नींबू की खटास से जीवन की मिठास का आनंद लेने वाले कितने लोग नींबुओं के राजा ‘गोंधोराज’ के बारे में जानते हैं?

Lemon Price

नींबू (Shortage of Lemon) ऐतिहासिक रूप से महंगा हो गया. 350 रुपए किलो तक के भाव पर बिक रहे नींबू (Expensive Lemons) के नाम से लोगों को मिर्च लग रही है. महंगाई (Inflation) को अन्य-अन्य वजहों से झुठलाने वाले लोग कह रहे हैं कि ऐसी कौनसी आफ़त आ गई. भला ज़्यादा नींबू किसे चाहिए होते हैं. अब इन्हें कौन समझाए कि गर्मी में जलजीरा, शिकंजी में जो काम नींबू कर सकता है, कोई नहीं कर सकता. फिर कटे हुए सलाद में ऊपर से अमचुर तो छिड़का नहीं जाएगा. चलिए, कुछ दिन तक इमली डाल कर सांबर खाया जा सकता है, लेकिन गर्मी में पीली दाल और सफ़ेद गर्म भात पर नींबू निचोड़कर खाने में जो मज़ा आता है. वो कहीं और से नहीं मिल सकता. वैसे खटास हमारे भोजन का अहम अंग है और हर तरह की खटास अलग होती है. इसके पीछे पूरा विज्ञान है. अब नींबू की बातें करने के पैसे तो लगते नहीं, तो आज यही समझते हैं.

नींबू की खटास सबसे अलग क्यों है

अगर पूरे भोजन को एक सुरीला गाना मान लें, तो सुर और लय, मीठा और नमकीन को कहा जाएगा. नमक सुर है और मीठा लय. इन दोनों के बीच में खट्टा ताल की तरह है. जो रहती तो बैकग्राउंड में है, लेकिन उससे भटक नहीं सकते. फलों का राजा कहे जाने वाले आम में तमाम मिठास के पीछे जो ह्लकी सी खटास छिपी रहती है, वही उसे खास बनाती है. काली कड़वी चाय हो या कॉफ़ी थोड़ा सा नींबू मिलाइए, बस बढ़िया स्वाद बन जाएगा. गोलगप्पे और चाट के तो कहने ही क्या.


इसके अलावा खटास पैलेट क्लेंज़र भी है, यानि कुछ भी खट्टा खाने पर आपकी जीभ साफ़ हो जाती है, उससे पिछला स्वाद चला जाता है और आप नए पकवान के लिए तैयार हो जाते हैं. अब तमाम तरह की खटास में नींबू की खटास सबसे अलग है. विज्ञान की भाषा में इसे सिट्रस कहते हैं.


आसानी से समझें, हम हम नींबू को निचोड़ते हैं और उसका सिर्फ़ रस इस्तेमाल करते हैं. इसलिए उसकी दूसरी चीज़ों का असर नहीं आता. इसीलिए गूदे वाले इमली या टमाटर को सिर्फ़ पकाकर इस्तेमाल किया जा सकता है. सूखे हुए अमचुर को किसी चीज़ में मिलाएंगे, तो कच्चे आम की झलक उसमें आ जाएगी. वहीं सिरके और संतरे इतने तेज़ फ़्लेवर होते हैं कि इनको खाने में मिलाने से उसका मूल स्वाद ही खो जाएगा. इसलिए, चाहे कोई कुछ भी कहें हमारे भोजन में नींबू का कोई दुसरा विकल्प नहीं.

जो भारत आया नींबू का मुरीद हुआ

हम भारतीय प्राचीन काल से नींबू के मुरीद रहे हैं. सिंधुघाटी सभ्यता में एक गले का पैंडेंट मिला है, डिसका आकार नींबू की पत्ती जैसा है. बाबर जब भारत आया, तो उसने यहां के 8 खट्टे फलों में नींबू का ज़िक्र किया. फ्रांसीसी यात्री बर्नियर अपने साथ नींबू का झोला रखता था, ताकि जब कभी थकान लगे फट से एक गिलास नींबू पानी पी ले. इसी तरह जब ब्रिटिश भारत आए तो उन्होंने यहां के नींबू को पुडिंग और टार्ट में इस्तेमाल करना शुरू किया. नींबू की महक को ताज़गी से जोड़ा जाने लगा. 90 के दशक में झरने के नीचे नींबू वाले साबुन से नहाती युवती को देखकर कितनों की थकान दूर हो जाती थी. फिर हॉरर फ़िल्मों और तंत्र-मंत्र ने भी नींबू को खूब बदनाम किया.


