Maharashtra Political Crisis: विभाजन नहीं विलय से तय होगा एकनाथ शिंदे और उनके समर्थकों का भविष्य

Eknath Shinde Profile

शिवसेना (Shiv Sena) के बागी नेता एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) और उनके 37 समर्थक पिछले कुछ दिनों से गुवाहाटी में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संपर्क में हैं. लेकिन अलगाव या विभाजन का यह तथ्य उन्हें दल-बदल विरोधी कानून के तहत आने वाली कठिनाई से तब तक नहीं बचाएगा, जब तक कि वे भाजपा में विलय नहीं कर लेते. ऐसा इसलिए क्योंकि कानून केवल विलय को मान्यता देता है, विभाजन को नहीं.

संविधान की दसवीं अनुसूची का अनुच्छेद 4 एक विधायक या संसद सदस्य को तब अयोग्यता से छूट देता है, जब उसका मूल राजनीतिक दल किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय कर लेता है, और यदि यह विलय मूल राजनीतिक दल के सदस्य और किसी अन्य सदस्य द्वारा स्वीकार किया गया हो. ऐसी स्थिति में विचाराधीन विधायक या सांसद जो पार्टी छोड़ कर गया है, दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 के तहत अपनी सदस्यता की अयोग्यता से बच जाता है और उसे उस राजनीतिक दल का सदस्य मान लिया जाता है जिस पार्टी में उसने खुद को विलय किया है.

ऐसे में संवैधानिक आवश्यकताओं के अनुसार दल-बदल विरोधी कानून की कार्रवाई से बचने के लिए पार्टी से अलग हुए समूह को दो-तिहाई निर्वाचित सदस्यों के समर्थन के साथ दूसरे राजनीतिक दल में विलय के दोहरे परीक्षण को पूरा करना होता है. यदि ये दोनों शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो दलबदल विरोधी कानून लागू हो जाता है.

साल 2003 में हुआ बदलाव

साल 2003 तक दसवीं अनुसूची ने अयोग्यता के अपवाद के रूप में एक राजनीतिक दल के भीतर कम से कम एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन को मान्यता थी, लेकिन 2003 में कानून बदल दिया गया और 1985 के एक तिहाई विभाजन और विलय के कानून को दो-तिहाई विभाजन विलय नियम से बदल दिया गया. इस मामले में नया कानून कहता है कि अयोग्यता से बचने के लिए, किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों को “विलय” के पक्ष में होना चाहिए, ताकि कानून की नजर में इसकी वैधता हो. और यदि किसी राजनीतिक दल के सदस्यों की संख्या दो-तिहाई से कम है, तो उन पर उनकी सदस्यता की अयोग्यता का खतरा मंडराने लगता है.

शिंदे के सामने विकल्प क्या है

इसलिए एकनाथ शिंदे और उनके समर्थकों के सामने अब कोई विकल्प नहीं बचा है बजाय इसके कि वे शिव सैनिक के रूप में अपनी पहचान छोड़कर बीजेपी में शामिल हो जाएं. यह एक ऐसा कदम है जिसे शिंदे और उनके समर्थक फिलहाल नहीं उठाना चाह रहे हैं. शिंदे की मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं क्योंकि शिवसेना ने पहले ही बागी दल के 12 सदस्यों के खिलाफ राज्य विधानसभा के उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल के सामने शिकायत दर्ज करा दी है.

जिसमें चीफ व्हिप सुनील प्रभु द्वारा जारी किए गए व्हिप के उल्लंघन के लिए उन विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने 22 जून को विधायक दल की बैठक बुलाई थी. अब शिंदे और उनके समर्थकों के पास बीजेपी में विलय कर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की नेतृत्व वाली सरकार गिराने या फिर अयोग्यता का सामना करने का ही विकल्प बचा है.

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