बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का नीतीश का दांव, क्या CM के रूप में विफलता स्वीकार?

नीतीश कुमार बिहार के दूसरे सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले मुख्यमंत्री हैं. उनकी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग यह दर्शाता है कि वह मानते हैं कि वह राज्य को एक अच्छा प्रशासन देने में विफल रहे हैं.

पांच राज्य करते हैं विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग. (फाइल फोटो)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में खुद को प्रोजेक्ट किए जाने के मंसूबे पाले हुए हैं. उन्होंने यह कह कर सभी को चौंका दिया कि अगर केंद्र में विपक्ष सरकार बनाने में कामयाब होता है, तब सभी पिछड़े प्रदेशों को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा. नीतीश कुमार ने गुरुवार को कहा कि ऐसा कोई कारण नहीं है कि ये नहीं किया जा सकता है. बता दें कि बिहार उन पांच राज्यों में शामिल है, जो लंबे समय से इस दर्जे की मांग कर रहे हैं. दूसरे राज्य आंध्र प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और गोवा हैं.

क्या यह संभव है?

चूंकि भारत एक लोकतंत्र है, इसलिए जब तक किसी पार्टी के पास बहुमत है, वह कुछ भी कर सकती है. हालांकि, ऐसा करने के लिए विपक्ष को सत्ता में आने के बाद संविधान में संशोधन करना होगा. संविधान के मुताबिक ऐसा कोई भी संशोधन भारतीय संसद के दोनों सदनों से कम से कम दो तिहाई बहुमत से पास होना चाहिए. मतलब साफ है कि इसके लिए मौजूदा विपक्ष को 2024 के लोकसभा चुनाव में 543 में से कम से कम 364 सीटें जीतनी होंगी. इसके अलावा इसे राज्यसभा के 245 सांसदों में से कम से कम 165 का समर्थन होना चाहिए. यह एक मुश्किल काम और सपना भर प्रतीत होता है.

राज्यों को विशेष दर्जा क्या है?

राज्यों के लिए स्पेशल कैटेगरी स्टेटस (एससीएस) यानी विशेष श्रेणी के दर्जे का भारतीय संविधान में कोई प्रावधान नहीं था. कमजोर राज्यों को केंद्रीय अनुदान और करों में छूट देने और प्राथमिकता देने के लिए 1969 में पांचवें वित्त आयोग ने इसे पेश किया. शुरू में जम्मू- कश्मीर, असम और नागालैंड को एससीएस राज्यों की श्रेणी में रखा गया. बाद में हिमाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और उत्तराखंड को इस सूची में जोड़ा गया. जम्मू-कश्मीर के 2019 में अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से एससीएस की सूची घटकर 10 रह गई है.

एससीएस राज्यों को क्या लाभ मिलते हैं?

एससीएस राज्यों को केंद्र सरकार सभी केंद्र प्रायोजित योजनाओं का 90 फीसदी पैसा अनुदान देती है. राज्यों को इन योजनाओं पर खर्च करने के लिए 10 फीसदी ब्याज मुक्त लोन भी दिया जाता है. इसके अलावा, केंद्र के कुल बजट का 30 प्रतिशत एससीएस राज्यों पर ही खर्च किया जाता है. निवेश आकर्षित करने के लिए उत्पाद शुल्क में रियायत के अलावा कॉर्पोरेट कर, आयकर और सीमा शुल्क में भी छूट दी जाती है. ये राज्य ऋण स्वैपिंग और ऋण राहत योजनाओं का लाभ भी उठा सकते हैं और उनका खर्च नहीं किया गया धन वित्त वर्ष खत्म होने पर लैप्स भी नहीं करता है. बल्कि अगले वित्त वर्ष में जुड़ जाता है.

एससीएस राज्य बनने के लिए क्या योग्यताएं चाहिए?

विशेष राज्य के दर्जे के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना जरुरी हैः

  • पहाड़ी और कठिन भूभाग.
  • कम जनसंख्या घनत्व या आबादी का बड़ा हिस्सा जनजातीय हो.
  • पड़ोसी देशों के साथ सीमाएं लगने के कारण राज्य सामरिक महत्व वाला हो.
  • आर्थिक और बुनियादी ढाचे में राज्य पिछड़ा हो.
  • राज्य खुद अपने खर्च के मुताबिक कमाई नहीं कर पाता हो.
  • एससीएस की मांग करने वाले राज्यों की जमीनी हकीकत.

एससीएस की मांग करने वाले पांच राज्य

यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि कोई गिलास को कैसे देखता है – आधा खाली या आधा भरा हुआ. अगर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को ध्यान में रखा जाए तो एससीएस की मांग करने वाले पांच राज्य काफी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश 2021 में 973.66 लाख करोड़ रुपये सकल घरेलू उत्पाद के साथ सभी भारतीय राज्यों में सातवें स्थान पर है, राजस्थान 10.21 लाख करोड़ रुपये के साथ नौवें स्थान पर है. बिहार 5.15 लाख करोड़ रुपये के साथ 15वें स्थान पर और ओडिशा 4.49 लाख करोड़ रुपये के साथ 29 भारतीय राज्यों में 16वें स्थान पर है. गोवा 23वें स्थान पर है लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में वह सभी भारतीय राज्यों में नंबर वन है.

तो फिर इसका क्या मतलब है?

सीधा और सरल जवाब है कि गोवा की एससीएस की मांग अनुचित है, क्योंकि यह प्रति व्यक्ति आय और एमपीआई के मामले में भारत के सबसे अमीर राज्यों में से एक है. राजस्थान और आंध्र प्रदेश के दावे भी इन आंकड़ों को देखने के बाद एससीएस का दावा करने लायक नहीं लगते. ऐसे में बिहार और ओडिशा सचमुच गरीब राज्यों की श्रेणी में बच जाते हैं.

बिहार अब भी एससीएस का दर्जा क्यों चाहता है?

नीतीश कुमार बिहार के दूसरे सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले मुख्यमंत्री हैं. मुख्यमंत्री के रूप में उनका यह 17वां साल है. उनका वर्तमान कार्यकाल लगातार नवें वर्ष में है. नीतीश कुमार की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग यह दर्शाता है कि वह मानते हैं कि वह राज्य को एक अच्छा प्रशासन देने में विफल रहे हैं. यह उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने के लिए अच्छा नहीं है. इतने साल में अगर वह केवल बिहार को गरीबी से नहीं ऊबार सके और विकास नहीं कर पाये तब किस हैसियत से वह सिर्फ पांच साल में प्रधानमंत्री बनने पर विकास की गंगा बहाने का दावा मतदाताओं के सामने जाकर करेंगे?

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