निवेश को लुभाने के लिए बंगाल को सुशासन पर ध्यान देना होगा, न कि दूसरे राज्यों से खुद को बेहतर बताने की बहस पर

Mamata Banerjee 1 (2)

जब ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) यह कहती हैं कि रोजगार पैदा करना उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है, तो वह सही मायनों में सच बोल रही होती हैं और उनकी बात को नकारा नहीं जा सकता है. दरअसल, इस सदी के पिछले 20 वर्षों से पश्चिम बंगाल (West Bengal) पर शासन करने वाले दोनों मुख्यमंत्रियों ने राज्य में रोजगार के मौके बढ़ाने पर कोई काम नहीं किया है. हालांकि इस बात की अब से पहले इतनी जरूरत भी महसूस नहीं हुई थी. राज्य में कुछ ही दिनों में बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट (Bengal Global Business Summit) का आयोजन होने जा रहा है, जहां ममता बनर्जी के सच का पता लग जाएगा और ये भी सामने आएगा कि सरकार की बातें और काम – दोनों एक लेंथ में हैं भी या नहीं.

देखा जाए तो बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट यानी BGBS दो दिन चलने वाला एक निवेश शिखर सम्मेलन है जहां सरकारें निवेशकों को आमंत्रित करती हैं, उनके साथ एक मंच पर उपस्थित होती हैं और दोनों पक्षों के बीच साथ काम करने के कई वादे-दावे भी किए जाते हैं और समझौतों पर हस्ताक्षर होते हैं. निवेशकों को लुभाने के लिए हर सरकार राज्य को एक शोकेस की तरह पेश करती है. हालांकि, बंगाल इस मामले में अलग है. ममता बनर्जी को इस बात पर खुद को साबित करना है. और उनको इस मामले में सफल होने की वाकई बहुत जरूरत है क्योंकि अब के माहौल में राज्य के लोग नौकरी और रोजगार के लिए मुंह बाए खड़े हैं. बेरोजगारी से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि अन्य राज्यों की तुलना में बंगाल में स्कूल (कक्षा 10 से 12) पास करने वाले और स्नातक की डिग्री धारकों के पास रोजगार के साधन बेहद कम हैं.

देश की अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद में एक समय पर बंगाल की भागीदारी एक-चौथाई की थी जो अब घटकर केवल 5 प्रतिशत तक की रह गई है. ऐसे में यह बहस का कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए कि राज्य में निजी निवेश एक अहम जरूरत है और दुनियाभर में आय सृजन गतिविधि के लिए इसे एक मान्यता प्राप्त तरीका माना जाता है. इसी के साथ मुद्दा यह भी है कि क्या शासन राज्य में निवेशकों को निवेश करने के लिए अनुकूल माहौल देने की चुनौती पर ध्यान दे रहा है या नहीं.

धारणाओं का खेल

1999 में पश्चिम बंगाल के रायचक में पहला निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था. इसमें मैकिन्से एंड कंपनी के अश्विन अदारकर ने ‘व्यवसाय क्रांति के लिए घोषणापत्र’ शीर्षक के अपने भाषण में कहा था कि बंगाल एक खास तरह की छवि की समस्या से ग्रस्त है और सरकार को सुर्खियां बटोरने और राज्य से दूर रहने वाले निवेशकों में विश्वास जगाने के लिए कई बड़े कदम उठाने की जरूरत है.


एक तरीके से देखा जाए तो ममता बनर्जी आज ठीक उसी जगह खड़ी हैं, जहां ज्योति बसु दो दशक पहले खड़े थे. राज्य में निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए बसु कई फ्रंट पर लड़ रहे थे जिसमें लाइसेंस राज, भारत सरकार की पूरे देश में उद्योग लगाने के बराबर मौकों की नीति और उग्रवादी ट्रेड यूनियनवाद की वजह से उपजे ऐतिहासिक सवाल आदि शामिल हैं.


ममता बनर्जी के लिए राज्य में प्राइवेट निवेश लाने की चुनौती थोड़ी अलग है और इसमें केवल बाहरी कारण ही शामिल नहीं हैं. एक तरफ, बंगाल अभी भी सिंगूर आंदोलन के समय से उपजी उद्योग विरोधी छवि के अवशेषों से जूझ रहा है जो इसकी स्थापना के समय से ही इसके साथ जुड़ गए हैं. और दूसरा ये कि सत्ताधारी ने ये प्रण ले रखा है कि राज्य में स्पेशल इकॉनॉमिक जोन यानी कि SEZ को अनुमति नहीं दी जाएगी. दूसरे स्तर पर, हालांकि, कारण सामान्य शासन से अधिक जुड़े हुए हैं. और इस तरह मुख्यमंत्री के राज्य में बड़े निवेश के सपने को लेकर यह समय अनुपयुक्त माना जाता सकता है.

