ब्रिटिश मैडलिन भारत आकर कैसे बन गई मीराबेन? ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन को भेंट की जाएगी बापू की बेटी की यही कहानी

Mirabehn With Mahatma Gandhi

How Madeleine Slade Became Mirabehn: महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के बारे में कहा जाता है कि उनके भीतर जो स्त्री संंवेदनाएं आईं, वो उनके जीवन का हिस्सा रहीं महिलाओं से पल्लवित हुईं. फिर चाहे वो उनकी मां पुतलीबाई रही हों, पत्नी कस्तूरबा गांधी रही हों या फिर उनके संपर्क में आईं अन्य महिलाएं. आजादी के आंदोलनों के दौरान की तस्वीरों पर आपने गौर किया होगा तो देखा होगा कि अक्सर महात्मा गांधी के साथ कुछ महिलाएं भी होती थीं. इन महिलाओं में कस्तूरबा, मनुबेन, आभाबेन, सरोजिनी नायडू, सरलादेवी चौधरानी, सुशीला नायर, राजकुमारी अमृत कौर जैसे कई नाम शामिल हैं. इन्हीं में एक अलग और विशेष नाम है, ब्रिटिश महिला मैडलिन स्लेड (Madeleine Slade) का. मैडलिन अपना देश छोड़ भारत आती हैं, गांधीजी के साथ जुड़ती हैं और फिर मीराबेन बन कर यहीं रह जाती हैं. भारत दौरे पर आए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन (British PM Boris Johnson) को इन्हीं मीराबेन की कहानी (Mirabehn’s Autobiography) भेंट की जाएगी.

दरअसल, मोहनदास करमचंद गांधी के ‘महात्मा’ और फिर ‘बापू’ बनने के सफर में कई महिलाएं सहभागी बनीं. ऊपर जिन महिलाओं का जिक्र किया गया है, उन महिलाओं का गांधीजी के जीवन पर और उन महिलाओं के जीवन पर गांधीजी का गहरा प्रभाव रहा है. गांधीजी सत्य, अहिंसा, शांति, संयम और त्याग जैसे जिन अनुशासनों के साथ बढ़े, ये महिलाएं भी अपने जीवन में उन्हीं रास्तों पर चलते हुए आगे बढ़ीं. बहरहाल लौटते हैं मैडलिन स्लेड उर्फ मीराबेन की कहानी पर.

मैडलिन भारत आकर महात्मा गांधी से इतनी ज्यादा प्रभावित हुईं कि उन्होंने तमाम सुख-सुविधाएं, विलासिता, धन-दौलत यहां तक कि अपना देश भी छोड़ दिया और मीराबेन बनकर सदा के लिए भारत की होकर रह गईं. ये सब कैसे हुआ, आगे हम यही बताने वाले हैं.

गांधीजी से मिलने भारत पहुंचीं ब्रिटिश सैन्य अधिकारी की बेटी

मैडलिन स्लेड का जन्म एक ब्रिटिश संभ्रांत परिवार में 22 नवंबर 1892 को हुआ. उनके पिता सर एडमंड स्लेड तब बंबई (अब मुंबई) में नौसेना के ईस्ट इंडीज स्क्वाड्रन में कमांडर इन चीफ के रूप में तैनात थे. वह अनुशासन के बीच पलींं-बढ़ीं. 1923 में वह गांधीजी की बायोग्राफी लिखने वाले फ्रांसीसी लेखक रोमैन रौलेंड के संपर्क में आईं, जिन्होंने मैडलिन का गांधीजी से परिचय कराया. गांधीजी के बोर में पढ़कर वह बहुत रोमांचित हुईं. मैडलिन ने गांधीजी को देखा तक नहीं था, लेकिन अपना पूरा जीवन उन्हें समर्पित करने की ठान ली थी. उन्होंने खत लिखकर गांधीजी के आश्रम आने की इच्छा जाहिर की और अक्तूबर 1925 में वह अहमदाबाद पहुंच गईंं.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मैडलिन ने गांधीजी से उनकी पहली मुलाकात का जिक्र कुछ यूं किया है,


“जब मैं वहां (आश्रम में) दाखिल हुई तो सामने से एक दुबला शख्स गद्दी से उठकर मेरी तरफ बढ़ रहा था. मैं जानती थी कि ये शख्स बापू ही हो सकते हैं. मैं खुशी और श्रद्धा से भर गई थी, मुझे सामने एक दिव्य रोशनी दिखा रही थी. मैं उनके पैरों में झुककर बैठ गई. बापू ने मुझे उठाया और कहा- तुम मेरी बेटी हो.”


इसी दिन से मैडलिन और महात्मा गांधी के बीच पिता-पुत्री का रिश्ता बन गया. बापू ने ही उन्हें मीराबेन नाम दिया.

अपनी आत्मकथा में मीराबेन लिखती हैं,


“5 साल की उम्र से ही कभी पेड़ों की सरसराहट तो कभी किसी पंछी की आवाज मुझे दूर कहीं दूर ले जाती थी. मैं जीवन में किसी अज्ञात प्रेरणा के वशीभूत होकर उस छिपे सत्य को ढूंढने के लिए घोड़े की पीठ पर बैठकर अपने नाना के गांव जाती थी. विशाल घर से खेतों, जंगलों, नदियों और सागर के आस-पास जाकर प्रकृति से अपना नाता जोड़ा करती थी और मुझे उस अज्ञात स्वर में अपार आनंद की अनुभूति होती थी.”


अपने उस अज्ञात की खोज में ही मैडलिन पश्चिम के महान संगीतकार बीथोवन से प्रभावित हुई थीं. बीथोवन ने सूरदास की ही तरह अपने समस्त चिंतन को संगीत में ढाल लिया था. वह बीथोवन की समाधि तक भी पहुंची थीं. बीथोवन के देहांत के बाद भी उन्हें लगता था कि कोई अज्ञात प्रेरणा उन्हें बुला रही है. गांधीजी के बारे में जानने के बाद मैडलिन को लग गया कि बापू, वही अज्ञात प्रेरणा हैं, जिनकी उन्हें तलाश थी.

अपने ही देश के खिलाफ भारत के लिए आजादी की लड़ाई लड़ींं

भारत में तब ब्रिटिश शासन था और महात्मा गांधी समेत पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था. मीराबेन बन चुकीं मैडलिन ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में अपने ही देश के खिलाफ आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर भाग लिया. वह कई बार गिरफ्तार भी हुईं, जेल गईं, निकलीं और फिर से आंदोलनों में बापू के साथ रहीं.

अपनी आत्मकथा में मीराबेन लिखती हैं,


“मुझे बापू के पास जाना था, जो सत्य और अहिंसा की राह पर चलते हुए ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों-सितम से पीड़ित भारतीयों की सेवा कर रहे थे.”


पश्चिम की मैडलिन कब पूरब की मीराबेन बन गई, उन्हें भी न पता चला. एक कृष्ण की दीवानी मीरा थीं और एक गांधीजी के विचारों की दीवानी मीरा. उन्होंने गांधीजी से प्रभावित होकर सेवा और ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया. वह न केवल रहन-सहन, खान-पान और वेश-भूषा से हिन्दुस्तानी हो चुकी थीं, बल्कि आत्मा तक वह पूरी तरह भारतीय बन गई थीं.

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