहिर है कि शिंदे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से नाखुश थे. वह यह भी चाहते थे कि पार्टी अकेले ठाणे नगरपालिका चुनाव लड़े, लेकिन उनकी इस मांग को नजरअंदाज कर दिया गया था.

नंबरों का खेल

महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं. एक सीट खाली है (शिवसेना के एक विधायक रमेश लटके के निधन के बाद). यानि कुल सीटें 287 है, जहां बहुमत का आंकड़ा 144 है. शिवसेना के पास 55, एनसीपी के पास 53 और कांग्रेस के पास 44 विधायक हैं. छोटे दलों और निर्दलीयों के समर्थन से, एमवीए की संख्या 169 तक आती है. बीजेपी को 109 विधायकों का समर्थन है और कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से उनके पास 114 विधायक हो जाते हैं. ‘अन्य’ में 29 विधायक हैं, जिनमें से ज्यादातर हैं निर्दलीय और छोटे दलों के लोग शामिल हैं. अब शिंदे करीब 40 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं, इसका मतलब है कि एमवीए की सरकार किसी भी क्षण गिर सकता है और बीजेपी सत्ता में आ सकती है. महाराष्ट्र में 2024 में चुनाव होने वाले हैं.

जानकार क्या कहते हैं?

मुंबई के एक सीनियर जर्नलिस्ट संदीप प्रधान ने टीवी 9 से बात करते हुए कहा कि शिंदे को उनके राजनीतिक दबदबा के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. प्रधान कहते हैं, “ठाणे शिवसेना का गढ़ है. एकनाथ शिंदे वहीं से आते हैं. वह राज्य के शक्तिशाली नेता हैं. उनके पास लोगों को पार्टी में लाने और उन्हें एक साथ रखने की कला है. ठाणे में छह नगर निगम हैं और वह इन सभी में अपना दबदबा रखते हैं.” प्रधान आगे बताते हैं, “2014 में जब शिवसेना और बीजेपी ने सरकार बनाई थी, तो फडणवीस और शिंदे के समीकरण काफी मेल खाते थे. 2019 में भी, वह बीजेपी के साथ गठबंधन करना चाहते थे. शिंदे ने सोचा था कि एमवीए सरकार में, उन्हें सीएम बनाया जाएगा. जैसा कि बालासाहेब ठाकरे ने मनोहर जोशी को सीएम बनाया था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बजाए, उन्होंने आदित्य ठाकरे को मंत्री बनाया.”


प्रधान के मुताबिक, “उन्होंने सोचा कि अगर सीएम नहीं तो उन्हें नंबर 2 बनाया जाएगा, लेकिन यह भी नहीं हुआ. अपेक्षाकृत कम जनाधार वाले संजय राउत और अनिल परब जैसे लोगों को अधिक महत्व दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार संजय अवाटे का कहना है कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार भी गठबंधन को बचाने के इच्छुक नहीं हैं. अवाटे का कहना है, “यह सरकार पहले ही गिर चुकी है. एकनाथ शिंदे एक जननेता हैं लेकिन उन्हें पार्टी में कम महत्व दिया गया. पार्टी कैडर, महाविकास अघाड़ी के विचार के खिलाफ था क्योंकि वे एनसीपी और कांग्रेस के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं थे. उनके लिए, बीजेपी ही एक स्वाभाविक पार्टनर है. यह गठबंधन कभी सफल नहीं हो सकता था, इसके कई कारण हैं. बालासाहेब के करीबी रहे कई शिवसैनिकों को शिवसेना द्वारा दरकिनार कर दिया गया.”


उद्धव की शिवसेना में रामदास कदम, आनंदराव अदसुल और दिवाकर रावटे जैसे नेताओं को कोई महत्व नहीं दिया गया. आवटे के मुताबिक, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि संजय राउत इस सरकार के निर्माता हैं, लेकिन वह जननेता नहीं हैं. एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस करीबी दोस्त हैं.” आवटे बताते हैं कि 2017 में बीजेपी ने घोषणा की थी कि वह शिंदे की वजह से ठाणे में हाथ नहीं डालेगी. इस सरकार में कई कमियां हैं, जमीनी स्तर पर एनसीपी और शिवसेना लड़ते रहते हैं. इस बार शरद पवार भी गठबंधन को बचाने को इच्छुक नहीं हैं. आवटे का कहना है, “उद्धव पार्टी कैडर के संपर्क में नहीं रहते हैं. लेकिन, मौजूदा विद्रोह बीजेपी द्वारा फंडेड और संरक्षित है, क्योंकि देवेंद्र को यह सुनिश्चित करना था कि मी पुन्हा येईन (मैं दोबारा लौटूंगा).” (खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.) (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं.)

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