न्यायिक कार्रवाई

पिछले एक महीने में राज्य में माहौल अचानक बदल गया है. जहां कुछ दिनों में बलात्कार की कई घटनाएं सामने आई हैं, वहीं कलकत्ता उच्च न्यायालय भी हाल में सभी गलत कारणों से सुर्खियों में रहा है. इसने एक पखवाड़े में कम से कम सात मामलों को जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो में भेजने का एक रिकॉर्ड ही कायम किया है और साथ ही राज्य में शासन की गुणवत्ता को भी सवालों के घेरे में ला दिया.


इन्हीं बातों को लेकर पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री पर उनके राजनीतिक विरोधियों ने अपने हमले तेज कर दिए हैं और अदालत के इस तरह राज्य की शासन प्रणाली पर अविश्वास प्रदर्शित करने से सरकार की और अधिक आलोचना हो रही है. राज्य में पिछले एक महीने में जघन्य प्रकार की हिंसा और हत्याएं हुई हैं. इस दौरान बंगाल में हिंसक गुटीय झगड़े हुए हैं, अवैध व्यवसायों की लूट के लिए सत्तारूढ़ दल के नेता उगाड़ी पर लगे हैं, लगातार रेप की खबरें आ रही हैं, उच्च न्यायालय की विभिन्न पीठों ने कई मौकों पर शासन के प्रति नाराजगी व्यक्त की है और वकीलों ने सत्तारूढ़ दल के प्रति निष्ठा का दावा पेश करते हुए अदालत में एक न्यायाधीश के कामकाज को ही अवरुद्ध कर दिया और हाथापाई तक पर उतर आए.


इन सभी घटनाओं के चलते राज्य में एक स्पष्ट तनाव साफ नजर आ रहा है और निस्संदेह ये विकास और निवेश के अनुकूल नहीं कहे जाएंगे. घरेलू हो या विदेशी – प्रत्येक निवेशक निवेश से पहले राज्य में सरकार की स्थिरता, नीतियों की स्थिरता, प्रोत्साहन, गैर-हस्तक्षेप वाला माहौल और एक शांतिपूर्ण वातावरण चाहता है.

शांति की खोज

किसी भी राज्य में यदि विभिन्न क्षेत्रों में सत्ताधारी दल के नेता स्वयं को कानून के रूप में सामने लाते हैं, गुटबाजी तेज हो जाती है और अधिकतर मामलों में पुलिस असहाय और मूक दर्शक बनी नजर आती है तो ऐसे में निवेशक भी अपने कदम आगे बढ़ाने से कतराते हैं. वैसे भी, हाल के वर्षों में जबरन वसूली की शिकायतें कई गुना बढ़ गई हैं. इसके अलावा, ऐसी घटनाओं में पुलिस की निष्क्रियता, जिनमें सत्ताधारी पार्टी के नेता शामिल होते हैं – निवेशकों के विश्वास को ठेस पहुंचाती है.


एसएमई क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों को राज्य सरकार बहुत गर्व के साथ गिनावाती है. और इसके ऐसा करने में कोई बुराई भी नहीं है. केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल देश में एसएमई इकाइयों का 14 प्रतिशत हिस्सा है. इस आंकड़े की खास बात ये है कि इस मामले में बंगाल अपने से कहीं बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के साथ संयुक्त तौर पर प्रथम स्थान साझा करता है. लेकिन जांच करने के लिए मामले की और भी परतें अभी बाकी हैं. छोटी कंपनियों के लिए टर्नओवर रेंज जहां 5 करोड़ रुपये से 50 करोड़ रुपये के बीच है वहीं मध्यम इकाइयों के लिए यह 250 करोड़ रुपये के बीच है.


एसएमई की लिस्ट में बड़ी संख्या में ऐसी इकाइयां आती हैं जो गुणवत्तापूर्ण रोजगार के ऐसे अवसर प्रदान करने में विफल रहती हैं, जिसकी तलाश शिक्षित युवाओं का एक बड़ा वर्ग करता है. डिलीवरी बॉय और सुरक्षा एजेंसियों के लिए श्रमिकों वाली राज्य की अर्थव्यवस्था को गिग इकॉनॉमी में गिना जाता है जहां छोटे स्तर की कम समय के कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियां तो हैं लेकिन पढ़े लिखों के लिए परमानेंट जॉब्स नहीं. ऐसे में छोटे और मध्यम स्तर के ठेकेदार राज्य से मूल्यवान मानव संसाधनों की निकासी को नहीं रोक सकते, जो पिछली शताब्दियों में राज्य के विकास की रीढ़ माने जाते थे.

