ED ने एमवे पर क्यों की कार्रवाई? जानें क्या है पूरा मामला

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प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने डारेक्ट सेलिंग कंपनी एमवे (Amway) पर बड़ी कार्रवाई की है. एजेंसी ने कंपनी की 757 करोड़ रुपए की संपत्ति (Assets) जब्त की है. यह कार्रवाई मनीलॉन्ड्रिंग (Money Laundering) एक्ट के तहत की गई है. लेकिन आखिर ये पूरा मामला क्या है और एमवे से जुड़े लोगों पर इसका क्या असर होगा. आज हम आपको बताने वाले हैं इस कंपनी की पूरी कहानी, हर वो बात जिसे जानना आपके लिए जरूरी है. क्योंकि बात केवल एमवे की ही नहीं है. बल्कि, डायरेक्ट सेलिंग और पिरामिड सेलिंग करने वाली हर कंपनी से जुड़ी है. सबसे पहले जान लेते हैं कि फिलहाल क्या हुआ है और एमवे पर कितनी बड़ी कार्रवाई की गई है.

ED ने एमवे पर क्या कार्रवाई की है?

ईडी ने सोमवार 18 अप्रैल को मल्टी मार्केटिंग स्कैम के आरोपों का सामना कर रही एमवे पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 757 करोड़ 77 लाख की संपत्ति को अटैच कर दिया. इसमें तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले में स्थित कंपनी की फैक्टरी और 346 करोड़ का बैंक बैलेंस भी शामिल है. एजेंसी ने कहा कि एमवे ने साल 2002-03 से लेकर साल 2021-22 तक बिजनेस ऑपरेशन के जरिए 27 हजार 562 करोड़ रुपए जमा किए. जबकि एमवे ने साल 2002-03 से लेकर साल 2020-21 तक भारत और अमेरिका में अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स और मेंबर्स को 7 हजार 588 करोड़ का कमीशन बांटा.

एजेंसी ने जो प्रेस रिलीज जारी की है, उसमें साफ कहा है कि साल 1996-97 में जब एमवे ने भारत में कदम रखा था. तब 21 करोड़ 39 लाख से अपने कारोबार की शुरुआत की थी. और अब वित्त वर्ष 2020-21 तक कंपनी अपने इनवेस्टर्स और अपनी पेरेंट कंपनी को 2 हजार 860 करोड़ रुपए डिविडेंट, रॉयल्टी और अन्य भुगतान के रूप में दे चुकी है. दो कंपनियां जो एमवे को प्रमोट करती हैं उनके नाम हैं ब्रिट वर्ल्डवाइड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और नेटवर्क ट्वेंटी वन प्राइवेट लिमिटेड. ये दोनों कंपनियां सेमिनार आयोजित करती हैं और पिरामिड स्कीम को प्रमोट करते हुए लोगों को एमवे से जोड़ने का काम करती हैं. प्रमोटर्स, सोशल मीडिया और मेगा कन्वेनशन के माध्यम से अपनी शानदार लाइफस्टाइल का प्रदर्शन करते हैं और इनवेस्टर्स को लुभाने का काम करते हैं.

यानी एमवे पिछले करीब 26 सालों में भारत में बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है. लेकिन अब आपको बताते हैं कि एमवे क्या है, कैसे शुरु हुई थी, इसके मालिक कौन हैं, एमवे क्या सामान बेचती है. और सबसे जरूरी सवाल कि कैसे बेचती है.

इन तमाम सवालों का जवाब जानने के लिए वक्त के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाना होगा. साल 1959 में अमेरिका के मिशीगन में रहने वाले दो दोस्तों ने इस कंपनी की शुरुआत की थी. इन दोस्तों के नाम थे जेवेन एंडल और रिचर्ड डेवोस. स्कूल में साथ-साथ पढ़े, साथ-साथ खेले. फिर बिजनेस में भी साथ में हाथ आजमाया. हैमबर्गर स्टैंड से लेकर एयर चार्टर सर्विस तक का काम करके देखा. लेकिन वो कहते हैं ना कि एक आइडिया आपकी किस्मत बदल सकता है. ऐसा ही कुछ हुआ इन दोनों दोस्तों के साथ. 1959 में एंडल और डेवोस ने मल्टीलेवल मार्केटिंग की शुरुआत की और नींव रखी एमवे की. पहला प्रोडक्ट जो एमवे ने लॉन्च किया था वो था लिक्विड ऑर्गेनिक क्लीनर. इसके बाद तो एमवे को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी.

