बजुर्ग महिला अर्धरात्रि में न उठती तो जिला सोलन में  होता मार्कण्डेय तीरथ स्थल

*बजुर्ग महिला अर्धरात्रि में न उठती तो जिला सोलन में  होता मार्कण्डेय तीरथ स्थल*
*जिला सोलन के उखखु गांव में प्राचीन मसंद की बाऊडी से जुडी है पौराणिक गाथा*

कुनिहार से हरजिन्दर ठाकुर की रिपोर्ट:-अगर एक  बजुर्ग महिला अर्धरात्रि में न उठती तो शायद जिला सोलन में ही मार्कंडेय तीरथ स्थल बन जाता । जो वर्तमान में जिला बिलासपुर के अंतर्गत आता है । कुछ एैसी ही पौराणिक गाथा जिला सोलन मुख्यालय से लगभग 75 किलो मीटर दूर एक छोटे से गांव उक्खु  से जुडी बताई जाती है । कहा जाता है कि इस गाँव की पहाडी के  छोर में एक प्राचीन पानी का कुंड है। जिसे  पांडवो ने अपने अज्ञातवास के दौरान यंहा मार्कंडेय तीरथ स्थल बनाए जाने के  उदेश्य से बनाया था । लेकिन गाँव की बजुर्ग महिला के अर्धरात्रि में उठने के कारण निर्माण कार्य में बाधा उत्पन्न हो गई थी । जिस कारण कुंड निर्माण कार्य तो पूर्ण हो गया । लेकिन मार्कंडेय तीरथ स्थल कार्य संपन्न नही हो पाया था । बताया जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव  गांव के छोर पर कुछ दिनों रुके थे । अज्ञातवास के दौरान पांडवो द्वारा इस स्थान पर कुंड तैयार करना चाहते थे । ताकि यँहा  पर  मार्कंडेय तीरथ स्थल बनाया जा सके । जिसके लिए उन्होंने अपने तीर से यंहा  जलस्रोत की धारा निकाली थी । पानी के कुंड निर्माण कार्य पांडवो द्वारा एक  विशेष धार्मिक अनुष्ठान से किया जाना था । जिसमे किसी भी अन्य का हस्तक्षेप वर्जित था व मंत्रोचारण के  दौरान  किसी प्रकार की ध्वनि भी कुंड निर्माण कार्य में बाधा डाल सकती थी। बतया जाता है कि कुंड निर्माण कार्य एक ही रात्रि में संपन्न करना था । जिसके लिए उन्होंने कुंड के चारों और मंत्रोचारण के साथ पत्थर लगाने काम शुरू कर कर दिए थे । जब पांडव रात्री में पानी के कुंड का निर्माण कार्य कर रहे थे तो गांव की कोई बजुर्ग महिला अर्ध रात्री में ही उठकर अपनी गौशाला में जाकर गाय के थन से दूध निकालने लगी । जैसे ही बर्तन से दूध की धाराओ की आवाज आने लगी उसी आवाज के चलते कुंड निर्माण कार्य में बाधा उत्पन्न हो गई व पांडवो  ने पानी के कुंड निर्माण को उसी अवस्था में छोड दिया व उस स्थान से पंज पीपलू होते हुवे  बाडीधार की और पलायन कर दिया था। जिसके कारण उक्त स्थान में पानी का कुंड तो बन गया लेकिन मार्कंडेय तीरथ स्थल बनने में बाधा आ गई । लेकिन आज भी गांव के बजुर्ग उक्त कुंड के पानी को मार्कंडेय तीरथ स्थल कि तरह पवित्र मानते है व किसी विशेष दिवस के दौरान इसी पानी से स्नान करते है ।
बताया जाता है कि पांडव जिन पथ्थरो पर  अपने अस्त्र शास्त्रों को नोकीला करते थे आज भी कुंड के आस पास दिखाई दे जाते हैं । इतना ही नही पांच पांडवो के शिलारुपी पिंडी आज भी कुंड में स्थापित है । कहा जाता है कि  कुंड के अंदर कोई अतिरिक्त काम नही किया गया है । उस समय जैसे पत्थर लगाये गए थे वो आज भी वैसे ही दिखाई देंगे । बताया जाता है कि कुंड के तल में लगे पत्थर भी विशेष आकार के है । गर्मी अथवा सर्दियों में कभी कुंड का पानी कम नही होता । पानी में  पेड  पौधो के पत्ते अथवा कोई जानवर न चला जाये वर्तमान में  इसके उपर छत निर्माण कार्य व चार दीवारी लगाई गई है।वर्तमान में उक्त पानी के कुंड को मसंद वंशजो की बाऊडी के नाम से भी जाना जाता है । मसंद वंशजो को जोहडजी, बाबा हरिपुर वालो के पुजारी माना जाता है । कुंड के साथ काफी वर्ष पूर्व शिवलिंग की भी प्रतिष्ठा करवाई गई है । प्रतिवर्ष शिवरात्रि के दौरान यंहा श्रधालु अपनी मनोकामना हेतु पंहुचते हैं। जिला सोलन के अंतर्गत आने वाले अर्की निर्वाचन क्षेत्र के गाँव उक्खु कुनिहार नालागढ मार्ग जाबल से लगभग 20 किलो मीटर दूर जयनगर मार्ग में पडता है । ।यदि प्रयटन विभाग इस प्राचीन कुंड की और ध्यान दे तो यहा प्रयटन की अपार सम्भावनाये है । धार्मिक दृष्टि से उक्त स्थल को विकसित किया जा सकता है।

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