ईपीएफओ डेटा

इस सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी भविष्य निधि कार्यालय (ईपीएफओ) डेटा है. उदाहरण के लिए, जनवरी के पेरोल डेटा में ईपीएफओ (दूसरे शब्दों में, पीएफ पाने वाले कर्मचारियों) में 18 वर्ष से नीचे के आयु वर्ग के लिए पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी न्यूनतम 1.9 प्रतिशत से लेकर 35 वर्ष से ऊपर की आयु के लिए 3.5 प्रतिशत के उच्च स्तर तक थी. इसकी तुलना में पहले बताए गए आयु वर्ग में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 11.6 प्रतिशत और 23.7 प्रतिशत तक थी. इसी तरह कर्नाटक का शेयर 6.3 प्रतिशत और 13.3 प्रतिशत का रहा. वहीं तमिलनाडु के आंकड़े 9.2 प्रतिशत और 26 प्रतिशत के रहे, तो गुजरात 7.6 प्रतिशत और 12 प्रतिशत के नंबर्स पर है.


यानी तस्वीर एकदम साफ है. अगर बंगाल को अपना खोया हुआ स्तर फिर से पाना है, तो उसे भारी निवेश में एक बड़ी छलांग लगानी होगी. नहीं तो यह अपनी उस बौद्धिक पूंजी को इसी तरह खोता रहेगा, जिसके दम पर वह कभी देश का बेशकीमती गहना हुआ करता था. हालांकि भारतीय यूनिकॉर्न – 1 बिलियन डॉलर से अधिक के मूल्यांकन वाली स्टार्टअप कंपनियां – इन दिनों बहुत चर्चा में हैं – लेकिन इनमें बंगाल की ओर से कोई भी नाम शामिल नहीं है.


पश्चिम बंगाल का प्रति व्यक्ति राज्य घरेलू उत्पाद 2011-12 में 51,543 रुपये से बढ़कर 2020-21 में 121,267 रुपये हो गया है. वहीं इस अवधि में तमिलनाडु 93,112 रुपये से 225,106 रुपये और कर्नाटक में 90,263 रुपये से बढ़कर 226,796 रुपये हो गया है. महाराष्ट्र के मामले में यह आंकड़ा 99,597 रुपये से 202,130 रुपये (2019-20 तक), गुजरात में 7,481 रुपये से 213,936 रुपये (2019-20 तक) और हरियाणा में 106,085 रुपये से 239,535 रुपये तक पहुंच गया है.

क्या साबित करना है

ममता बनर्जी के पास साबित करने के लिए एक प्रमुख मुद्दा है. राज्य के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने उन्हें और पूर्व वित्त मंत्री अमित मित्रा को पत्र लिखकर राज्य में बीजीबीएस के पुराने संस्करणों से आकर्षित निवेश का विवरण मांगा. इसके जवाब में राज्य सरकार ने दावा किया कि 2014 और 2019 के बीच इन वार्षिक शिखर सम्मेलनों के माध्यम से कुल 12.3 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया था लेकिन राज्यपाल ने महज इतनी जानकारी लेने से इनकार कर दिया और प्रस्तावित निवेश का विवरण मांगा मसलन इसका कितना हिस्सा अंततः फलित हुआ और इससे कितना रोजगार राज्य में उत्पन्न हुआ.


मुख्यमंत्री से ये सवाल पूछने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा भी लिया और जब वह चुप्पी साधे रहीं तो उन्होंने वित्त मंत्री अमित मित्रा और वित्त सचिव से इन जवाबों के लिए संपर्क किया. लेकिन जैसी स्थिति बन रही है उसमें मुख्यमंत्री को न केवल रोजगार के लिए बल्कि राजस्व के लिए भी राज्य में उद्योग स्थापित करवाने की जरूरत है. बंगाल पर खाली होते राजकोष का भी बहुत दबाव है और मुख्यमंत्री के सामने राज्य को मजबूत करने का एकमात्र स्थायी तरीका मजबूत औद्योगिक आधार का निर्माण करना है. और यह भी साबित करना है कि ये जम्बूरे धूमधाम और तमाशे से परे वास्तविक मूल्य भी जुटा सकते हैं.


