AIADMK के नेतृत्व की लड़ाई: अम्मा के दो वफादारों के बीच अंदरूनी कलह की कहानी

O Panneerselvam, K Palaniswami

लक्ष्मण वेंकट कुचि:- अम्मा के ‘मैन फ्राइडे’ यानी सबसे करीबी सहायक रहे ओ. पन्नीरसेल्वम (O Panneerselvam) – जिन्हें तत्कालीन अन्नाद्रमुक (AIADMK) सुप्रीमो और मुख्यमंत्री जे जयललिता (J Jayalalithaa) ने कानूनी बाधाओं का सामना करने पर दो बार प्रदेश और राज्य सरकार की जिम्मेदारी सौंपी – ने लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने के बाद 2016 में अम्मा के निधन के बाद सोचा कि उनकी विरासत पर उनका ‘अधिकार’ है. चेन्नई राजभवन में उस दिसंबर के दिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण के दौरान रूमाल से आंसू पोंछते हुए सभी अखबारों में पहले पन्ने पर छपी ओपीएस (OPS) की तस्वीरों को कौन भूल सकता है. अम्मा जब अस्पताल में इलाज करा रहीं थी तब सरकार और पार्टी में उनके उत्तराधिकारी को लेकर अटकलें तेज हो चुकीं थी जबकि उनकी साथी वीके शशिकला (VK Sasikala) परदे के पीछे से सत्ता की बागडोर को संभाल रहीं थीं.

उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन – 6 दिसंबर, 2016 – से ओपीएस ने पार्टी और सरकार के भीतर अपनी स्थिति को मजबूत करने की पूरी कोशिश की और शायद सोचा कि उनकी दृढ़ निष्ठा और ‘चिन्नम्मा’ यानी शशिकला के प्रति संपूर्ण ‘समर्पण’ उनकी अपनी राजनीतिक स्थिति को बरकरार रखेगा. ओपीएस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ, जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के अनुरोधों और उनके सुझावों को सुनने के लिए तैयार रहते थे. लेकिन AIADMK के अंदर तख्तापलट की तैयारी जारी थी, अब तक पिछली सीट से पार्टी और सरकार चला रही शशिकला ने खुद बागडोर संभालने का फैसला किया और ओपीएस को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए खुद को अन्नाद्रमुक विधायक दल के नेता के रूप में नामित कर दिया. पार्टी के 122 विधायकों को समंदर किनारे एक लक्जरी ‘गोल्डन बे’ रिसॉर्ट में बंद कर अंतहीन रिज़ॉर्ट राजनीति के बाद, AIADMK और तमिलनाडु की जनता शशिकला को अपना नेता और सरकार का प्रमुख बनाने को तैयार हो गई. सीएम के रूप में शपथ लेने के कुछ ही महीनों बाद ओपीएस को इस्तीफा देना पड़ा और शशिकला के लिए सीएम और पार्टी प्रमुख के रूप में रास्ता बनाना पड़ा.

ईपीएस और ओपीएस के बीच की लड़ाई

इन सब के बीच अब तक ई.के पलानीस्वामी (Edappadi K. Palaniswami) तस्वीर में कहीं नहीं थे. लेकिन जब शशिकला तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने की तैयारी कर रही थीं, तब सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में उन्हें चार साल की जेल की सजा सुनाई और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर पानी फिर गया. दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने छह साल तक चुनाव लड़ने का अधिकार भी खो दिया और उनके लिए किसी भी निर्वाचित सरकारी पद पर रहना असंभव हो गया. अब अपने सभी विधायकों और पार्टी तंत्र के साथ, शशिकला पार्टी में किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहीं थी जो उनके लिए और उनके इशारे पर काम करे. उस दौरान ई. पलानीस्वामी (Edapaddi Palaniswamy) की खोज की गई, जो एक योग्य मंत्री और मजबूत पार्टी नेता होने के अलावा अम्मा के प्रति अटूट निष्ठा में बने रहने के लिए आवश्यक शर्त या अधिकांश क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक संरचना का हिस्सा) रखने वाले थे, और उनके पास कई सालों का प्रशासनिक अनुभव भी था.


