भारत में संपत्ति वितरण के नजरिए से अमीरी और गरीबी की खाई और चौड़ी हुई

Poor People (2)

भले ही देश विकास की राह पर दोबारा तेजी से चल रहा है, लेकिन भारत के बेरोजगार (Unemployment Rate In India) परेशान हैं, यह ऐसा समय है जब देश के निचले तबके की आय घट रही है, जबकि दूसरे देशों में ऐसा नहीं है, वहीं दूसरी ओर अमीर लोग और अमीर होते जा रहे हैं. विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 (World Inequality Report 2022), जिसे पेरिस स्थित World Inequality Lab जारी करता है, में भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां आमदनी और संपत्ति के लिहाज से भारी असमानता है. साथ ही यहां यह असमानता तेजी से बढ़ भी रही है.

एक अनुमान के मुताबिक, 2020 तक देश की कुल आय में आधी आबादी की आमदनी का हिस्सा घटकर केवल 13 फीसदी ही था, जबकि ऊंची आय वाले टॉप 10 फीसदी लोगों के पास देश की कुल आय का 57 फीसदी हिस्सा था. यहीं नहीं, टॉप 1 फीसदी लोगों के पास तो 22 फीसदी हिस्सा था. इस रिपोर्ट में डाटा का आंकलन करने में काफी कठिनाई हुई. रिपोर्ट के मुताबिक, “पिछले तीन वर्षों में, सरकार द्वारा जारी असमानता के आंकड़ों की गुणवत्ता बहुत खराब हुई है, जिससे मौजूदा असमानता का आकलन करना कठिन हो गया है.”

महामारी अमीरों के लिए फायदेमंद साबित हुई

संपत्ति के वितरण के मामले में, अमीर-गरीब का अंतर और भी अधिक है. पिछले कुछ दशकों के दौरान दुनिया भर में संपत्ति का जमाव भी बढ़ रहा है. शीर्ष 52 अरबपतियों (जिनमें मुकेश अंबानी और गौतम अडानी शामिल हैं) की संपत्ति में 1995 और 2001 के बीच हर साल लगभग 10 फीसदी की वृद्धि देखी गई. भारत में निजी संपत्ति में बढ़ोतरी की दर और ऊपरी स्तर पर इसके जमाव में काफी तेजी आई है. आबादी के आधे कमजोर हिस्से के पास कुल संपत्ति का महज 6 फीसदी हिस्सा है, जबकि टॉप 1 फीसदी लोग एक-तिहाई हिस्से पर काबिज हैं और टॉप 10 फीसदी लोगों के पास कुल संपत्ति का करीब दो-तिहाई हिस्सा है.


गरीबों पर कहर बरपाने वाली कोरोना महामारी अमीरों के लिए और फायदेमंद साबित हुई. Oxfam की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के टॉप 10 सबसे अमीरों की संपत्ति दोगुनी हो गई, जबकि इस दौरान दुनिया के 99 फीसदी लोगों की संपत्ति कम हुई. गौतम अडानी की संपत्ति में सबसे अधिक बढ़ोतरी देखी गई, जो महामारी के दौरान आठ गुना बढ़ गई. Oxfam के अनुसार, उन्होंने देश का सबसे बड़ा पोर्ट ऑपरेटर और थर्मल कोल पावर प्रोड्यूसर बनने के लिए सरकार के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल किया. पावर ट्रांसमिशन, गैस डिस्ट्रीब्यूशन के बाजार पर उनका नियंत्रण हो चुका है. अब तो प्राइवेट हवाई अड्डे भी उनके पास हैं. एक समय में ये सेक्टर सार्वजनिक (सरकार) हाथों में होते थे.


2022 M3M Hurun Global Rich List के अनुसार, अडानी ने 2021 में अपनी कुल संपत्ति में हर हफ्ते 6,000 करोड़ रुपये जोड़े. पिछले एक साल में उनकी आय दोगुनी से अधिक हो गई, जिसमें 153 फीसदी की जोरदार वृद्धि हुई. पिछले एक दशक में उनकी कुल संपत्ति 1,830 फीसदी बढ़ी है. नतीजतन, इस सूची में उनका रैंक 313 से 12 पर पहुंच गया.

