श्वेत, हरित, नीली… रंगों का क्रांति से क्या कनेक्शन है और ये किस चीज से जुड़ी हैं? यह है इसकी पूरी कहानी

Green White And Blue Revolution Know What Is The Connection Of Color With Revolution Explained

अलग-अलग क्षेत्र में बड़े बदलाव यानी क्रांति लाने के लिए एक लम्बा संघर्ष चला. इन्हें नाम भी अलग-अलग दिए गए हैं. जैसे- हरित क्रांति (Green Revolution), श्वेत क्रांति और नीली क्रांति (Blue Revolution). इनका कनेक्शन अलग-अलग चीजों से रहा है. हरित क्रांति का सम्बंध खेती-किसानी से है. वहीं, श्वेत क्रांति (White Revolution) का दूध उत्पादन और नीली क्रांति का कनेक्शन मछली पालन से है. इन क्रांति से देश-दुनिया में ऐसे बदलाव लाए जिनका असर आज भी देखने को मिलता है. ऐसे में सवाल उठता है कि इन क्रांति का कनेक्शन इन रंगों से क्यों है और इनके जरिए क्या बदलाव लाया गया?

क्या है क्रांति का रंगों से कनेक्शन और ये कैसे बदलाव लेकर आईं जिससे दुनियाभर में इनकी चर्चा हुई? जानिए इन सवालों के जवाब…

हरित क्रांति: जापान से हुई शुरुआत

इसकी शुरुआत जापान से हुई थी. दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिकी सेना जापान पहुंची. इनके साथ एग्रीकल्चर रिसर्च से जुड़े सिसिल सैल्मन भी थे. दोबारा एक नए जापान निर्माण करने के लिए सैल्मन ने कृषि पर फोकस किया. उन्हें गेहूं की एक ऐसी प्रजाति मिली जिसका दाना बड़ा होता था. इस प्रजाति का नाम था नोरिन नामकी. इसे अमेरिका में रिसर्च के लिए भेजा गया. 13 साल तक इस पर रिसर्च चली. फिर अमेरिकी कृषि विज्ञानी नॉर्मन बोरलॉग ने मेक्सिको की सबसे अच्छी किस्म के साथ इसका संकरण कराया गया. इस तरह गेहूं की एक नई प्रजाति तैयार हो गई.

भारत को इसकी जानकारी मिली. उस दौर में भारत में अनाज की उपज बढ़ाने के लिए कोशिशें जारी थीं. 1965 में तत्कालीन कृषि मंत्री सी सुब्रमण्यम ने इसी नई प्रजाति के 18 हजार टन बीज मंगवाए. इसके साथ ही कई बड़े कदम उठाए गए. जैसे- किसानों को कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए खेती-किसानी की अधिक जानकारी दी गई, नहरें बनाई गईं, कुओं की संख्या बढ़ाई गई और किसानों को अनाज के दामों की गारंटी भी दी गई. इस तरह कृषि के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया और अनाज की मात्रा तेजी से बढ़ने लगी. खेती-किसानी को हरे रंग से दर्शाया जाता है इसलिए इसका नाम हरित क्रांति पड़ा.

श्वेत क्रांति: दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए 1970 में हुआ इसका आगाज

इसे ऑपरेशन फ्लड के नाम से भी जाना गया. इस क्रांति का सम्बंध दूध से है. श्वेत क्रांति का लक्ष्य भारत में दूध की कमी को दूर करना था. इसकी शुुरआत 13 जनवरी 1970 को हुई थी. वर्गीज कुरियन को श्वेत क्रांति का जनक कहा जाता है. जिन्होंने देश में दूध की सबसे बड़ी कंपनी अमूल की स्थापना की.

अब समझते हैं कि ऐसा करने की नौबत ही क्यों आई. दरअसल, आजादी के बाद गांवों में दूध और फसल उत्पादन को बढ़ाना जरूरी हो गया था. उस दौरान काफी हद तक दूध और डेयरी प्रोडक्ट आयात किए जा रहे थे इससे देश पर आर्थिक भार बढ़ रहा था. इस संकट से निपटने के लिए 1970 में श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई. चूंकि दूध का रंग सफेद होता है इसलिए इसका नाम भी श्वेत क्रांति रखा गया.

डॉक्टर वर्गीज कुरियन ने इंडियन डेयरी कॉर्पोरेशन (IDC) नाम की एजेंसी बनाई. शुरुआत में देश में मिल्क पाडउर को जो प्रोडक्शन 22 हजार टन था वो 1989 में 1,40,000 टन तक पहुंच गया. धीरे-धीरे अमूल देश की पसंदीदा डेयरी बन गई. श्वेत क्रांति के कारण ही 1950-51 में जहां दूध का उत्पादन 17 मिलियन टन था वो 2001-02 तक 84.6 मिलियन टन तक पहुंच गया.

नीली क्रांति: मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए 80 के दशक में हुई पहल

मछली का उत्पादन बढ़ाने और मत्स्य पालन से जुड़े किसानों की आय में बढ़ोतरी के लिए नीली क्रांति की शुरुआत हुई. देश में मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने 1985-1990 के बीच 7वीं पंचवर्षीय योजना में फिश फार्मर्स डेवलपमेंट एजेंसी (FFDA) बनाई. इस पहल के जरिए मरीन फिशरीज़ प्रोग्राम शुरू किया गया ताक मछली पालन को बढ़ावा मिले. इसके तहत मत्स्य पालन के लिए नई तकनीक उपलब्ध कराई गईं, नतीजा मछली उत्पादन में तेजी आने लगी. मछली का कनेक्शन समुद्र और नदियों से होता है, इसलिए इसे नीली क्रांति का नाम दिया गया.

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