जब यह हो रहा था, तब ओ. पन्नीरसेल्वम शशिकला के खिलाफ बागी तेवर दिखाते हुए 7 फरवरी, 2017 को मरीना बीच पर धरने पर बैठ गए. लगभग 40 मिनट तक वे इस उम्मीद में चुपचाप बैठे रहे कि यह पार्टी के कई लोगों को बाहर आने के लिए प्रेरित करेगा. हालांकि उनकी सोच हकीकत पर आधारित नहीं थी, वे गलत साबित हुए, जैसा कि बाद की घटनाओं में दिखाया गया कि वे पार्टी से अलग हुए एक समूह का नेतृत्व कर रहे थे, जिसमें मुट्ठी भर विधायक उनका समर्थन कर रहे थे.


इस बीच मुख्यमंत्री ईपीएस (EPS) ने सबसे पहले सरकारी तंत्र और बाद में पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करना शुरू कर दिया और सार्वजनिक तौर पर जाहिर किए बिना चुपके से शशिकला से खुद को अलग करने की ‘घोषणा’ कर दी. उन्होंने शशिकला के करीबी लोगों के ‘अनुरोधों’ पर विचार करने से इनकार कर दिया और राज्य के प्रशासन में शामिल हो गए, और इसे अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बना लिया. बेंगलुरू जेल में कैद शशिकला के रास्ते से हटने के बाद, पार्टी पर ईपीएस का पूर्ण नियंत्रण हो गया. लेकिन पार्टी को मजबूत करने के लिए उन्हें अंततः ओपीएस गुट से समझौता करना पड़ा. चूंकि अन्नाद्रमुक (AIADMK) के पास जयललिता जैसे करिश्माई नेता की कमी थी, इसलिए पार्टी खेमों के बीच जारी अंदरूनी कलह इसे और कमजोर कर रहा था, यहां तक कि अपनी स्थिति मजबूत कर रही द्रमुक पार्टी (DMK) भी गंभीर चुनौती पेश कर रही थी.

दोनों नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई

वास्तव में ओपीएस (OPS) ने जयललिता की मौत की पूरी जांच के लिए अभियान चलाया, जिसमें संभावित गड़बड़ी का संकेत दिया गया और यह उस सरकार के खिलाफ उनके शक्तिशाली हथियारों में से एक था जिसने उन्हें पद से हटा दिया था. पार्टी के व्यापक हित में ईपीएस (EPS) ने ओपीएस (OPS) गुट के साथ शांति कायम की, जिससे उन्हें पार्टी का संयुक्त नेतृत्व और उपमुख्यमंत्री का पद मिला. बाहर से सब कुछ ठीक लग रहा था, लेकिन पार्टी में अंदरूनी तौर पर दोनों नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई. पार्टी और सरकार में वापसी के बाद ओपीएस ने कहा कि जयललिता की मौत में कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है और पिछले साल डीएमके के सत्ता में आने के बाद उनकी मौत की जांच कर रहे एक सदस्यीय आयोग ने उनसे पूछताछ भी की थी.


पिछले साल विधानसभा चुनावों और उसके बाद स्थानीय निकाय चुनावों में अन्नाद्रमुक (AIADMK) की हार के बाद, पार्टी में सुधार की चर्चा जोरशोर से होने लगी. कहा जा रहा था कि पार्टी का संयुक्त नेतृत्व अप्रभावी है और वास्तव में पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है. इस बीच, ईपीएस ने विधायकों और पार्टी नेताओं के बीच अपना मजबूत समर्थन विकसित किया. उनके समर्थक सिंगल लीडर की डिमांड के साथ सामने आए. जब एहसास हुआ कि पार्टी के भीतर उनके खिलाफ गेम हो रहा है, तब ओपीएस ने अपने समर्थकों को इसका विरोध जताने के लिए प्रेरित किया, और यहां तक कि जनरल काउंसिल की बैठक स्थगित करने या इसके आयोजन में बाधा डालने की कोशिश की.