मुकेश अंबानी ने अपनी संपत्ति में 24 फीसदी की बढ़ोतरी की

इस रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने अपनी संपत्ति में 24 फीसदी की बढ़ोतरी की, और इसके साथ उन्होंने ‘भारत और एशिया का सबसे अमीर आदमी’ होने का खिताब अपने नाम किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि अंबानी की कुल संपत्ति में 72 फीसदी हिस्सा खुद से तैयार किया गया और 28 फीसदी हिस्सा पुश्तैनी है. अंबानी ने 20 साल में अपनी पुश्तैनी संपत्ति को 10 गुना बढ़ा दिया, जो 2002 में 10 अरब डॉलर था. Bloomberg Billionaires Index की ग्लोबल लिस्ट में मुकेश अंबानी 89.2 बिलियन डॉलर के अपने नेट वर्थ के साथ 10 वें पायदान पर हैं.


निजी संपत्ति में वृद्धि के साथ-साथ भारत में सार्वजनिक संपत्ति में कमी आई है, जो सार्वजनिक संपत्ति से मिली आमदनी को नागरिकों पर खर्च करने की इच्छुक सरकारों के लिए बुरी खबर है. विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में भारत में राष्ट्रीय आय के बनाम निजी संपत्ति का अनुपात 290 फीसदी से बढ़कर 555 फीसदी हो गया, जो दुनिया के इतिहास में सबसे तेज वृद्धि में से एक है.


सार्वजनिक संपत्ति की कीमत पर निजी संपत्ति में भारी बढ़ोतरी और अडानी-अंबानी की संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि, जिन्हें पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) अरविंद सुब्रमण्यम दो ‘As’ कहते हैं, से हम क्रोनी कैपिटलिज्म (एक ऐसी आर्थिक प्रणाली, जहां कारोबारियों, नेताओं और सरकारी अधिकारियों के बीच घनिष्ठ और लाभप्रद संबंध होता है) को बढ़ावा दे रहे हैं.

अरबपतियों की संपत्ति बढ़कर 29 फीसदी से 43 फीसदी हो गई

क्रोनी कैपिटलिज्म, आर्थिक ताने बाने को उन लोगों के लिए विकृत कर देता है जिनका सरकार से करीबी संबंध होता है, जहां अपने लिए फायदेमंद नीतियों और निर्णयों के एवज में कॉरपोरेट्स से ये नेता फंड (रिश्वत?) हासिल करते हैं. इसकी वजह से लोकतंत्र साथ-साथ शासन और आर्थिक विकास पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. यह व्यवस्था अन्य कारोबारियों को बाजार से बाहर करती है, साथ ही इससे दूसरे कारोबारियों और नए कारोबारियों का उत्साह कम होता है और उनकी ग्रोथ पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

अडानी अब भारत में सबसे बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर हैं, 2014 के बाद से सार्वजनिक हवाई अड्डों का निजीकरण कर उनके हाथों में सौंप दिया, जबकि उनके पास हवाई अड्डों का संचालन करने का कोई अनुभव या विशेषज्ञता नहीं थी, और वित्त मंत्रालय और नीति आयोग ने भी इस एकाधिकार के खिलाफ कड़ी आपत्ति दर्ज की थी. “The Economist” के क्रोनी कैपिटलिज्म इंडेक्स में भारत का स्थान 7वां है. इससे पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में हालात कितने बिगड़े हैं. 2016 में भारत का रैंक 9वां था. The Economist का कहना है, “भारत में छह वर्षों के दौरान क्रोनी सेक्टरों के अरबपतियों की संपत्ति बढ़कर 29 फीसदी से 43 फीसदी हो गई.”

टैक्स लगाने का वक्त

हालांकि इन सब में सरकार की कितनी भूमिका है इसके बारे में पर्याप्त विवरण नहीं हैं, लेकिन कुछ बातें संकेत जरूर देती हैं. क्रिस्टोफ़ जैफ्रीलॉट, अपनी किताब “Modi’s India: Hindu Nationalism and the Rise of Ethnic Democracy” में लिखते हैं कैसे, “अमीर और अमीर बन गए, और सरकार की कर नीति ने इस प्रवृत्ति को दुरुस्त करने के बजाय, इसे और मजबूत किया.” मोदी सरकार ने 1957 से लागू वेल्थ टैक्स को खत्म कर दिया. हालांकि इस टैक्स से मिलने वाली आय कभी भी बहुत अधिक नहीं थी, यह फैसला एक प्रतीकात्मक निर्णय से कहीं अधिक था. जिनकी आय सालाना 10 लाख रुपये से अधिक थी उनके लिए इनकम टैक्स को 2 फीसदी बढ़ाकर वेल्थ टैक्स को खत्म कर दिया गया.


