रायबरेली मामले में सजा माता-पिता को मिलनी चाहिए, आखिर उन्होंने ही अपने बेटों को जाति का विशेषाधिकार सिखाया है

Arrest

रायबरेली में तथाकथित उच्च जातियों के सात लड़कों को गिरफ्तार कर लिया गया है. इन लड़कों ने एक दलित स्कूली छात्र को धमकाकर उनमें से एक को गुलामों की तरह पैर चाटने के लिए मजबूर किया था. निष्पक्ष रूप से अगर कहा जाए तो जातियों में बंटे समाज के निचले स्तरों के खिलाफ अत्याचार में न के बराबर कमी दिखाई दे रही है. लेकिन जो वीडियो वायरल हुआ है वह एक ऐतिहासिक जख्म के उपर पड़ी परत को कुरेद रहा है और फिर से खून रिसने लगा है. लड़के को उसकी औकात सिखाई जा रही थी. विशेषाधिकार का एक शाही लेबल! ये जान लें कि आपकी जगह क्या है! यहां तक कि समाज में मौजूद श्रेष्ठ और हीन किताबें भी आनुवंशिक श्रेष्ठता से आगे नहीं बढ़ पाई हैं.

हमारे देश में सामाजिक भेद और सामाजिक निंदा के स्तंभ को निरंतर बनाए रखा जा रहा है. ये सात लड़के वास्तव में मानते हैं कि वे एक ईश्वर के दिए गए अधिकार का प्रयोग कर रहे थे. हम इसे इनकार तो करते हैं लेकिन फिर भी करते हैं. एक भद्दी हकीकत ये है कि हम जुबानी सेवा तो करते हैं लेकिन इसके कथनी और करनी में काफी अतंर होता है. अभी हाल ही में इसी राज्य में जाति के आधार पर चुनाव हुए थे. हर राजनीतिक दल ने जातिगत समीकरणों की बात की और एक भी उम्मीदवार ऐसा नहीं था जो खड़ा होकर ये कहे कि हमें जाति से कुछ लेना-देना नहीं है, सभी की जिंदगी मायने रखती है, हम सभी की जाति सिर्फ मानवता है. एक ने भी ये नहीं कहा.

माता-पिता को बुलाएं और उन्हें आर्थिक रूप से दंडित करें

अगर ये वीडियो वायरल नहीं होता तो ये अपमानित युवा लड़के हमले को खामोशी से बर्दाश्त कर लिए होते या फिर जीवन भर अपमान और पूर्वाग्रह को झेलते रहते. लेकिन सवाल है कि क्या अपराधियों को भी उसी तरह सबक सिखाया गया है. उन्हें मज़ा आ रहा था क्योंकि उन्हें उनकी हैसियत उन्हें ताकतवर बनाती है. बिना वक्त गंवाए अखिलेश यादव ने यह घोषणा की कि लड़कों से निपटा जाएगा. लेकिन कैसे? किस कानून के तहत? आखिर हमें किस उद्देश्य की प्राप्ति होती है जब हम जाति के राक्षस को और ताकतवर बनाते रहते हैं. आप अगर एक मिसाल स्थापित करना चाहते हैं तो माता-पिता को बुलाएं और उन्हें आर्थिक रूप से दंडित करें. इस तरह की क्षतिपूर्ति के तहत माता, पिता और पूरी बिरादरी को अपने लड़कों के अपराधों के भुगतान के लिए मजबूर किया जाना चाहिए. ताकि उन्हें सबक मिले और पूरी बिरादरी को शर्मिंदगी से गुजरना पड़े. तभी स्पष्ट रूप से ये संदेश आगे जाएगा कि जाति प्रथा को सचमुच हटा दिया जाना चाहिए.

बलात्कार के इतिहास की तुलना में पैर चाटने की क्या कीमत है

इस घटना पर इजहार किया जाने वाला हमारा पाखंड और नेक आक्रोश सच्चाई का मजाक उड़ाता है. हम जाति पर इतना अधिक ध्यान देते हैं कि ईसाई और मुसलमान भी इसे मानने लगे हैं. आइए दिखावा करना बंद करें. क्रूर तथ्य यह है कि कई उच्च जाति के घरों में लड़कों के प्रति सहानुभूति होगी और इसकी व्याख्या वे ‘नटखट लड़कों’ के चश्मे से कर रहे होंगे. आखिरकार, क्या हम वही देश नहीं हैं जहां एक बलात्कार आरोप के संदर्भ में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि लड़के लड़के ही होंगे और वे गलतियां करते हैं. और वे कोई अकेला उदाहरण नहीं हैं. ओम प्रकाश चौटाला ने ज्ञान का भंडार उड़ेलते हुए कहा था कि बलात्कार से बचने के लिए लड़के और लड़कियों को जल्दी शादी करनी चाहिए. ममता बनर्जी ने हमें बताया कि बलात्कार इसलिए होता है क्योंकि लड़के और लड़कियां खुलकर बातचीत करते हैं. और निचली जातियां निस्संदेह अभी भी निशाने पर हैं. उनके साथ बलात्कार के इतिहास की तुलना में पैर चाटने की क्या कीमत है.

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