राज्यपाल को जवाब देते हुए, पूर्व वित्त मंत्री अमित मित्रा ने सितंबर 2020 में दावा किया कि प्रस्तावित निवेश का 50.27 प्रतिशत कार्यान्वयन में बदला, जिसके परिणामस्वरूप 28 लाख लोगों को राज्य में रोजगार मिला. लेकिन आंकड़ों का सच यही है कि बंगाल अभी भी महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु जैसे राज्यों से सभी मानकों जैसे प्रस्तावित परियोजनाओं, परियोजनाओं को लागू करने की संख्या और मूल्य में पीछे है.

2018, 2019 और 2020 में (मई तक) बंगाल का देश में हस्ताक्षरित औद्योगिक उद्यमी ज्ञापन (IEM) का 1-3 प्रतिशत हिस्सा था और लागू किए गए IEM को लेकर भी करीब इतनी ही भागीदारी थी. अक्टूबर 2019 और सितंबर 2021 के बीच, भारत में आने वाले FDI का 0.72 प्रतिशत हिस्सा बंगाल का था. जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दिल्ली की इस मामले में हिस्सेदारी क्रमशः 26.44 प्रतिशत, 22.66 प्रतिशत, 22.60 प्रतिशत और 12.68 प्रतिशत रही.

क्या हैं मुश्किलें

ममता बनर्जी ने कोई राज नहीं रखा है कि उनकी सरकार उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण के विरोध में है. वह सैद्धांतिक रूप से एसईजेड का भी विरोध करती हैं. तो जहां वह अधिग्रहण और एसईजेड जैसी टर्म्स को सही नहीं मानती हैं, वहीं निवेशकों के लिए तो ये लगातार पसंद किए जाने वाले सदाबहार शब्द हैं.

बीरभूम जिले के देवचा पचमी के बारे में माना जाता है कि यहां दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़े कोयला भंडार है लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. इसकी वजह है सरकार के आगे यहां की स्थानीय आबादी को शांतिपूर्वक विस्थापित करने की चुनौती. बता दें कि यहां बड़ी संख्या में आदिवासी रहते हैं. जहां तक ताजपुर में प्रस्तावित गहरे बंदरगाह का संबंध है, तो इसे पड़ोसी राज्य ओडिशा के धामरा और पारादीप जैसे बंदरगाहों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है. ये दोनों ही गहरे बंदरगाह हैं और ताजपुर से इनकी दूरी ज्यादा नहीं है.

ये हैं अपेक्षाएं

1999 में अपनी 55-पृष्ठ की प्रस्तुति में मैकिन्से ने बंगाल को निवेशक-अनुकूल राज्य बनाने के लिए ज्योति बसु को एक खास सलाह दी थी. इसमें कहा गया था कि निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए उनको किसी भी भारतीय राज्य को बेंचमार्क के तौर पर नहीं देखना चाहिए, बल्कि सिंगापुर और ताइवान जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में से एक को बतौर मॉडल चुनना चाहिए. ममता बनर्जी शायद उनकी बताई बातों में से कुछ बिंदु चुन सकती हैं और अपने शासन की तुलना उस अच्छे देश से कर सकती हैं जो निवेश के टुकड़ों के बिना आगे नहीं बढ़ सकता. बंगाल जिस जोश के साथ राज्य में एसएमई की संख्या बढ़ाना चाहता है, उसे आकर्षित करने के लिए राज्य को हेडलाइन बनकर छा जाने वाले निवेशों को लुभाना ही होगा.


लेकिन इस सबकी शुरुआत प्रेरक आत्मविश्वास के साथ होती है. और अच्छा बुनियादी शासन निवेशकों के बीच भरोसा और विश्वास पैदा करने का आधार है. जॉन मेनार्ड कीन्स ने अपने एक प्रसिद्ध कथन में कहा था कि निवेश आस्था का विषय है. और यह आस्था काफी हद तक उस प्रवचन से उत्पन्न होती है जो हमें अपने चारों ओर से दिखाई देता है. यदि बंगाल इसे पाने वाले छोर पर खड़ा होता है, तो वह इस धारणा के खेल को खो देगा.


अगर तृणमूल कांग्रेस के नेता यह साबित करने के लिए कि बंगाल की तुलना में कई अन्य राज्यों में महिलाओं पर ज्यादा अत्याचार हो रहे हैं, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के पन्ने पलटते रहेंगे तो यह महज बहस का ही एक बिंदु बनकर रह जाएगा. जबकि सच ये है कि मौजूदा समय में राज्य को निवेश की सख्त जरूरत है, न कि ऐसे वाद-विवाद में खुद को ऊपर साबित करने की.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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