यह जरूरी तो नहीं कि कांग्रेस अध्यक्ष गांधी परिवार से ही हो, पी. जे. कुरियन ने कुछ गलत तो नहीं कहा

P. J. Kurien

कांग्रेस पार्टी (Congress) के वरिष्ठ नेता पी. जे. कुरियन (P. J. Kurien) का अभी हाल ही में एक बयान आया, जिसमें उन्होंने गांधी परिवार के नेतृत्व के क्षमता पर एक बड़ा सवाल उठा दिया है. कुरियन ने एक मलयाली पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह जरूरी नहीं है कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से ही हो. कुरियन की बात हल्के में नहीं ली जा सकती है. वह 81 वर्ष के बुजुर्ग नेता हैं. 1980 से 1999 के बीच लगातार 6 बार लोकसभा के सदस्य चुने गए, यानि तब भी जब 1989, 1996 और फिर 1998 में देश में कांग्रेस पार्टी के खिलाफ माहौल था. 1991 से 1996 के बीच वह नरसिम्हा राव (P. V. Narasimha Rao) सरकार में मंत्री भी थे.

फिर 2006 से 2018 तक लगातार दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे. एक सांसद के रूप में उनकी पारी 31 वर्षों की रही और 2012 से 2018 तक वह राज्यसभा के उपाध्यक्ष रहे. 2018 में राज्यसभा सदस्य के रूप में रिटायर होने के बाद, जैसी कि अब कांग्रेस पार्टी में एक नई परंपरा बन गयी है, पार्टी ने उन्हें भुला दिया. अब वह अपने गृह प्रदेश केरल में रहते हैं. कुरियन G-23 नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं, जो कांग्रेस पार्टी में आतंरिक चुनाव की लगातार मांग करते रहे हैं, पर पार्टी में ऐसे नेताओं की सुनने और उन्हें सम्मान देने की जगह उन्हें बागी नेताओं में गिना जाता है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है.

जवाबदेही तय होनी चाहिए

कुरियन ने इंटरव्यू में राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा कि राहुल गांधी ना तो खुद पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते हैं और ना ही किसी और को अध्यक्ष बनते देखना चाहते हैं. पार्टी को जब 2019 के चुनाव में हार के बाद उनकी जरूरत थी, वह पार्टी को बीच मजधार में छोड़ कर चले गए. कुरियन ने राहुल गांधी के फैसला लेने की क्षमता पर भी सवाल उठाया और कहा कि वह हमेशा अपने चमचों से घिरे होते हैं और उन्ही की सुनते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष नहीं होने के बावजूद सभी अहम् फैसले राहुल गांधी ही लेते हैं.


इसमें कोई शक नहीं है कि राहुल गांधी ठीक उसी तरह सुपर प्रेसिडेंट बन गए हैं जैसे कि उनकी मां सोनिया गांधी 2004 से 2014 तक सुपर पीएम थीं. सुपर पीएम हों या सुपर प्रेसिडेंट, इसका मतलब होता है बिना जिम्मेदारी लिए और बिना जवाबदेही के राज करना. सभी जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी में सभी फैसले राहुल गांधी लेते हैं और सोनिया गांधी महज उस पर अपनी मुहर लगाती हैं. उनकी गलत या त्रुटिपूर्ण निर्णयों के कारण ही कांग्रेस पार्टी की आज यह हाल है कि उसे अस्तित्व में रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और पार्टी को एक के बाद एक चुनाव में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ रहा है. हालत यह है कि 2014 से लोकसभा में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं है क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस पार्टी के पास न्यूतम निर्धारित 10 प्रतिशत सांसद भी नहीं हैं. पंजाब में चुनाव हारने के बाद अब कांग्रेस पार्टी की सरकार सिर्फ राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ही रह गयी है.


कुरियन का यह कहना कि यह जरूरी नहीं कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से ही हो सोलह आने सही है. पार्टी के संविधान में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है. पर वास्तविकता है कि वर्ष 2000 के बाद से पार्टी में अध्यक्ष पद का चुनाव हुआ ही नहीं है, चुनाव के नाम पर किसी को गांधी परिवार के विरुद्ध नामांकन भरने की इजाजत नहीं दी जाती है, और किसी ने ऐसी जुर्रत की तो उसका भी वही हाल होता जो जितेन्द्र प्रसाद का हुआ था, जब वह सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े थे और फिर उनको इस तरह हेय दृष्टि से देखा जाने लगा कि उसके 14 महीनों के बाद हृदयगति रुकने के कारण उनका निधन हो गया.

आंतरिक चुनाव जरूरी है

पिछले 24 वर्षों से पार्टी पर गांधी परिवार का आधिपत्य है. जितेन्द्र प्रसाद ही नहीं, जो भी गांधी परिवार के रास्ते में आया उसे ऐसे बेइज्जत किया गया, मानो उसने कोई अपराध कर दिया हो. 1998 की बात है जब सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने की जल्दबाजी में तात्कालिक अध्यक्ष सीताराम केसरी को घंटो कांग्रेस मुख्यालय में एक कमरे में बंद कर दिया गया और बाद में वहां से उन्हें धक्का मार कर निकाला गया. आतंरिक चुनाव नहीं होने का ही नतीजा है कि पार्टी में नए नेता चुनाव जीत कर सामने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि अब सभी पदों पर चुनाव की जगह नामांकन की परंपरा बन गयी है. राज्यों में भी पार्टी से सम्बंधित सभी फैसला केन्द्रीय नेतृत्व लेता है, और केंद्र में किसकी चलती है वह सभी जानते हैं. एक के बाद एक कई नेता पार्टी छोड़ कर इस लिए चले गए कि पार्टी में सिर्फ चापलूसों की ही सुनी जाती है और उभरते हुए या लोकप्रिय नेताओं को नज़र अंदाज़ किया जाता है.


खबर है कि कांग्रेस पार्टी में एक बार फिर से चुनाव होने वाला है. चुनाव के पूर्व नियमों के अनुसार सदस्यता अभियान ख़त्म हो चुका है जिसकी शुरुआत राहुल गांधी से हुई और अंत सोनिया गांधी से, यानि सदस्यता अभियान में भी पार्टी चापलूसों से ही घिरी रही, जिसका नतीजा है कि मात्र 2.60 करोड़ लोगों ने ही पार्टी की सदस्यता ग्रहण की है, जो काफी कम और निराशाजनक माना जा सकता है. देखना होगा की आतंरिक चुनाव की विधिवत घोषणा कब होती है और क्या राज्यों में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होगा या फिर जिसके सर पर गांधी परिवार का हाथ होगा उन्हें निर्विरोध चुना जाएगा.


कुरियन ने यह भी कहा कि उन्हें या G-23 के किसी नेता को इससे आपत्ति नहीं है अगर राहुल गांधी एक बार फिर से कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाते हैं, पर वह चुनाव चाहते हैं, क्योंकि राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद से पिछले ढाई वर्षों से सोनिया गांधी आतंरिक अध्यक्ष के रूप में पार्टी में पदासीन हैं. इतना तो तय है कि अगर सही ढंग से और निष्पक्ष चुनाव सही समय से नहीं हुआ तो फिर बीजेपी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना जल्द ही साकार हो जाएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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