अब एमवे का बिजनेस 6 महाद्वीपों या यूं कहें कि 100 से ज्यादा देशों में फैला है. दोनों दोस्तों में से रिचर्ड डेवोस अब तक 4 किताबें लिख चुके हैं, जाने-पहचाने मोटीवेशनल स्पीकर हैं. कई प्रोफेशनल स्पोर्ट्स फ्रेंचाइजीस के मालिक हैं. वहीं वेन एंडल यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स के डारेक्टर रह चुके हैं. साथ ही वो वेन एंडल इंस्टीट्यूट फॉर एजुकेशन एंड मेडिकल रिसर्च के को फाउंडर भी हैं. एमवे ब्यूटी और हेल्थ से जुड़े सामान बेचती है. भारत में करीब साढे 5 लाख लोग एमवे के साथ जुड़े हुए हैं और डारेक्ट सेलिंग या यूं कहें कि मल्टीलेवल मार्केटिंग के जरिए सामान बेचते हैं. अब यही शब्द यानी मल्टीलेवल मार्केटिंग यानी पिरामिड मार्केटिंग ही ईडी के निशाने पर है. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि अब 60 सालों के बाद भारतीय प्रवर्तन निदेशालय की नजर एमवे पर टेढ़ी हो गई है.

अब सवाल यह कि डारेक्ट सेलिंग क्या है?

डारेक्ट सेलिंग यानी किसी सामान को सीधे बेचना. दरअसल होता ये है कि कंपनी जो सामान बनाती है उसे थोक विक्रेता के पास बेचती है, और थोक विक्रेता इसे बेचते हैं रिटेल विक्रेताओं को. इसके बाद सामान आप तक पहुंचता है. दूसरा तरीका ये कि कंपनी अपने डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए रिटेल विक्रेताओं तक सामान पहुंचाती है और तब सामान आप तक पहुंचता है. डारेक्ट सेलिंग में ना तो कोई थोक विक्रेता होता है और ना ही कोई रिटेल विक्रेता. कंपनी के उत्पाद, सीधे सेल्सपर्सन के माध्यम से आप तक पहुंचते हैं. सेल्सपर्सन को इसके लिए बढ़िया कमीशन मिलता है. अब मल्टी लेवल सेलिंग या पिरामिड सेलिंग को समझ लीजिए.

इसमें कंपनी के सेल्समैन सामान तो बेचते ही हैं, वो चेन सिस्टम भी बनाते हैं. यानी कुछ और लोगों को भी मेंबर बनाते हैं. ये मेंबर भी इस सेल्समैन की तरह सामान बेचते हैं. मेंबर्स को जितना कमीशन मिलता है उसमें से कुछ हिस्सा उस सेल्समैन को भी मिलता है जिसने चेन सिस्टम में उसे जोड़ा है. इसी कमीशन के लालच में सेल्समैन अपनी चेन में अधिक से अधिक मेंबर्स को जोड़ना चाहते हैं. अब ये मेंबर आगे चेन बनाते हैं यानी और मेंबर जोड़ते हैं. सभी को लालच होता है कमीशन का. इनसेंटिव का. सुनने में भले ही आपको ये चमकदार और सोने जैसा सुनहरा लग रहा हो लेकिन इसके पीछे एक स्याह परछाई भी है.

समझिए कि कुछ लोग जो शुरु से इस पिरामिड सिस्टम से जुड़े हैं उनके नीचे एक बड़ी चेन है और इस चेन के कारण उन्हें लाखों में कमाई हो रही है. ये लोग अपनी कमाई और अपनी लाइफस्टाइल दिखाकर भोले-भाले लोगों को चेन सिस्टम में जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं. अब अगर नए जुड़े हुए लोग चेन का विस्तार नहीं कर पाए तो उन्हें ना तो कई कमीशन या इंसेंटिव मिलेगा और ना ही वो सामान बेच पाएंगे. यानी उनके हिस्से आया नुकसान किसी और के हिस्से का फायदा बन जाता है.

