मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट का मंथन, मौत की सजा को लेकर गाइडलाइंस बनाएगी शीर्ष अदालत, अटॉर्नी जनरल से मांगी राय

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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा है कि वो मृत्युदंड की सजा प्रक्रिया को लेकर विस्तृत गाइडलाइंस बनाएगा. ये गाइडलाइंस फांसी की सजा के मामलों में सभी अदालतों में लागू होगी. कोर्ट ने इस पर नेशनल लीगल सर्विस ऑथोरिटी को नोटिस जारी किया है और इस मसले पर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को भी अपनी राय रखने को कहा है. दरअसल, 30 मार्च को फांसी की सजा पाए कैदियों की सुध लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड प्रक्रिया की समीक्षा के लिए स्वत: संज्ञान लेकर मामला दायर करने के बाद अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की मदद मांगी थी.

जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने मृत्युदंड की प्रक्रिया की जांच के लिए गाइडलाइंस निर्धारित करने का फैसला लिया. इसके लिए उन्होंने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) के सदस्य सचिव को नोटिस जारी किया. सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों की व्यापक जांच करने का फैसला किया था जहां एक जज को आजीवन कारावास और मौत की सजा के बीच चयन करना था. इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों में जानकारी को कम करने के आकलन की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई थी.

किन मामलों में मिल सकती है मौत की सजा

आपराधिक प्रक्रिया के प्रावधानों के तहत मौत की सजा को आजीवन कारावास के वैकल्पिक सजा के रूप में दिया जाता है. इसे ऐसे समझ लीजिए कि ये अपराधी को दी जाने वाली ‘दुर्लभ सजा’ है. जब तक कि अपराध इतना घिनौना और बड़ा न हो, जल्दी मौत की सजा नहीं मिलती है. सजा को लेकर कहा जाता है कि इसे बहुत ही कम बार दिया जाना चाहिए. मौत की सजा केवल उन मामलों में दी जानी चाहिए, जहां बहुत ही घिनौना अपराध किया गया है. आमतौर पर यह हत्या, बलात्कार, देशद्रोह आदि अत्यंत गंभीर मामलों में दिया जाता है.

मृत्युदंड के पक्ष-विपक्ष में क्या तर्क है?

मौत की सजा देने के पक्ष में रहने वाले लोगों का कहना है कि अगर हत्या या किसी घिनौने अपराध को अंजाम देने वाला व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के जीन के अधिकार को छीन लेता है. ऐसे में अपराध करने वाले व्यक्ति का भी जीवन का अधिकार समाप्त होना चाहिए. कुछ लोगों का कहना है कि मृत्युदंड एक निवारक के तौर पर भी काम करता है. अगर किसी अपराधी को मौत की सजा दी जाती है, तो सरकार या अदालत उसे भविष्य में हत्या जैसे अपराध को करने से रोक देती है. इसके अलावा, ये भी कहा जाता है कि अपराधी को मौत की सजा देने पर पीड़ित परिवारों को राहत मिल जाती है.

वहीं, मृत्युदंड के विपक्ष में रहने वाले लोगों का कहना है कि मौत की सजा मिलने के बाद भी देश में दुष्कर्म और हत्या के मामले जस से तस बढ़ रहे हैं. ऐसे में इसे निवारक के रूप में नहीं देखा जा सकता है. मृत्युदंड के खिलाफ सबसे आम तर्क ये दिया जाता है कि न्याय प्रणाली में अगर गलती या खामी हुई तो उसकी वजह से देर-सबेर निर्दोष लोग मारे जा सकते हैं. वहीं, ये भी कहा जाता है कि अगर किसी अपराधी को मौत की सजा दी जाती है, तो उसे पुनर्वास नहीं मिल पाता है.

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