मध्यप्रदेश सरकार ने माओवादियों के विस्तार की योजना को तगड़ा झटका दिया है – तीन कमांडर ढेर

Naxals Chhattisgarh

मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में तीन दशकों में सबसे बड़े नक्लसी-माओवादी विरोधी अभियान के तहत राज्य पुलिस की स्पेशल हॉक फोर्स ने सोमवार सुबह बालाघाट जिले के एक जंगल में एक महिला कमांडर सहित तीन माओवादियों (Naxalite Leader) को मार गिराया. तीनों पर कुल मिला कर 57 लाख रुपये का इनाम था और पुलिस (Madhya Pradesh Police) को कई राज्यों में इनकी तलाश थी. मध्य प्रदेश के बालाघाट और मंडला जिलों में कई साल से अपने लिए सुरक्षित पनाहगाह बनाने की कोशिश कर रहे माओवादियों को पुलिस की कार्रवाई से तगड़ा झटका लगा है. छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में अपने ठिकानों को छोड़ने के बढ़ते दबाव में लगभग 300 उग्रवादी एमपी के इन दोनों जिलों में घुसपैठ करने में सफल रहे हैं.

अपने कैडर को मध्य प्रदेश शिफ्ट कर रहे हैं माओवादी

छत्तीसगढ़ पुलिस और नक्सली विरोधी दस्तों का लगातार शिकार बनने के कारण रणनीतिक रूप से कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और भोरमदेव टाइगर रिजर्व के घने जंगलों में अपने कैडर को स्थानांतरित कर रहे हैं. कान्हा और भोरमदेव दोनों ही मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा पर मौजूद घने जंगल के माध्यम से आपस में जुड़े हैं. चूंकि कान्हा-भोरमदेव क्षेत्र में दक्षिण बस्तर के इलाकों की तुलना में एक से दूसरी जगह जाना ज्यादा मुश्किल है, इसलिए माओवादी अपने फायदे के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं और नए कैडर की भर्ती करके अपने सैन्य विंग को दोबारा मजबूत कर रहे हैं. कान्हा-भोरमदेव-अमरकंटक का वन क्षेत्र काफी दुर्गम है और यहां पुलिस आमतौर पर नहीं आती है इसलिए ये इनके लिए अच्छा ठिकाना बन गया है.

चार साल में पांच मुठभेड़ों में 10 माओवादी मार गिराए गए

छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के साथ लगी मध्य प्रदेश की सीमा पर आदिवासी बहुल इलाके में राज्य पुलिस की कड़ी निगरानी के बावजूद उग्रवादी हाल के वर्षों में अपनी हिंसक गतिविधियों को बढ़ाने में सफल रहे हैं. इलाके में माओवादियों की बढ़ती मौजूदगी ने मध्य प्रदेश सरकार को यहां पर रिजर्व पुलिस बल की छह कंपनियों को तैनात करने के लिए मजबूर कर दिया है. यह पहले से तैनात सीआरपीएफ बटालियन और एमपी पुलिस की नक्सल विरोधी विंग हॉक-फोर्स के अतिरिक्त है.

एमपी पुलिस ने चार साल में पांच मुठभेड़ों में तीन महिलाओं समेत 10 माओवादियों को मार गिराया है. हालांकि, सोमवार की मुठभेड़ एमपी पुलिस के लिए सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है क्योंकि मारे गए लोग स्वयंभू एरिया कमांडर थे जिन्हें मध्य प्रदेश में भूमिगत माओवादी गतिविधियों के विस्तार करने का काम सौंपा गया था. एमपी पुलिस की हॉक फोर्स टीम ने क्षेत्र में माओवादियों की गतिविधियों के बारे में विशेष खुफिया जानकारी मिलने के बाद उन्हें चुनौती देने की तैयारी की. मुठभेड़ बालाघाट जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर और महाराष्ट्र सीमा से 1 किलोमीटर से भी कम दूर बहेला के जंगल में हुई.

मारे गए नक्सलियों के सिर पर था कुल 57 लाख रुपये का इनाम

मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने घोषणा की कि हॉक फोर्स ने माओवादी संभागीय समिति के सदस्य नागेश को मुठभेड़ में मार गिराया है जिस पर 29 लाख रुपये का इनाम था. स्वंभू एरिया कमांडर मनोज और रामे के सिर पर 14-14 लाख रुपये का इनाम था. जब्त की गई तीन आग्नेयास्त्रों में एक एके47 भी शामिल है. यह पहली बार है जब एमपी में माओवादियों के पास से एके47 बरामद हुई है. नागेश महाराष्ट्र के गढ़चिरौली का रहने वाला था और तीन महीने में बालाघाट सहित कई हिंसा की वारदातों में शामिल था. मनोज बस्तर का था और रामे छत्तीसगढ़ के सुकमा का. यह मुठभेड़ बालाघाट जिले के कान्हा नेशनल पार्क के पास माओवादियों के एक वनकर्मी की हत्या के करीब तीन महीने बाद हुई.

लाल आतंक की तीन घटनाएं

पिछले साल 21 दिसंबर को बालाघाट जिले में सड़क निर्माण के काम में लगे मजदूरों की 30 से 35 माओवादियों ने कथित तौर पर पिटाई की थी. उन्होंने मजदूरों को साइट पर मौजूद मशीनों को आग लगाने को मजबूर भी किया. इसी तरह की घटनाएं 3 और 6 दिसंबर को जिले के कोरका और बोदलझोला इलाकों में सड़क निर्माण परियोजनाओं में बाधा उत्पन्न करने के उद्देश्य से हुईं. उग्रवादियों ने गढ़चिरौली मुठभेड़ में विद्रोहियों के मारे जाने के विरोध में 10 दिसंबर को मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में बंद का आह्वान करने वाले पर्चे फेंके. पर्चे में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में 13 नवंबर को पुलिस मुठभेड़ में प्रमुख माओवादी नेता मिलिंद उर्फ ​​दीपक तेलतुम्बडे (57) सहित 26 माओवादियों के मारे जाने का जिक्र रहा, जिन पर 50 लाख रुपये का इनाम था.

