राष्ट्रपति चुनाव: द्रौपदी मुर्मू का नाम बढ़ाकर बीजेपी ने खेला मास्टरस्ट्रोक, पाले में बीजेडी, बंट गया विपक्ष

Draupadi Murmu (1)

यह एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. 18 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव (Presidential Election) के लिए जिन 13 विपक्षी दलों ने पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा (Yashwant Sinha) को अपना उम्मीदवार बनाया था, कम से उन्होंने तो इसकी कल्पना कभी नहीं की होगी. उनकी रणनीति यह थी कि सिन्हा के बीजेपी और खत्म हो चुके जनता दल के साथ पुराने जुड़ाव को देखते हुए, वह बीजेपी और जनता दल से अलग हुई कई दूसरी पार्टियों के वोटों में सेंध लगाने में सक्षम होंगे. उन्हें आशा थी कि सिन्हा की उम्मीदवारी से बीजेपी की उम्मीदों पर गहरा असर पड़ेगा. खासकर सिन्हा के गृह राज्य झारखंड और पड़ोसी बिहार में.

हालांकि, शाम तक बीजेपी ने राष्ट्रपति के चुनाव के लिए द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) का नाम बढ़ा दिया, इससे शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे लोगों को तगड़ा झटका लग गया. कई लोगों के मन में सवाल उठा होगा कि मुर्मू कौन है? जल्द ही वास्तविकता सामने आई कि मुर्मू एक आदिवासी महिला है. यदि उनका निर्वाचन हो जाता है तो 25 जुलाई को भारत के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने वाली वह पहली आदिवासी होंगी और 12वीं राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बाद, दूसरी महिला राष्ट्रपति बन जाएंगी. विपक्ष ने दोपहर में अपना नाम जारी कर, बीजेपी का काम आसान कर दिया. बीजेपी के पास 20 संभावित उम्मीदवारों की सूची थी. माना जा रहा था कि वह अगले राष्ट्रपति के रूप में एक आदिवासी को चुन सकती है, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि बीजेपी कई बड़े आदिवासी नेताओं के बजाए मुर्मू के नाम पर फैसला ले सकती है.

बीजेपी ने विपक्ष का गुब्बारा फोड़ दिया है

मुर्मू का नाम बढ़ाकर, बीजेपी ने विपक्ष की हवा निकाल दी है. एक आदिवासी और एक महिला होने के अलावा, मुर्मू झारखंड की पूर्व राज्यपाल हैं, जो मूल रूप से ओडिशा से ताल्लुक रखती हैं. वह नवीन पटनायक की गठबंधन सरकार में मंत्री रह चुकी हैं. इसका मतलब यह हुआ कि ओडिशा की सत्ताधारी बीजू जनता दल (बीजेडी) जो अब तक तटस्थ थी, अपने ही प्रदेश की बेटी मुर्मू के खिलाफ वोट करने का जोखिम नहीं उठा सकती.


बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के पास राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुछ वोट कम हैं. ऐसे में बीजेडी का वोट अहम हो जाता है. इसके जरिए वह अपने उम्मीदवार की जीत पक्का कर सकती है. बीजेपी द्वारा अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा के बाद, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा कि मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना उनके राज्य के लिए गर्व का क्षण है. साथ ही उन्होंने खुलासा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनसे बात की थी और उनकी उम्मीदवारी पर उन्हें विश्वास में लिया था. ऐसा करके बीजेपी ने विपक्ष का गुब्बारा फोड़ दिया है. और इसके साथ ही इस उम्मीद पर भी पानी फेर दिया है कि उनका नेता राष्ट्रपति भवन में काबिज होगा.


अब ऐसा हो सकता है कि विपक्षी उम्मीदवार सिन्हा को कड़ी मेहनत करनी होगी. उन्हें उन सभी दलों, जिन्होंने उनके नाम का समर्थन किया है, को मनाना होगा कि वे उन्हें ही वोट दें. अब झारखंड के सभी सांसदों और विधायकों को एक विचित्र स्थिति का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि एक तरह से यह अब झारखंड बनाम झारखंड का मुकाबला बन गया है, जहां एक ओर मुर्मू हैं और दूसरी ओर सिन्हा. इससे झारखंड में सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के लिए अब सिन्हा को वोट देना मुश्किल हो सकता है. यदि पार्टी मुर्मू के खिलाफ मतदान करती है तो हो सकता है कि झामुमो के आदिवासी मतदाता इसे पसंद न करें.

मुर्मू संभावित क्रॉस-वोटिंग के कारण भारी अंतर से जीत सकती हैं

कमोबेश इसी तरह की दुविधा अब पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के आदिवासी सांसदों और विधायकों की है. यहां अभी कांग्रेस की सरकार है. मुर्मू के खिलाफ वोट कर कोई भी अपने आदिवासी मतदाताओं के सामने खलनायक नहीं बनना चाहेगा. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के आदिवासी नेता और इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. बीजेपी के इस कदम ने यह भी सुनिश्चित कर दिया है कि बिहार में बीजेपी से नाराज चल रही जनता दल-यूनाइटेड, कम से कम 18 जुलाई से पहले बीजेपी को छोड़ने और राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिलाने के बारे में सोच भी नहीं पाएगी.


मुर्मू के खिलाफ मतदान करने में कई तरह के जोखिम हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महिला मतदाताओं के समर्थन से चुनाव जीतते रहे हैं. वह एक महिला के खिलाफ वोट देकर बीजेपी के खिलाफ अपना गुस्सा नहीं निकाल सकते. इसके अलावा द्रौपदी मुर्मू को मैदान में उतारने के फैसले का असर राष्ट्रपति चुनाव खत्म होने के बाद भी हो सकता है. क्योंकि नवंबर-दिसंबर 2023 और 2024 के बीच छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और इन राज्यों में आदिवासियों की अच्छी-खासी आबादी है. इनमें से किसी भी राज्य में बीजेपी सत्ता में नहीं है.


पूर्वोत्तर के तीन आदिवासी राज्यों मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में भी 2023 में चुनाव होने हैं. भारत का राष्ट्रपति होने के नाते एक आदिवासी महिला पूर्वोत्तर में चुनावों को प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि पूर्वोत्तर की जनजातियों और देश के बाकी हिस्सों की जनजातियों में भारी अंतर है. पहले लग रहा था कि यह चुनाव करीबी मुकाबला वाला हो सकता है क्योंकि बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास इलेक्टोरल कॉलेज के मामले में बहुमत थोड़ा कम था, लेकिन अब मुर्मू संभावित क्रॉस-वोटिंग के कारण भारी अंतर से जीत सकती हैं. और इस क्रॉस-वोटिंग की वजह केवल एक आदिवासी को पहली बार इस गणतंत्र के 15वें राष्ट्रपति के रूप में देखने के लिए हो सकती है. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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