शेरदिल: द पीलीभीत सागा, इस फिल्म से जानवरों और पंकज त्रिपाठी दोनों को नुकसान पहुंचा!

Pankaj Tripathi Revealed How Srijit Mukherji Convince Actors Wife Mridula For Debut In Sherdil The Pilibhit Saga - TV9hindi.com

इशिता सेनगुप्ता:- अभी तक पंकज त्रिपाठी (Pankaj Tripathi) की तरह किसी ने भी बंगाली कलाकारों में इतना भरोसा नहीं किया होगा. एक हफ्ते के अंदर इस अभिनेता की दो फिल्में रिलीज हो रही हैं, एक शॉर्ट फिल्म और एक फीचर फिल्म. दोनों ही फिल्मों का निर्देशन बंगाली निर्देशकों द्वारा किया गया है. अभिरूप बसु की लाली (Laali) जिसकी कहानी कोलकाता के लॉन्ड्रीमैन पर आधारित है, जो बिना किसी मददगार या परिवार के अकेले काम करता है. इस फिल्म का पूरा दारोमदार पंकज त्रिपाठी के कंधों पर टिका हुआ है. इस फिल्म में पंकज त्रिपाठी मेन रोल में हैं. वे एक शानदार अभिनेता हैं. इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे आदमी की भूमिका निभाई है जो अलगाव और परित्याग से जूझ रहा है.

फिर है श्रीजीत मुखर्जी की शेरदिल: द पीलीभीत सागा (Sherdil: The Pilibhit Saga). एक तरफ मुखर्जी हैं जो बने बनाए को बिगाड़ देते हैं दूसरी ओर त्रिपाठी हैं जो एक शब्दहीन दृश्य में भी अपने अभिनय से जान डाल देते हैं. हालांकि इस बार मुखर्जी ने वह हासिल किया है जो बसु और अन्य फिल्म निर्माता भी हासिल नहीं कर सके. उन्होंने ऐसी फिल्म बनाई है जिसमें त्रिपाठी भी खराब नजर आते हैं. यह बात फिल्म की पूरी कास्टिंग (त्रिपाठी, सयानी गुप्ता और नीरज काबी) के लिए सच साबित होती है. ईमानदारी से कहूं तो निर्देशक ने पीलीभीत संकट जैसे गंभीर मुद्दे को धूमिल कर दिया है.

फिल्म इतनी खराब है कि उसे ‘फिल्म’ भी नहीं कहा जा सकता

2017 में कई पब्लिकेशन ने इस मुद्दे को गरीबी के एक दर्दनाक पहलू के तौर पर पेश किया था. उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व और उसके आसपास बाघों द्वारा बुजुर्गों पर हमला करने की घटनाएं बढ़ रही थीं. जांच करने पर यह पता चला कि सरकार से मुआवजे का दावा करने के लिए गांव वाले जानबूझकर अपने परिवार के बूढ़े सदस्यों को मरने के लिए भेज रहे थे. यह लोग बहुत गरीब थे और जिंदा रहने के लिए अधिकारियों को धोखा देना उनका एकमात्र सहारा बन गया. अपने परिवार को बचाने के लिए उन्होंने परिवार के ही एक सदस्य का बलिदान करना मुनासिब समझा.


भारत जैसे देश में जहां कलह धर्म, जाति और वर्ग का चोगा पहनती है, वहां पीलीभीत गाथा अस्तित्व की लड़ाई को अपने में समेटे हुए एक ऐसे परिदृश्य पर प्रकाश डालती है, जहां शिकार करने को जीवन जीने के एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में दिखाया गया है, जो कि शिकारी के दूसरे पहलू को उजागर करता है. इस विषय पर फिल्म व्यंग्य के लिए एक उम्दा पृष्ठभूमि देता है. मुखर्जी ने निश्चित रूप से इसका इस्तेमाल किया, लेकिन आखिरकार उन्होंने जो फिल्म बनाई वो इतनी खराब है कि उसे फिल्म का दर्जा देना गलत होगा. यह फिल्म एक ऐसे स्कूल प्ले जैसी नजर आती है जिसकी पटकथा एक हफ्ते में लिखी गई और अभिनय के लिए एक दिन की प्रैक्टिस की गई.


एक काल्पनिक गांव झुंडव (फिल्म की शूटिंग उत्तर बंगाल में की गई है) में स्थित, शेरदिल फिल्म गंगाराम (त्रिपाठी) के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपने लोगों की बेहतरी के लिए कोशिश करते-करते थक गया है. जंगल के जानवर उनकी फसल खा रहे हैं, जो गांव वालों को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहा है. बारिश नहीं होने से उनकी परेशानी और बढ़ गई है. गांव का सरपंच होने के नाते गंगाराम के कुछ कर्तव्य और दायित्व हैं. सरकारी मुआवजा मिलने में आने वाली अड़चन के बारे में पता चलने बाद मुआवजा पाने लिए गंगाराम एक प्लान के बारे में सोचता है. 10 लाख के मुआवजे का दावा करने के लिए वह जानबूझकर खुद को एक बाघ का शिकार बनाने की योजना बनाता है. अपने परिवार को समझाने के लिए वह उनसे झूठ बोलता है कि उसे कैंसर है और उसके पास जीने के लिए केवल तीन महीने बचे हैं. वो कहता है कि गुमनामी में मरने से अच्छा है कि अपने जीवन का बलिदान कर दिया जाए और अमर हो जाए.