चूंकि भारतीय आबादी का केवल 2 फीसदी हिस्सा ही टैक्स देता है, इसलिए टैक्स-जीडीपी अनुपात 11 फीसदी से नीचे रहा. इसमें सुधार लाने के बजाय, मोदी सरकार ने अप्रत्यक्ष करों को बढ़ाने का काम किया, यह टैक्स सभी को प्रभावित करते हैं, चाहे वह अमीर हो या गरीब. जैफ्रीलॉट लिखते हैं, “मोदी सरकार के दौरान राज्यों के वित्तीय संसाधनों में कुल करों के हिसाब से अप्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी बढ़कर 50 फीसदी तक पहुंच गई, जो यूपीए-वन में 39 फीसदी और यूपीए-टू में 44 फीसदी थी.”


“आर्थिक तर्कसंगतता के नाम पर मोदी सरकार ने 2015 में अपने पहले बजट से एक और नवउदारवादी कदम उठाया, और कॉर्पोरेट टैक्स को कम कर दिया. मौजूदा कंपनियों के लिए, इसे 30 से घटाकर 22 फीसदी कर दिया गया, और जिन कंपनियों की स्थापना 1 अक्टूबर, 2019 के बाद और जिनका संचालन 31 मार्च, 2023 से पहले शुरू हुआ, उनके लिए इस टैक्स 25 से घटाकर 15 फीसदी कर दिया गया. यह बीते 28 वर्षों में सबसे बड़ी कमी थी.

जैफ्रीलॉट के मुताबिक, इन टैक्स कटौती के अलावा, सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के साथ-साथ घरेलू पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स पर लगने वाले सरचार्ज को भी वापस ले लिया. जेफ्रीलॉट के मुताबिक, गरीबी से निपटने के लिए किए जाने वाले उपायों को आंशिक तौर पर खत्म करने के साथ सरकार के इस अप्रोच से भारत में बढ़ती असमानता के कारणों का पता चलता है. वह कहते हैं, इसमें क्रोनिज्म (तरफदारी नीति) का मामला भी शामिल है. कुछ लोग और अधिक अमीर हुए, इसके कई दूसरे कारण भी हैं, इनमें मोदी सरकार और उद्योगपतियों के बीच करीबी संबंध होना शामिल है.

उद्योगपतियों को बचाना?

जब मोदी प्रधानमंत्री बने, तो उनकी एनडीए सरकार पर आरोप लगे कि सरकार ने भारतीय उद्योगपतियों को बैंकों के अरबों डॉलर के कर्ज से बचाया. इस साझेदारी से खराब-कर्ज (जिनकी अदायगी सही समय पर नहीं हो पा रही है) से घिरा बैंकिंग सिस्टम और अधिक अस्थिर हुआ. खास तौर पर कुछ प्रमुख निवेशकों ने बड़े डिफाल्ट किए. हालांकि यह समस्या पिछली सरकार के दौरान उत्पन्न हुई थी, लेकिन मौजूदा सरकार और कारोबारी समुदाय के करीबी रिश्ते के कारण यह समस्या बनी रही.


मई 2018 में, सरकारी बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 12.65 बिलियन डॉलर थीं (जबकि इसके पिछले मार्च में यह 12.5 फीसदी और मार्च 2012 में केवल 3 फीसदी था.) एनपीए, उसे कहते हैं जहां उधारकर्ता ने कम से कम 90 दिनों के लिए ब्याज या मूलधन का भुगतान न किया हो. ऐसा 2015 में क्रेडिट सुइस की उस चेतावनी के बावजूद हुआ जब इसने 11 भारतीय कंपनियों के कर्ज के स्तरों पर विस्तृत विश्लेषण जारी किया था.


2018 में, प्रमुख कंपनियों पर 84 फीसदी खराब-कर्ज थे, जबकि बारह कंपनियों पर 25 फीसदी बकाया एनपीए था. इनमें गौतम अडानी की कंपनी भी शामिल है, जो 2002 से मोदी की समर्थक रही. 2015 में इस कंपनी ने एक बंदरगाह और दो बिजली कंपनियों के अधिग्रहण के लिए अपने कर्ज में 16 फीसदी की बढ़ोतरी की. 2011 में, इस कंपनी पर 331 बिलियन रुपये (4.41 बिलियन डॉलर) बकाया था.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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