बिहार में कृषि रोडमैप तैयार करने के लिए देशभर से जुटे किसान और विशेषज्ञ, बाजार को किसान तक पहुंचाने की सिफारिश

परिचर्चा मेंभारतीय पैकेजिंग के पूर्व निदेशक एनसी साहा ने चतुर्थ कृषि रोड में पैकेजिंग पर विशेष ध्यान देने का अनुरोध किया. उन्होंने कहा कि बिहार के जीआई टैग से प्रमाणित कृषि उत्पादों के पैकेजिंग पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है.

कृष‍ि मंत्री सुधाकर स‍िंह की अध्‍यक्षता में ब‍िहार कृष‍ि रोड मैप बनाने के ल‍िए आयोज‍ित कार्यक्रम में देशभर से क‍िसान और व‍िशेषज्ञों ने श‍िरकत की.

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बिहार के कृषि मंत्री सुधाकर सिंह की अध्यक्षता में चतुर्थ कृषि रोडमैप के निर्माण के लिए पटना में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया. इस परिचर्चा में देशभर के कृषि से जुड़े पुरस्कृत किसानों के साथ ही विशेषज्ञों ने शिरकत की. सभी ने बिहार की कृषि व्यवस्था को नई ऊंचाई देने के लिए कई तरह के सुझाव दिए. जिसके तहत विशेषज्ञों ने बाजार को किसानों तक पहुंचाने की वकालत की. इस दौरान कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने कहा कि यह रोडमैप ऐसा कृषि रोडमैप होगा, जो देश के लिए दिशा तय करेगा और आने वाली पीढ़ी को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि कृषि विभाग नीति निर्धारण करने वाला विभाग है और आने वाले कृषि रोडमैप उपादानों की लागत के बजाय, बाजार को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा. वहीं परिचर्चा में रोडमैप के लिए किसानों और विशेषज्ञों की तरफ से कई अहम सुझाव दिए गए.

जीआई टैग कृषि उत्पादों की पैकेजिंंग पर ध्यान देने की मांग

परिचर्चा में भारतीय पैकेजिंग के पूर्व निदेशक एनसी साहा ने चतुर्थ कृषि रोड में पैकेजिंग पर विशेष ध्यान देने का अनुरोध किया. उन्होंने कहा कि बिहार के जीआई टैग से प्रमाणित कृषि उत्पादों के पैकेजिंग पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने मखाना के विकास एवं निर्यात के लिए मखाना बोर्ड के गठन तथा केला के विपणन तथा निर्यात में नालीदार फाईबर बोर्ड बाॅक्स के उपयोग के लिए योजना बनाने का सुझाव दिया. उन्होंने बताया कि बिहार राज्य में 58 हजार सूक्ष्म लघु और मध्यम उद्यम स्थापित है, जो ज्यादातर खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े हैं, इन्हें एक मंच देने की आवश्यकता है.

कृषि उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने पर जोर देने की मांग

परिचर्चा मेंएपीडा बनारस के पदाधिकारी सीबी सिंह ने कहा कि बिहार के लिए कृषि निर्यात नीति लगभग अंतिम चरण में है. चतुर्थ कृषि रोडमैप उत्पादन आधारित न होकर बाजार आधारित करने पर विशेष फोकस देना चाहिए. उन्होंने बताया कि एपीडा के सहयोग से दरभंगा में 6 करोड़ रूपये लागत का पैक हाउस लगाने की अनुमति प्राप्त हो गयी है. एपीडा राज्य से जर्दालू आम और लीची के निर्यात के लिए सहयोग कर रहा है और कतरनी चावल के निर्यात के लिए उनके संस्थान की तरफ से काम किया जा रहा है. उन्होंन कहा कि उद्यमियों को बाजार तक लाने की योजना चतुर्थ कृषि रोडमैप का एक हिस्सा होना चाहिए. भारत सरकार के कृषि उड़ान तथा किसान रेल का फायदा बिहार राज्य को उठाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि कृषि उड़ान योजना में पटना भी शामिल है. किसानों के विपणन से संबंधित क्षमता संवर्द्धन, परिभ्रमण और जागरूकता कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इसके साथ ही उन्होंने सभी प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अनुश्रवण करने पर भी जोर दिया.

बेबीकॉर्न की खेती को बढ़ावा देने की मांग

परिचर्चा में पद्मश्री कवल सिंह चौहान हरियाणा ने सुझाव दिया कि बिहार मक्का की खेती के लिए प्रसिद्ध है. यहां प्रयोग के तौर पर मक्का के स्थान पर बेबीकाॅर्न व स्वीटकाॅर्न की खेती करवाकर प्रोसेसिंग इकाई लगाकर इसके बाजार की व्यवस्था की जानी चाहिए. यह व्यवस्था एफपीओ के माध्यम से भी हो सकती है. भारत के बेबीकाॅर्न व स्वीटकाॅर्न का विदेशों में अच्छी मांग है.