फिल्म में निरंतरता की कमी दिखती है

शेरदिल अपनी क्रेडिबिलिटी को पंक्चर करने में कोई कसर छोड़ता नजर नहीं आता है. लेखन बहुत खराब है (मुखर्जी को स्क्रीन प्ले का क्रेडिट दिया जाता है), जिसमें निरंतरता की कमी दिखती है. त्रिपाठी की लाइलाज बीमारी की खबर मिलने के बाद उनका परिवार इसे आसानी से भूल जाता है, जैसे कि उन्हें साधारण सी सर्दी की शिकायत हो. कथा फ्लैशबैक में सामने आती है जो फिल्म को उलझा देती है. शुरुआत से ही फिल्म में स्पष्टता की कमी नजर आती है. कुछ समय बाद मुखर्जी की भूलने की आदत से याद आता है कि उनके लिए प्लॉट को फॉलो करना कितना मुश्किल है.


यह लक्ष्यहीनता इस फिल्म के किरदारों के चरित्र-चित्रण में भी साफ नजर आती है. गुप्ता संदेह करने वाली पत्नी के रूप में फिल्म में नजर आई हैं, लेकिन उनकी स्किल्स का फिल्म में ठीक से इस्तेमाल नहीं किया गया, और सोहाग सेन, जिन्होंने गंगाराम की मां की भूमिका निभाई है, ने भी निराश किया. इस फिल्म में नायक पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया गया. फिल्म को शेरदिल नाम इसलिए दिया गया क्योंकि गांव का सरपंच एक बहादुर आदमी है जो अपने लोगों को बचाने के लिए अपना सब कुछ, यहां तक कि अपनी जान भी जोखिम में डाल देता है.


मुखर्जी ने गंगाराम को गांव के एक मूर्ख के रूप में दर्शाया है जो लोगों की मदद के लिए यह रास्ता चुनता है. यह काफी हद तक अपमानजनक है क्योंकि यह फिल्म निर्माता के अपने शहरी दृष्टिकोण को उजागर करता है. जब गंगाराम जंगल में जाता है तो वह एक बच्चे की तरह कौतुहलता में नजर आता है, वहां जो कुछ भी होता है उसे देखकर वह हैरान होता है. यह बात इस तथ्य को नजरअंदाज करती है कि वह जंगल के पास ही बड़ा हुआ है. और इस वजह से उसे उस जंगल की जानकारी होनी चाहिए थी. लेकिन मुखर्जी की दुनिया में ऐसा नहीं होता.

श्रीजीत मुखर्जी एक के बाद एक खराब फिल्में बना रहे हैं

इसी तरह एक और चरित्र जिम अहमद (काबी) शिकारी को लें. उन्हें जिम कॉर्बेट के नाम पर और जिम मॉरिसन (वास्तव में नहीं) की तरह दिखाया गया जो “सन्नाटा” और “फुसफुसाहट” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है. वह जंगल में गंगाराम से मिलता है और उनके बीच धर्म को लेकर बकवास संवाद होता है जिसे भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे खराब दृश्यों में से एक कहा जा सकता है. और श्रीजीत मुखर्जी की फिल्मों से मुझे यही दिक्कत है.


जब किसी का काम ही होता है फिल्मों पर लिखना तो बेकार फिल्में देखना भी उनके प्रोफेशन का हिस्सा होता है. लेकिन एक के बाद एक खराब फिल्म बनाने वाले मुखर्जी के काम का मूल्यांकन करना एक निराशाजनक अभ्यास बन जाता है क्योंकि निर्देशक अपने काम के बेहतर होने को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं. यहां तक कि शेरदिल में भी, जहां वे मूर्खता को बहादुरी समझते हैं, कैमरों से ऐसे शॉट्स लिए गए हैं जैसे कि वे खुद को सबसे बेहतरीन डायरेक्टर मानते हों. एक पति और पत्नी के बीच एक रोमांटिक सीन के बैकग्राउंड में रॉक म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया है जो कि बेहूदा लगता है.


केके की मौत के बाद मुखर्जी ने शेरदिल के लिए केके के गाने की एक छोटी क्लिप शेयर की. यह संभवतः गायक के अंतिम गानों में से एक है. यह फिल्म उन्हें समर्पित है, जो कि एक अच्छी बात है. लेकिन हाल में बनी किसी भी दूसरी फिल्म ने एक साथ मृत, जीवित और जानवरों को इतना अपमानित नहीं किया होगा. अगर शेर दिल निर्देशक और अभिनेता के बीच प्रतिष्ठा की टक्कर थी तो उसमें मुखर्जी जीत गए. एक बंगाली होने के नाते मैं पंकज त्रिपाठी और इसमें शामिल सभी लोगों से माफी मांगती हूं. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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