बटला हाउस एनकाउंटर की वो खूनी रात, जब इंस्पेक्टर का गोलियों से छलनी हुआ था बदन

Batla House Encounter

कहते हैं कि वक्त के साथ इंसान का गहरे से गहरा जख्म भी भर जाता है. दिल्ली पुलिस और उसकी स्पेशल सेल मगर इस कहावत को सिरे से नकार देती है. बटला हाउस एनकाउंटर को हुए आज 14 साल (19 सितंबर 2008) गुजर चुके हैं. इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल को मिला जख्म अब तक भर सका है. जब-जब 19 सितंबर की तारीख आती है, तब-तब दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के रणबांकुरों (योद्धाओं) का खून खौल उठता है. पुराना जख्म फिर से रिसने लगता है. क्योंकि यही वो दिन था, जब दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का जाबांज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा अपने बीमार बेटे को अस्पताल में भर्ती छोड़कर आतंकियों से जा भिड़े और शहीद हो गए थे.

आखिर ऐसे रणबांकुरे लाल शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की याद आने पर दिल्ली पुलिस हर 19 सितंबर आने पर क्यों नहीं बिल-बिलाएगी. दरअसल, जिस दिन बटला हाउस एनकाउंटर को इंस्पेक्टर मोहन चंद अपनी टीम के साथ अंजाम देने पहुंचे थे, उससे कई दिन पहले से ही उनका बेटा अस्पताल में भर्ती था. डेंगू बिमारी के चलते जिंदगी और मौत से जूझ रहा था. 18 सितंबर 2008 को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के पास केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने सूचना दी कि, कुछ आतंकवादी हैं, जो दिल्ली को तबाह करने के मंसूबे बनाकर राजधानी में छिपे बैठे हैं. उस समय दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के संयुक्त आयुक्त रहे और अब वर्तमान में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हो चुके कर्नल सिंह कहते हैं कि आईबी के इनपुट पर मोहनचंद शर्मा ने सभी जानकारियां जुटा ली थी. उस रात मैं डीसीपी स्पेशल सेल आलोक कुमार, संजीव यादव स्पेशल सेल के ही दफ्तर में बैठे हुआ था.

वो मनहूस 18-19 सितंबर की थी रात

बकौल कर्नल सिंह, 18-19 सितंबर 2008 की रात (अलसुबह) के दो बजे चुके थे. मोहन चंद ने आतंकवादियों के बारे में हर जानकारी जुटाकर हम सबके सामने रखी. तय हुआ कि रात के वक्त ही आतंकियों को दबोच लिया जाए. फिर मैंने रात में छापेमारी करने का विचार त्याग दिया. तय किया कि आतंकवादियों के अड्डे पर दिन के उजाले में छापेमारी की जाएगी. ताकि, हमारा कोई नुकसान (कोई पुलिसकर्मी चोट न खाए) न हो और आतंकवादी भी जिंदा पकड़े जाएं. क्योंकि एनकाउंटर के दौरान आतंकवादी खुद के जिंदा पकड़ाए जाने से अपने मर जाने को प्राथमिकता देते हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि जिंदा पकड़े जाने पर उनकी आगे पीछे की लंबी चेन खुल जाएगी. इसलिए सेल (दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल) उन्हें जिंदा दबाने की कोशिश में थी. अगले दिन करीब 11 बजे पता चला कि इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बदन में आतंकवादियों की गोली लग गई है. मौके पर एक आतंकवादी जिंदा पकड़ा गया था. जबकि एक आतंकवादी की मौत हो चुकी थी. मौके से दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल को आतंकवादियों के अड्डे से एके-47 जैसी घातक स्वचालित राइफल भी मिली थी.”

मौत से जंग हार गया जांबाज

19 सितंबर 2008 को सुबह करीब 11 बजे एनकाउंटर में इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा घायल हुए. वहीं, शाम करीब 7 बजे मौत से जंग हार गए. मतलब, दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने अपने रणबांकुरे इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को तमाम भागीरथी प्रयासों के बाद भी खो दिया. उस एनकाउंटर में मौके से जिंदा पकड़े गए आतंकवादी का नाम मोहम्मद कैफ था. उस मनहूस दिन को आज याद करते वक्त दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल में शायद ही कोई ऐसा रणबांकुरा बहादुर बलवान वीर होगा, जिसकी आंखें नम न हो जाती हों. 19 सितंबर 2008 तारीख जख्म ही ऐसा देकर गई है, जिसे भरने के लिए अब तक कोई मरहम नहीं बना.

कभी नहीं भूल सकता

बटला हाउस एनकाउंटर की घटना के 14 साल बाद सोमवार को टीवी9 भारतवर्ष ने दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के संयुक्त पुलिस आयुक्त रहे पूर्व आईपीएस कर्नल सिंह से बातचीत की. उन्होंने कहा कि मोहन को जुदा हुए 14 साल बीत गए. लोग बटला हाउस एनकाउंटर भी वक्त के साथ भूल जाएंगे. मगर, मैंने तो होली फैमली अस्पताल में मोहन के माथे को जब छुआ तब वे, इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे. उस डरावने अहसास को मैं तो इस इंसानी दुनिया में अपनी मौजूदगी के रहते कभी नहीं भूल सकता हूं.