मध्य प्रदेश- महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ क्षेत्र

मारे गए कमांडर मिलिंद को मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ क्षेत्र में कैडर के विस्तार और मजबूती का काम सौंपा गया था. मध्य प्रदेश के नक्सल ऑपरेशन आईजी साजिद शापू ने कहा: “माओवादी अपने प्रभुत्व को दोबारा कायम करने फिर से पूरी कोशिश कर रहे हैं और यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि दीपक की मौत ने उन्हें कमजोर नहीं किया है. लेकिन यह सच नहीं है. हम राज्य से माओवादी खतरे को खत्म करने के लिए सब कुछ कर रहे हैं.”

मंडला और डिंडोरी भी उग्रवाद की चपेट में

बालाघाट के अलावा मध्य प्रदेश के मंडला और डिंडोरी जिलों में माओवादियों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. 2018 और 2021 के बीच वे वामपंथी चरमपंथियों से प्रभावित जिलों की सूची में शामिल थे. कुछ वर्षों से माओवादियों ने अपना ध्यान कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर मौजूद भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिया है. 2016-17 में माओवादियों ने एमएमसी ज़ोन बनाया जो तीन राज्यों के ट्राई-जंक्शन पर मौजूद जिलों में है. उन्होंने जोन में दो डिवीजन भी बनाए हैं, गोंदिया-राजनांदगांव-बालाघाट डिवीजन और कान्हा-भोरमदेव डिवीजन. एमएमसी क्षेत्र के तहत सीपीआई (माओवादी) ने कान्हा-भोरमदेव (केबी) के साथ दो डिवीजन बनाए हैं.

विस्तार दलम की उपस्थिति

इससे पहले उन्होंने गोंदिया-राजनांदगांव-बालाघाट (जीआरबी) को महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्रों पर अपने लिए एक सुरक्षित जगह बनाने के लिए तैयार किया. कान्हा-भोरमदेव संभाग क्षेत्र में अपने विस्तार को तेज करने और सक्रिय रूप से नए कार्यकर्ताओं की भर्ती करने के लिए 200 से अधिक माओवादियों वाले विस्तार दलम (समूह) की मौजूदगी भी यहां देखी गई.

पहले समर्पण कर चुके कमांडर दीपक के पूर्व करीबी सहयोगियों ने पुलिस पूछताछ में इस बात की पुष्टि की है. सोमवार की मुठभेड़ महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने 13 नवंबर को दीपक तेलतुम्बडे की हत्या के कारण नेतृत्व में खालीपन को भरने की माओवादियों की योजना को विफल कर दिया. उसी दिन माओवादियों ने बालाघाट जिले के बैहर थाना क्षेत्र में दो ग्रामीणों को इस संदेह में मार डाला कि वे मलिकेड़ी गांव में पुलिस के मुखबिर थे.

कान्हा माओवादियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

एमएमसी विकसित करने के प्रमुख कारणों में से एक झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा का अमरकंटक के जंगलों के करीब होना है. यह इन राज्यों में उग्रवादियों को जंगल में सुरक्षित जगह प्रदान करता है. यह झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और मध्य प्रदेश से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ गलियारा भी है. शुरुआत में 40-50 विद्रोहियों के एक छोटे से दल को ‘विस्तार दलम’ के तहत क्षेत्र, वहां के भूभाग और राजनीति और सार्वजनिक मुद्दों को समझने के लिए भेजा गया.

हाल के दिनों में मुठभेड़

उनके इस प्रयास को पुलिस ने पिछले साल 12 फरवरी को नाकाम कर दिया. मंडला जिले में कथित तौर पर नए सदस्यों की भर्ती के लिए गई एक महिला सहित दो संदिग्ध माओवादियों को मार गिराया गया. पुलिस के मुताबिक वे दरेकसा दलम और मलजखंड दलम से जुड़े हुए थे. इसके अलावा पुलिस का कहना है कि दोनों ने क्षेत्र समिति के सदस्यों के रूप में काम किया और तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ – में उनके सिर पर 28 लाख रुपये का संयुक्त इनाम घोषित था.

2020 में बालाघाट पुलिस ने रात भर के ऑपरेशन में दो महिला माओवादियों – सावित्री उर्फ ​​​​आयते (24) और शोभा (30) को मुठभेड़ में मार गिराया. छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की एक और महिला माओवादी को 4 नवंबर को बालाघाट जिले में गोली मार दी गई. मारी गई माओवादी शारदा कटिया-मोचा-विस्तार-दलम से जुड़ी थी. उसके सिर पर तीन लाख रुपये का इनाम था.

क्षेत्र में सक्रिय छह समूह

अधिकारियों के अनुसार बालाघाट और मंडला जिलों में पहले से ही 6 दलम (समूह) काम कर रहे हैं. केबी डिवीजन भी तेजी से भर्ती प्रक्रिया चला रहा है. बालाघाट के पुलिस अधीक्षक अभिषेक तिवारी का कहना है कि नए नक्सलियों को दक्षिणी क्षेत्रों से बालाघाट और मंडला जिलों में भेजा जा रहा है जिस कारण बालाघाट में उग्रवादियों की संख्या बढ़ गई है. जनवरी 2021 में 100 से अधिक माओवादी कथित तौर पर मध्य प्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आ चुके हैं लेकिन इस ताजा मुठभेड़ के बाद उम्मीद है कि विद्रोही बैकफुट पर आ जाएंगे. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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