हेल्थ सर्वे में खुलासा: पीरियड्स के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करती हैं 50 फीसदी महिलाएं, खराब क्वालिटी वाले सैनिटरी पैड इसकी मुख्य वजह

Periods

देश में 15 से 24 साल की लगभग 50 फीसदी महिलाएं मासिक धर्म (Periods) के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करती हैं. यह जानकारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (National Family Health Survey – 5)की रिपोर्ट में सामने आई है. इसकी अहम वजह जागरूकता की कमी और मासिक धर्म को लेकर मौजूद तमाम उल्टी-सीधी मान्यताएं हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में 64 फीसदी महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिन (Sanitary Napkin) का इस्तेमाल करती हैं. 50 फीसदी महिलाएं कपड़ा प्रयोग करती हैं, जबकि 15 फीसदी देसी तरीकों से बने नैपकिन इस्तेमाल करती हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो इस आयु वर्ग की 78 फीसदी महिलाएं ही मासिक धर्म के दौरान बचाव के लिए साफ-सुथरे तरीके आजमाती हैं और हाईजीन का ध्यान रखती हैं.

मासिक धर्म के दौरान बचाव के लिए साफ-सुथरा तरीके अपनाने वाली महिलाओं की बात अगर राज्यों के हिसाब से करें तो सबसे निचले पायदान पर बिहार आता है. यहां 59 फीसदी महिलाएं ही मासिक धर्म के दौरान बचाव के सुरक्षित साधनों का इस्तेमाल करती हैं. बिहार से ऊपर क्रमश: मध्यप्रदेश (61 फीसदी) और मेघालय (65 फीसदी) आते हैं. इन तीनों राज्यों में महिलाएं बचाव के सुरक्षित तरीकों के रूप में देसी नैपकिन, सैनिटरी नैपकिन, टैम्पोन और मासिक धर्म कप का इस्तेमाल करती हैं. मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता को लेकर जागरूकता अभियान चलाने के लिए गीता बोरा ने पुणे में स्फेरूल फाउंडेशन की शुरुआत की है. उन्होंने Tv9 को बताया, ‘ऐसे कई कारण हैं, जिनकी वजह से मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता अब भी दूर की कौड़ी बन गई है.’

हाईजीन को लेकर जागरूकता लानी होगी

गीता बोरा ने समझाते हुए कहा, ‘सबसे पहली बात यह है कि इस वक्त देश में कई ऐसी योजनाएं चल रही हैं, जिनके तहत सरकारें स्कूलों में लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन मुफ्त देती हैं, लेकिन ऐसा शायद ही कभी होता है. अधिकतर स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन बांटे ही नहीं जाते हैं. दुख की बात यह है कि मिड-डे मील न मिलने पर बच्चे और टीचर्स प्रदर्शन करते हैं, लेकिन सैनिटरी नैपकिन नहीं मिलने पर कोई कुछ भी नहीं कहता है. दूसरी वजह यह है कि इस मामले (मासिक धर्म) को लेकर समाज में तमाम उल्टी-सीधी मान्यताएं फैली हुई हैं. कोई भी मासिक धर्म के दौरान हाईजीन को लेकर बात ही नहीं करना चाहता है.

उन्होंने कहा कि कोविड-19 और लॉकडाउन ने मासिक धर्म के दौरान हाईजीन को लेकर मसले को और ज्यादा उलझा दिया. दरअसल, उस दौरान काफी लोगों की नौकरी चली गई, जिसके चलते आर्थिक मामलों को मैनेज करना अहम मसला हो गया. ऐसे में महंगे सैनिटरी नैपकिन खरीदना महिलाओं के बस की बात नहीं रह गई.

महिलाएं खरीदती हैं सस्ते सैनिटरी नैपकिन

गीता बोरा के मुताबिक, ‘भारत में महिलाएं पहले अपने परिवार को प्राथमिकता देती हैं और अपनी जरूरतों के बारे में सबसे आखिर में सोचती हैं. ऐसे में महिलाएं बाजार में उपलब्ध सबसे सस्ते सैनिटरी नैपकिन खरीदती हैं. अगर वे इसे भी नहीं खरीद सकतीं तो कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, जो बेहद अनहाईजीनिक होता है. वहीं, बाजार में उपलब्ध सस्ते सैनिटरी नैपकिन प्लास्टिक के अलावा कुछ भी नहीं होते हैं. ऐसे में महिलाएं कपड़े की ओर रुख कर लेती हैं. वे नैपकिन सिर्फ उस वक्त खरीदती हैं, जब उन्हें किसी लंबे सफर पर जाना होता है.’

गीता ने बताया, ‘मासिक धर्म के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करने के पीछे एक और कारण भी है. दरअसल, शहरों में सैनिटरी नैपकिन को डिस्पोज करना आसान है, जबकि गांवों में यह काफी बड़ा टास्क साबित होता है. इस मामले में एक और बड़ी बाधा है. वह यह कि जागरूकता की कमी के चलते महिलाओं को यह तक पता नहीं होता कि बाजार में मौजूद मासिक धर्म कप और टैम्पोन का इस्तेमाल कैसे करें. आदिवासी क्षेत्रों में तो महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करना भी नहीं जानती हैं. ऐसे में टैम्पोन के बारे में उन्हें जानकारी होने की कल्पना करना ही गलत है.’

हाईजीन का ध्यान न रखने से हो सकता है इंफेक्शन

राजधानी स्थित फोर्टिस ला फेमे की डायरेक्टर डॉ. मीनाक्षी आहूजा का कहना है कि अगर महिलाएं मासिक धर्म के दौरान सही हाईजीन का पालन नहीं करती हैं तो कई समस्याएं हो सकती हैं. उन्होंने बताया, ‘ब्लड काफी इंफेक्शन फैला सकता है. मासिक धर्म के दौरान इंफेक्शन की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है. अगर आप टैम्पोन का इस्तेमाल चार घंटे से ज्यादा समय तक करते हैं तो इससे टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम हो सकता है. ऐसे में महिलाओं को पेल्विक इंफेक्शन हो सकता है, जिससे योनि में खुजली होती है और आसपास के क्षेत्र में इंफेक्शन हो जाना आम बात है. यह इंफेक्शन जैसे-जैसे बढ़ता है, उससे महिलाओं को पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिसीज (Pelvic inflammatory disease) हो सकती है. बार-बार PIDs होने से गर्भाशय और ट्यूबल स्थायी रूप से डैमेज हो सकते हैं, जिससे बांझपन का खतरा बढ़ जाता है.

(पीटीआई के इनपुट्स के साथ)

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