लीची का हो व्यावासायिक प्रयोग

साथ ही पद्मश्री कवल सिंह चौहन ने कहा किमुजफ्फरपुर की लीची विश्व प्रसिद्ध है. लीची के पल्प की मांग पूरी दुनियां में है. इसकी खेती को बढ़ावा दिया जाए. लीची के नये बाग लगवाकर एफपीओ बनवाकर लीची की प्रोसेसिंग इकाई लगाकर पल्प का निर्यात किये जाने की व्यवस्था की जाए तथा लीची का जूस भी बिहार में पैक किया जाये. वहीं उन्होंने पटसन उद्योग को भी बढ़ावा देने के लिए नीति बनाई जाये.

गेहूं के डंडल से बने स्ट्रा

पद्मश्री चंद्रशेखर सिंह बनारस ने परिचर्चा में बीज उत्पादक एवं प्रसंस्करण करने वाले किसान ने कम पानी में धान की खेती के लिए धान की सीधी बुवाई तथा प्राकृतिक खेती/जैविक खेती के लिए उपभोक्ता आधारित बाजार हेतु कोरिडोर बनाने पर सुझाव दिया. उन्होंने गेहूं के डंठल से जूस पीने वाले स्ट्रा बनाने की विधि बताई, जिससे प्लास्टिक स्ट्रा से छुड़कारा मिल सके. उन्होंने किसानों को एग्री इंटरपेनियोर बनाने पर विशेष बल दिया.

जलप्रबंधन पर ध्यान देने की वकालत

राजस्थान के किसान लक्ष्मण सिंह लोपाड़िया ने फसल चक्र में पशुचारा तथा छोटे-छोटे तालाब का निर्माण कर जलप्रबंधन एवं जलसंचयन की बात कही. उन्होंने राजस्थान में प्रसिद्ध चैका माॅडल (लोपाड़िया माॅडल) को अपनाकर भूमि एवं जल संरक्षण की बात बतायी. उन्होंने माननीय मंत्री सहित विभागीय पदाधिकारी को 11 नवम्बर 2022 को अपने गांव में आने का निमंत्रण दिया. उस दिन उस क्षेत्र के सभी गांवों में यात्रा का आयोजन कर अपने संसाधनों को संरक्षण करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता है.

वहीं परिचर्चा मेंकरण सिंह निरवाण ने गोपालन तथा फसल विविधीकरण पर अपने विचार रखे. उन्होंने शुद्ध देशी खान-पान के लिए देशी गाय तथा कीट-व्याधि के रोकथाम के लिए रासायनिक कीटनाशी के बजाए देशी तरीके से तैयार किए गए कीटनाशी के उपयोग पर विशेष बल दिया.
कर्नाटक के किसान एआर पाटिल ने ऐसी कृषि प्रणाली विशेषकर जिसमें एग्रो फाॅरेस्ट्री (चारा के लिए चारागाह तथा तालाब का समावेश हो) को अपनाने पर बल दिया.

औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने की मांग

जमुई के किसान अर्जुन मंडल ने राज्य में औषधीय एवं सुगंधित पौधों के बढ़ावा पर अपने विचार रखे. उन्होंने औषधीय एवं सुगंधित पौधों के प्रोपोगेशन तथा हर्बल कीचन गार्डेन की योजना के लिए अनुरोध किया. साथ ही उन्होंने बताया कि औषधीय एवं सुगंधित पौधों में सबसे बड़ी समस्या उसे सुखाकर उसे प्रसंस्कृत करने की है. जिसपर सरकार को ध्यान देना चाहिए.

बाजार को किसानों के पास लाने की वकालत

आईआईटी पटना के निदेशक प्रो टीएन सिंह ने बाजार को किसान के पास लाने की वकालत की. उन्होंने कहा कि देशी खायेंगे तो देश के प्रति सोचेंगे. उन्होंने बिहार में और बिहार के लिए विकसित ड्राॅन टेक्नोलाॅजी और ड्राॅन को उड़ाने के लिए पायलट को प्रशिक्षित करने की जिम्मवारी उनके संस्थान द्वारा लेने की बात कही गयी.

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मधुमक्खी पालक किसानों को प्रशिक्षण देने की मांग

परिचर्चा में सुब्रतो घोष ने बिहार में कृषि उत्पादों विशेषकर शहद तथा राज्य में उत्पादित मिर्चा के लिए आवश्यक एनएमआर टेस्ट की सुविधा हेतु प्रयोगशाला की व्यवस्था करने का अनुरोध किया. मुजफ्फरपुर के किसान दयानंद ने बताया कि 25 लाख रूपये के मधु प्रसंस्करण यूनिट लगाने से किसानों का फायदा होगा. उन्होंने मधुमक्खीपालन में अभी सबसे बड़ी समस्या पर ध्यान आकृष्ट करते हुए बताया कि मधुमक्खीपालक बक्सा में ब्रूड चैम्बर से शहद निकालते हैं. इसलिए यह आवश्यक है कि किसानों को इस विषय में सही प्रशिक्षण दिया जाए. साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि मधुमक्खी जब फूलों से रस चुसती है तो वहां नेक्टर नहीं होने से केवल फूलों पर पड़े नमी को चूसकर शहद की प्रक्रिया करती है, जिससे गुणवत्तापूर्ण शहद उत्पादन में कमी आ रही है.

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