भारत में अकेली एमवे ही नहीं है जो मल्टी लेवल सेलिंग और पिरामिड सेलिंग करती है. एमवे के अलावा आरसीएम, ओरीफ्लेम, मोदीकेयर, जैसी कंपनियां भी इसी तरीके से सामान बेचती हैं. दिसंबर 2021 से पहले तक ये कंपनियां आराम से भारत में अपना कारोबार कर रही थीं लेकिन साल 2021 के दिसंबर महीने में भारत सरकार ने इस तरह की कंपनियों के लिए कुछ स्पष्ट नियम बना दिए जिसने इन कंपनियों के पैरों में नियमों की जंजीरें बांध दीं.

लेकिन इन कानूनों में क्या लिखा है?

28 दिसंबर 2021 को जारी भारत के राजपत्र में इस बारे में स्पष्ट रूप से लिख दिया गया है. इन नए नियमों के तहत सरकार ने इन पिरामिड स्कीम्स को बैन कर दिया. रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी के डायरेक्ट सेलर्स जो भी सामान बेचेंगे, अगर उसकी कोई शिकायत आएगी तो उसकी जिम्मेदारी भी इन कंपनियों की होगी. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने डारेक्ट सेलिंग के नियम- कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट (डायरेक्ट सेलिंग) रूल्स, 2021 को नोटिफाई किया जिसके दायरे में डायरेक्ट सेलर्स के साथ-साथ ई-कॉमर्स वेबसाइट पर इन कंपनियों के सामान की बिक्री करने वाली डायरेक्ट सेलिंग इकाइयां भी आएंगी.

नए नियमों के मुताबिक किसी भी कंपनी के डारेक्ट सेलर बिना आईकार्ड के किसी ग्राहक के घर जाकर सामान नहीं बेच सकेंगे. ग्राहक से मिलने के लिए उसे अपॉइंटमेंट लेना होगा. अपनी ओर से सेल्समैन कोई वादा नहीं कर सकेगा ना ही अपनी ओर से कोई कागज दे सकेगा. केवल कंपनी के ब्रॉशर की ग्राहक को दिए जा सकेंगे. सेल्समैन को अपनी और कंपनी की जानकारी ग्राहक को देनी होगी. सामान की कीमत, पेमेंट का तरीका, रिटर्न, एक्सचेंज, रिफंड और ऑफ्टर सेल की पूरी जानकारी उसे ग्राहक को बतानी होगी. सबसे बड़ी बात ये कि डायरेक्ट सेलिंग कंपनियां और डायरेक्ट सेलर, पिरामिड योजनाओं को बढ़ावा नहीं दे सकेंगे और न ही वे किसी भी व्यक्ति को इस कारोबार का हिस्सा बनने के लिए झांसा दे पाएंगे.

लेकिन ईडी का कहना है कि एमवे इन नियमों को धता बताते हुए कारोबार कर रहा था. एजेंसी का कहना है कि लोग कंपनी से उसके सामान के लिए नहीं बल्कि अमीर होने के लिए जुड़ना चाहते थे. और उन्हें लग रहा था कि चेन सिस्टम यानी पिरामिड स्कीम के माध्यम से वे अमीर बन सकते हैं. एमवे का भी इस कार्रवाई पर जवाब आया है. कंपनी ने कहा है कि ये मामला 2011 का है और तभी से वो संबंधित अधिकारियों के साथ सहयोग कर रहे हैं. कंपनी ने कहा कि मामला विचाराधीन है इसलिए वे इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है. खैर इस पूरे मामले से एक बात तो साफ है कि अब भारत में पिरामिड स्कीम चलाने वाली कंपनियों के लिए बिजनेस पहले जैसा आसान नहीं रहने वाला है.

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