भीमराव आंबेडकर और नरेंद्र मोदी के बीच समानता दिखाकर इलैयाराजा ने बस अपना आदर्श ही बदला है

Ilaiyaraaja Old Summons

दक्षिण भारतीय संगीत निर्देशक इलैयाराजा (Ilaiyaraaja) ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) पर तैयार की गई एक किताब की प्रस्तावना लिखी है. इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री और डॉ. बी आर अंबेडकर (Dr B R Ambedkar) के बीच कुछ समानताएं दिखाई हैं. इस बात ने भले ही कुछ राजनीतिक विवाद पैदा किया हो, लेकिन जो लोग इलैयाराजा को करीब से जानते हैं या देखते हैं, तो उनके हैरान होने की संभावना बेहद कम है. उनके लिए, यह न तो कोई मुद्दा है और न ही कोई दिमाग लगाने वाली बात. समय के साथ इलैयाराजा अब पहले जैसे कम्युनिस्ट नहीं रहे और न ही एक राजनीतिक द्रविड़ियन रहे जैसे कि एक दौर में उनके जीवन और करियर को लेकर लग रहा था.

संगीत और जीवन के अनुभवों में उनकी यात्रा लंबी है और पिछले कई वर्षों से कर्नाटक शैली के संगीतकारों – जो कि संयोग से तमिल ब्राह्मण हैं. में पवित्रता और सम्मान के प्रतीक माने जाते हैं. एक गरीब वामपंथी विचारधारा की ओर झुके दलित लड़के के ब्राह्मणों के आदर्श में बदलने की प्रक्रिया यही दर्शाती है कि वे नरेंद्र मोदी की विचारधारा और व्यक्तित्व के साथ सहज महसूस करते हैं. ऐसे में यह मानना भी उचित ही कहा जाएगा कि वे निश्चित रूप से मानते हैं कि अंबेडकर ने अपने जीवन में जो किया है, वही वर्तमान में मोदी कर रहे हैं.

इलैयाराजा आध्यात्म और हिंदू-विश्वासों में भी आस्था रखते हैं

ग्रामीण मदुरै में एक गरीब दलित से अलवरपेट-मायलापुर के देवता (उनको कई कर्नाटक संगीतकार भगवान भी कहते हैं) बनने की ऊंचाई तक पहुंचने की इलैयाराजा की कहानी एकदम वास्तविक है, जबकि वर्तमान का मोदी-अंबेडकर शोर केवल एक प्रतिध्वनि है. तमिलनाडु में इस तरह की उल्लेखनीय यात्रा का कोई और उदाहरण सामने नहीं आता है. तमिलनाडु में किसी भी दलित ने अभी तक उनकी तरह उच्च जाति के हिंदुओं बल्कि ब्रह्माणों के बीच ऐसा सम्मान नहीं पाया है. यह बात तब और बड़ी हो जाती है जब उनकी जाति राज्य में अभी भी भयानक अत्याचारों का सामना करती नजर आती है.


पिछले कुछ वर्षों में, मैंने कई प्रमुख कर्नाटक संगीतकारों से बात की है और सभी से मुझे यही जवाब मिला कि वे कर्नाटक शैली के संगीत में उनकी प्रतिभा और उन पारंपरिक मूल्यों के लिए उनकी पूजा करते हैं, जिसके लिए वे हमेशा खड़े नजर आते हैं. जिस रचनात्मक और विपुल रूप से इलैयाराजा कर्नाटक शैली के संगीत को मुख्यधारा की फिल्मों में पिरोते हैं, वैसा करिश्मा संगीत के मोर्चे पर कोई भी अन्य लोकप्रिय संगीतकार नहीं कर पाया है. वास्तव में, कुछ संगीतकार उनसे इतने प्रभावित हैं कि वे उनके गीतों से राग वाक्यांशों का भी उसी सम्मान के साथ उपयोग करते हैं जैसा कि त्यागराज या दीक्षितार रचना का किया जाता है.


इलैयाराजा आध्यात्म और हिंदू-विश्वासों में भी आस्था रखते हैं. वह रमण महर्षि के भी अनुयायी हैं, जो 20 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में एक हिंदू संत थे. इलैयाराजा 2018 में उस समय विवादों में आ गए थे जब एक बयान में उन्होंने कहा था कि पुनरुत्थान प्राप्त करने वाले यीशु मसीह नहीं बल्कि केवल रमण महर्षि थे जो एक 16 वर्षीय लड़के के रूप में आए थे. संभवत: रमण महर्षि की भक्ति ने उनको इस हिंदू आध्यात्मिक आभा को हासिल करने में मदद की होगी.