आपको बता दें कि नींबू के एसिड से क्रिया करवाकर लाल रंग निकलवाना बहुत आसान है, इसीलिए नींबू इस तरह के लोगों की खास पसंद रहा है, और साबुन वगैरह में नींबू की महक या तो सिंथेटिक होती है या लेमन ग्रास नाम के पौधे से आती है. लेमन ग्रास एक तरह की घास है जिसकी महक नींबू से मिलती है. गंगा किनारे उगने वाली इस घास की चर्चा प्राचीन तमिल साहित्य से लेक मार्कोपोलो के संसमरणों तक में है.


जैसे खट्टा सिर्फ़ खट्टा नहीं है और हम नींबू वाली चाय की जगह सिरके वाली या इमली वाली चाय नहीं पी सकते. वैसी नींबू सिर्फ़ नींबू नहीं है उसमें भी भेद हैं. अंग्रेज़ी में जिस हरी लंबी प्रजाति को लाइम कहते हैं उसे हिंदी वाले कागज़ी नींबू कहते हैं. यानि ऐसा नींबू जिसका छिलका कागज़ की तरह पतला हो. वैसे छिलका पतला होना नींबू की गुणवत्ता का एकमात्र पैमाना नहीं है. दुनिया इस बात पर अनंतकाल तक लड़ सकती है कि लंगड़ा और दशहरी में से कौन सा आम बेहतर है, लेकिन नींबू के मामले में एक ही सरताज़ है गोंधोराज. सिर्फ़ बंगाल और आसाम के कुछ इलाकों में उगने वाले चमकीले मोटे छिलके वाले गोंधोराज को सिर्फ़ नींबू कहने से इसके चाहने वाले आहत हो सकते हैं, लेकिन गोंधोराज की महक ऐसी होती है कि आप खाने की मेज पर दाल में इसकी एक फ़ांक निचोड़िए और घर के सभी सदस्य खिंचे चले आएंगे.


मलेशियन लाइम और मेंडरिन ऑरेंज के मिलन से बनी यह प्रजाति इस इलाके के बाहर नहीं उगती. इसीलिए, कलकत्ता में आपको ऐसे तमाम लोग मिल जाएंगे, जो अपनी अगली पीढ़ी का परिचय इसकी महक से करवा रहे होंगे. रंगपुर से शुरू हुई इस प्रजाति के उगने का इलाका भले ही बंगाल के अंदर सीमित हो, इस नींबू की ख्याति दुनिया में है. इसीलिए अंग्रेज़ों ने इस पर आधारित एक शराब भी बनाई. और अमेरिका में भी एक एक कॉकटेल मशहूर है जिसका नाम है रंगपुर रिकी. आज जब दाम बढ़ने के बाद नींबू हमसे थोड़ा दूर हो गया, तो हम इसकी बात कर रहे हैं. ऐसे में मुझे खयाल आ रहा है कि हम भारतीयों ने दुनिया को ज़ीरो, कालीमिर्च और रेशम देने के किस्से तो खूब सुनाए, लेकिन नींबू को भूल गए.


ऊपर से रिश्तों में खटास आना, ज़िंदगी जब आपको नींबू थमा दे, जैसे मुहावरों ने नींबू पानी और शिकंजी की प्रशस्ति का मौका ही नहीं दिया वो तो भला हो कि राजस्थान की रेतीली ज़मीन वालों ने गर्मी में ठंडक देने वाले नींबू के प्यार में उसपर गाना बना दिया और ऐश्वर्या राय के प्रस्तुति ने उसे हमेशा के लिए फलक पर अंकित कर दिया, वरना बेचारा नींबू गाजर-मूली के बीच सलाद में पड़ा रह जाता. अब नींबू की कीमत चाहे जितनी बढ़ जाए, हम तो यही कहेंगे कि ज़िंदगी जब भी आपको C6H8O7 दे, उसमें थोड़ा सा H2O मिला लीजिए, तरावट मिलेगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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