धान की फसल में वन विभाग ने छोड़े मवेशी, लामबंद हुए आदिवासी, कहा- ‘जमीन हमारी’

वन विभाग द्वारा किये गए इस अमानवीय करतूत के बाद भारी संख्या में बैगा आदिवासियों ने जिला प्रशासन से जमीन का पट्टा दिलाने और धान की फसल की भरपाई की मांग की है.

आदिवासियों ने की जमीन का पट्टा दिलाने और धान की फसल की भरपाई की मांग.

यूं तो उत्तराखंड सरकार वन अधिकार के तहत बैगाओं को जमीन का अधिकार देने के कई दावे और वादे करती है. वहीं समनापुर में हुई एक घटना ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है. समनापुर जिले के वनग्राम सिमरधा के कई बैगा परिवार जो सालों से जमीन पर खेती कर अपनी आजीविका चला रहे थे, वन विभाग ने दल-बल के जोर पर उनकी आंखों के सामने लहलहाती फसलों को नष्ट कर उन्हें वहां से बेदखल कर दिया.

बैगा आदिवासियों ने बताया कि समनापुर के वनग्राम सिमरधा की भूमि में सालों से उनके पूर्वज खेती करते आ रहे हैं. इनका जीवनयापन इसी भूमि से होता आ रहा है और तब जबकि इसमें धान की फसल लगी हुई है, उसे वन विभाग ने अचानक आकर अपना बताया और उसमें आवारा पशुओं को छोड़ दिया. जब वहां मौजूद लोगों ने अधिकारियों से ऐसा न करने को कहा तो बल प्रयोग करते हुए उन्हें वहां से भगाने की कोशिश की, जिससे वह भड़क गए और वनकर्मियों के साथ उनका विवाद हो गया.

जमीन का पट्टा और फसल की भरपाई की मांग

विवाद बढ़ता देख पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाया, तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ. बहरहाल वन विभाग के इस रवैये के खिलाफ बैगा आदिवासी लामबंद हो गए हैं. वन विभाग द्वारा किये गए इस अमानवीय करतूत के बाद भारी संख्या में बैगा आदिवासियों ने जिला प्रशासन से जमीन का पट्टा दिलाने और धान की फसल की भरपाई की मांग की है. वहीं इस मामले में वन विभाग के आलाधिकारी कुछ भी कहने से बचते नजर आ रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2005 में वन अधिकार अधिनियम पास किया गया था.

आदिवासियों को विशेष अधिकार

वन अधिकार अधिनियम को बने लगभग 18 वर्ष हो चुके है, जिसका मूल उद्देश्य था कि वन्य ग्रामों में रहने बाले आदिवासियों को वन अधिकार का पट्टा देना. ताकि उन्हें मालिकाना हक मिल सके. डिण्डोरी के बैगा आदिवासियों को विशेष अधिकार मिला हुआ है, लेकिन अब इन आदिवासियों को न व्यक्तिगत और सामुदायिक पट्टे वितरित नही किये जा रहे हैं.

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प्रदेश सरकार के विकास के दावे खोखले

एक तरफ प्रदेश सरकार आदिवासियों को समाज की मुख्य धारा में लाने का दावा करती है. वहीं दूसरी तरफ वन विभाग उनकी फसल नष्ट कर रहा है. वन विभाग के मैदानी अमले के द्वारा वन ग्रामों में निवासरत आदिवासियों पर घोर अत्याचार की तस्वीरें सामने आती हैं तो प्रदेश सरकार के विकास के दावे खोखले नजर आते हैं.

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