इलैयाराजा को खास जगह मिलने के और भी कारण हैं

इसके अलावा, वह अक्सर अपनी रचनात्मकता का श्रेय किसी अज्ञात दैविक शक्ति को देते हैं. कर्नाटक शैली के संगीत का पारिस्थितिकी तंत्र भी एक प्रकार की सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक विश्वास पर टिका है. इलैयाराजा जाने-अनजाने में इस व्यवस्था का एक हिस्सा बन गए हैं या यूं कहा जाए कि वे अपने समुदाय की अनकही स्वीकृति के साथ सहजता से इसमें शामिल हो चुके हैं.


नरेंद्र मोदी निश्चित रूप से उस सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में एक सम्मानित व्यक्ति हैं. इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वे भी जाहिर तौर पर उनका इतना सम्मान करते हैं. ऐसे में अम्बेडकर भले ही उनकी पिछली सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था के आइडल रहे हों, लेकिन वर्तमान आदर्श नरेंद्र मोदी ही हैं. हिंदू उच्च जाति की सांस्कृतिक जगह में इलैयाराजा को खास जगह मिलने के और भी कारण हैं. दरअसल इलैयाराजा ने अपने करियर के शुरुआती वर्षों में कर्नाटक शैली के महान संगीतकार टी. वी. गोपालकृष्णन से प्रशिक्षण लिया था.


भारतीय रागों में इलैयाराजा की प्रवीणता का श्रेय कई लोग गोपालकृष्णन द्वारा उनकी दी गई दीक्षा को देते हैं. उस समय जब लोकप्रिय धारणा यह थी कि तमिल ब्राह्मण संगीतकार गैर-ब्राह्मणों को प्रशिक्षण नहीं देंगे, टी.वी. ने उनको शिक्षा देने के लिए चुना – हो सकता है कि इससे भी उनके विचारों में बदलाव आया हो. देखा जाए तो कर्नाटक संगीतकारों की इस विशेषता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि वे अपनी कला से जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक और व्यवहारिक गुणों को अपनी शख्सियत में उतार लेते हैं और ये बात देखने वालों को स्पष्ट नजर भी आती है.

शिखर सम्मेलन के बाद वह अब पुराने इलैयाराजा नहीं रहे हैं

खास बात ये है कि ये सब बाहरी लोगों में विशेष रूप से अधिक स्पष्ट होता है. गायक के जे येसुदास ऐसा ही एक और उदाहरण हैं. लेकिन क्या इस सबमें कोई बुराई है? बिल्कुल नहीं बल्कि इसे एक ऐसी पैकेजिंग माना जाना चाहिए जो सभी तत्वों के बिना न तो पूर्ण दिखता है और न ही महसूस होता है.


संभवतः चेन्नई के सांस्कृतिक अभिजात वर्ग द्वारा इलैयाराजा की स्वीकृति का सबसे बड़ा सबूत मद्रास संगीत अकादमी से निमंत्रण के रूप में आया, जहां उन्होंने 2017 में वार्षिक सम्मेलन को संबोधित किया था. निश्चित रूप से यह ‘विशेषाधिकार’ उस अपरिवर्तनीय ऊंचाई का संकेत था जिस पर इलैयाराजा पहुंच चुके हैं. इस शिखर सम्मेलन के बाद वह अब पुराने इलैयाराजा नहीं रहे हैं.


परंपरा की इस दुनिया में प्रशंसकों की लंबी कतार भी व्यक्ति को एक ऊंचा ओहदा दिलाती है. लेकिन साथ ही सवाल ये भी है कि क्या भाजपा इस तरह इलैयाराजा को ए आर रहमान के सामने खड़ा कर रही है, जिनकी बातों से अक्सर परोक्ष रूप से ही सही, आलोचनात्मक संदर्भ नजर आता है? शायद हां, शायद नहीं. लेकिन इससे क्या कोई फर्क भी पड़ता है ? जवाब है हरगिज नहीं क्योंकि तमिलनाडु द्रविड़ भूमि है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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