इतना ही नहीं, उन्होंने पार्टी की जनरल काउंसिल की बैठक स्थगित कराने का आदेश लेने के लिए मद्रास हाई कोर्ट का रुख भी किया. पार्टी नेतृत्व के मुद्दे पर हाईकोर्ट से अंतिम फैसला आज (गुरुवार को) आने की संभावना है. दुर्भाग्य से ओपीएस के लिए अदालत ने पहले हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. लेकिन आधी रात की सुनवाई में ओपीएस को कुछ राहत मिली क्योंकि डिवीजन बेंच के न्यायाधीशों ने केवल 23 प्रस्तावों का आदेश दिया, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि इस बैठक में पार्टी के सुप्रीम लीडरशिप पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है.

ऐसे में सवाल यह है कि ईपीएस अब क्या करेंगे?

जब पार्टी के दोनों नेता नेतृत्व के मुद्दे पर अपने विरोधी विचारों पर अडिग हैं, जनरल काउंसिल की बैठक में होने वाली चर्चा पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह जगा सकती है. ईपीएस सिंगल लीडरशिप के मुद्दे पर अडिग हैं और उनके समर्थक इस पर एक प्रस्ताव लाने के लिए दबाव डाल सकते हैं. अब ओपीएस का दावा है कि अगर ऐसा हुआ तो यह अवैध होगा क्योंकि वे पार्टी के जॉइंट कोऑर्डिनेटर के तौर पर इस निर्णय का समर्थन नहीं कर सकते. ओपीएस का कहना है कि पार्टी के नियमों के मुताबिक जनरल बॉडी उनके हस्ताक्षर के बिना प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती है.


14 जून को पार्टी के जिला सचिवों की बैठक के बाद से पार्टी में सिंगल लीडरशिप के लिए हलचल तेज हो गई. संयोग से, जिला सचिवों में कोई भी ओपीएस का समर्थक नहीं है और ज्यादातर विधायक भी ईपीएस का समर्थन करते हैं, जिससे उनके लिए पार्टी पर पूरा नियंत्रण रखना आसान हो जाता है. इस मुद्दे को हल करने के लिए दोनों खेमों के बीच बातचीत हुई है, लेकिन ईपीएस और ओपीएस के अड़े रहने से कोई हल निकलने की संभावना नहीं है. हकीकत यह है कि लंबे समय के ओपीएस के वफादार रहे कुछ लोगों ने भी पाला बदल लिया है. पार्टी के एक सीनियर नेता ने कहा, ‘AIADMK के सह-समन्वयक (Co-Coordinator) पलानीस्वामी (23 जून को जनरल काउंसिल की बैठक में) AIADMK महासचिव चुने जाएंगे.


पन्नीरसेल्वम के लिए हमारे मन में सम्मान है, लेकिन उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं को समझना चाहिए. लेकिन ओपीएस खेमे का व्यवहार डीएमके (DMK) के बी-टीम की तरह है. अन्नाद्रमुक पार्टी को सिंगल लीडरशिप की आवश्यकता है’. विपक्ष की जगह के लिए बीजेपी के तीखे हमले के बीच नेतृत्व की खींचतान सामने आई है और इस लिहाज से एक और बड़ी राजनीतिक लड़ाई शुरू हो सकती है. इस संदर्भ में बीजेपी के करीबी माने जाने वाले ओपीएस की भूमिका पर नज़र रखना बाकी है. लेकिन यह दिखावा मिडनाइट कोर्ट के आदेश से पहले का है. तमिलनाडु की राजनीति उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों की तरह ही मनोरंजक साबित हो सकता है. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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