फॉरेंसिक रिव्यू : राधिका आप्टे, विक्रांत मेसी की थ्रिलर फिल्म महज एक बेवकूफी लगती है

Forensic Film

फिल्म : फॉरेंसिक

एक्टर : विक्रांत मेसी, राधिका आप्टे, प्राची देसाई

डायरेक्टर: विशाल फुरिया

रेटिंग: 0.5 स्टार

विशाल फुरिया की फॉरेंसिक (Forensic) देखकर मुझे थ्रिलर का मतलब ढूंढना पड़ा. यदि आप ऑनलाइन इसके मायने ढूंढते हैं तो दो परिभाषाएं सामने आती हैं, “एक उपन्यास, नाटक, या एक रोमांचक प्लॉट वाली फिल्म, जिसमें आमतौर पर अपराध या जासूसी शामिल होती है”, और दूसरा “एक बहुत ही रोमांचक मुकाबला या अनुभव.” इन दोनों में समान शब्द “रोमांचक” है. तब यह कहना गलत नहीं होगा कि थ्रिलर तो कहानी में निहित होनी चाहिए या फिर इसे एक तरह की उत्तेजना पैदा करनी चाहिए. लेकिन यह केवल शब्दों का मामला है. यहां भाव यह है कि ऐसे फिल्म की कहानी सरल हो, इसका इरादा भरोसा करने लायक हो और इसे संयमित होना चाहिए, ताकि पैदा होने वाला रोमांच मजेदार, दर्शक को फिल्म में डूबा लेने वाला और सबसे अहम कि स्वाभाविक लगे. लेकिन फॉरेंसिक के निर्माताओं ने सतही तौर पर केवल इस शैली पर ध्यान दिया और एक ऐसी रचना को पेश किया जो इतना अविश्वसनीय लगता है जैसा कि कोई पांच साल का बच्चा सपना देख रहा है.


फिर भी फुरिया की फिल्म को दोष देना गलत लग सकता है क्योंकि यह मूल कहानी नहीं है. फॉरेंसिक, इसी नाम की मलयालम फिल्म की रीटेलिंग स्टोरी है. मूल फिल्म के डायरेक्टर अखिल पॉल और अनस खान थे. 2020 में आई यह मलयालम फिल्म एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है, जो ऐसे वक्त व्यावसायिक रूप से सफल रही जब थिएटर बंद हो रहे थे. इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन मुख्य वजह चतुराई से फिल्म की कहानी को पेश करना था. हालांकि, इसकी भी कहानी ऐसी थी जो आसानी से पचती नहीं, इसके बावजूद मूल फॉरेंसिक एक ऐसी थ्रिलर फिल्म थी जो अपने मकसद को पूरा करती थी.


इस फिल्म के हिंदी रूपांतरण में, फुरिया न केवल फिल्म के मूल आधार को दोहराने की कोशिश करते हैं, बल्कि मूल निर्माताओं से भी आगे निकलने का प्रयास करते नजर आते हैं. इसका नतीजा, एक अविश्वसनीय रूप से असंभव फिल्म प्रतीत होता है, जो तब तक खत्म नहीं होती जब तक दर्शक परेशान होकर यह न कहे दे कि, “नहीं, यह बर्दाश्त नहीं होता.” 2020 की फिल्म की तरह, फॉरेंसिक, युवा लड़कियों के मर्डर और रहस्य के जाल के आसपास चलती है. इसकी शुरुआत तब होती है जब एक डंपयार्ड में एक युवा लड़की की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है. फिर मामले को सुलझाने के लिए पुलिस अधिकारी मेघा शर्मा (राधिका आप्टे) आती है. जॉनी खन्ना (विक्रांत मेसी), एक फोरेंसिक विशेषज्ञ, उनकी सहायता के लिए आता है. मूल फिल्म के विपरीत, जहां सैमुअल जॉन कट्टूकरन (टोविनो थॉमस), ऋतिका जेवियर (ममता मोहनदास) के अलग हुए पति का भाई था, इस फिल्म में मेघा और जॉनी एक पुरानी जोड़ी हैं. सालों पहले एक बच्चे को लेकर दोनों के रास्ते अलग हो गए थे. यह बच्ची फिलहाल मेघा के साथ रहती है और वह एक दुर्घटना से आहत है.

फॉरेंसिक ZEE5 पर दिखाई जा रही है

किसी भी थ्रिलर की कामयाबी के लिए कहानी ऐसी होनी चाहिए जहां रहस्य जानने की उत्सुकता हो. फॉरेंसिक में (अधीर भट, अजीत जगताप और विशाल कपूर द्वारा लिखित) ऐसी बात नजर नहीं आती. इसका प्लॉट उतना ही कमजोर है जितना कि अप्रासंगिक. फुरिया की फिल्म का प्लॉट मसूरी है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है यह मुख्य कहानी में इसकी झलक नजर नहीं आती. ऐसे में विनय वाइकू की अरण्यक की याद आती है, जहां कथानक को प्रभावशाली ढंग से स्थापित किया गया था. इसकी तुलना में, फॉरेंसिक को इतने अकल्पनीय रूप से शूट किया गया है कि इसे कहीं भी शूट किया जा सकता था. दो घंटे चली इस फिल्म के अंत में मुझे हिल स्टेशन के बारे में केवल इतना पता चला कि वहां के लोग जन्मदिन की पार्टियों की मेजबानी करना पसंद करते हैं.

किसी कारण से, इस फिल्म के निर्माता, कहानी को तब तक एक के बाद एक झूठी लीड के साथ पेश करने की कोशिश करते हैं, जब तक कि स्क्रीनप्ले यह नहीं बताता कि इन कहानियों का कोई अंत नहीं है. लेकिन रहस्योद्घाटन काल्पनिक और हंसने लायक है. मेर मन में सवाल उठते हैं: विक्रांत मेसी और राधिका आप्टे एक थ्रिलर के रूप में पेश की गई इस बी-ग्रेड फिल्म में क्या कर रहे हैं? मेरे पास जवाब नहीं है. मैं यह भी नहीं जानती कि क्यों ‘जॉनी जॉनी यस पापा’, जो वास्तव में अच्छी भावना वाली नर्सरी की एक कविता है, को फिल्म में घटिया चुटकुलों के रूप में फिट किया गया. लेकिन निश्चित रूप से फॉरेंसिक इस उत्तर के साथ खत्म होता है: रचनाकारों के दिमाग में हमारी बुद्धि ही पंचलाइन है. फिल्म फॉरेंसिक ZEE5 पर दिखाई जा रही है. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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