दंगाइयों, फ़सादियों को परास्त करने के लिए उत्तर प्रदेश का बुलडोज़र मॉडल अब हर राज्य में दौड़ रहा है

Delhi Bulldozer

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से चला बुलडोज़र (Bulldozer) अब मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड तक पहुंच चुका है. जहां कहीं भी सरकार दंगों, फ़साद, हिंसा व अवज्ञा से परेशान होती है फ़ौरन बुलडोज़र चलाने का ऑर्डर दे देती है. जबकि पहले बुलडोज़र सिर्फ़ अतिक्रमण हटाने के काम आता था. जेसीबी (JCB) का इस्तेमाल अक्सर सड़क मार्गों से अवरोध हटाने के लिए होता था. पहाड़ी रास्तों पर कोई पहाड़ धसक गया, तो जेसीबी मंगवाई जाती थी. मगर शक के आधार पर किसी का घर गिराने अथवा राजनीतिक विरोधियों को परास्त करने के लिए भी अब यह बुलडोज़र प्रयोग में लाया जाने लगा है.

1970 से अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू हुआ था

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसका श्रेय लेते हैं कि सबसे पहले उन्होंने ही बुलडोज़र अभियान शुरू किया था. पर यह सच नहीं है. राज चलाने का बुलडोज़र मॉडल सबसे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर ने पेश किया था. हालांकि उनके पहले उत्तर प्रदेश में महानगर पालिकाओं ने यह अभियान 1970 के दशक से शुरू कर दिया था. तब ज़िला प्रशासन भी यह अभियान चलाता था. यह कुछ वैसा ही अभियान था जैसे कि पुलिस का शिष्टाचार सप्ताह. इसी तरह महानगर पालिका का अतिक्रमण विरोधी दस्ता साल में एक बार निकलता और थोड़ा-बहुत तितर-बितर कर चला जाता. अपराधियों के संदर्भ में कोई कार्रवाई अदालत के फ़ैसलों के बाद ही करनी ही होती तो बस चल संपत्ति ही ज़ब्त की जाती या कोई खिड़की, दरवाज़ा तोड़ दिया जाता.

अतिक्रमण तोड़ो अधिकारी

उत्तर प्रदेश में कुछ अधिकारी तो अतिक्रमण तोड़ो अधिकारी ही कहे जाते. जब मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा थे, तब एक पीसीएस अधिकारी एससी रस्तोगी बहुत चर्चित हुए थे. उन्होंने सार्वजनिक स्थानों से अतिक्रमण खूब जोर-शोर से हटवाए. ख़ास बात यह थी कि उन्हें स्थानीय लोगों का सपोर्ट भी मिलता. क्योंकि खेल के स्थानों, पार्कों व हरित क्षेत्रों में क़ब्ज़े से स्थानीय लोग भी परेशान रहते. लेकिन तब तक बुलडोज़र चलन में नहीं आया था, इसलिए यह अतिक्रमण हटाने का काम ज़िला प्रशासन के अधिकारी मज़दूरों से करवाते. चूंकि पहले से सूचना होती थी, इसलिए लोग स्वयं अपना सामान हटा लेते. उनके बाद एक अन्य अधिकारी बाबा हरदेव सिंह की तो ख्याति ही अतिक्रमण विरोधी बाबा की बन गई. वे जिस शहर में जाते वहां लोग पहले से ही अतिक्रमण हटा लेते.

योगी से पहले भी था बाबा का बुलडोज़र

उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र सबसे पहले 1996-97 में आया जब बाबा हरदेव सिंह ग़ाज़ियाबाद नगर निगम में मुख्य नगर अधिकारी थे. उन्होंने अतिक्रमण के ख़िलाफ़ एक अभियान चलाया और बुलडोज़र का इस्तेमाल किया, इसीलिए उत्तर प्रदेश में उन्हें बुलडोज़र बाबा कहा जाने लगा. वे जहां कहीं भी गए, बुलडोज़र साथ गया. लेकिन बाबा हरदेव सिंह भी यह स्वीकार करते हैं कि अतिक्रमण हटाने के पूर्व सूचना देना बहुत ज़रूरी है. ज़िला प्रशासन सिर्फ़ सरकारी या नजूल की ज़मीन पर हुए अतिक्रमण को ख़ाली करवा सकता है. लेकिन रिहायशी क्षेत्र के अतिक्रमण को नगर निगम या विकास प्राधिकरण ही तुड़वा सकता है. किंतु पब्लिक प्रासीक्यूशन एक्ट अतिक्रमण करने वाले को भी अधिकार देता है कि वह अतिक्रमित क्षेत्र के बाबत या तो स्पष्टीकरण दे अथवा अपना अतिक्रमण स्वयं हटवा ले.

राजनीतिक ने थामी बुलडोज़र की कमान

हालांकि ,एक राजनीतिक के तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ही सबसे पहले यह दृढ़ता दिखाई कि उन्होंने बुलडोज़र का इस्तेमाल माफिया सरगनाओं के विरुद्ध किया. चूंकि इन अपराधियों से स्थानीय जनता भी परेशान थी इसलिए किसी ने भी माफ़ियाओं के घर या ऑफ़िस तोड़े जाने का विरोध नहीं किया. योगी आदित्यनाथ सरकार के समय कानपुर के माफिया विकास दुबे के बिकरू गांव स्थित घर को तोड़ा गया. इसके बाद अतीक अहमद और मुख़्तार अंसारी की बिल्डिंगों पर भी बुलडोज़र चला. तब योगी सरकार पर यह आरोप भी लगा कि जान-बूझ कर जाति विशेष और समुदाय विशेष के लोगों के ही घर तोड़े गए. जबकि अपराधी तो और लोग भी थे.

यूपी ने बुलडोज़र का स्वागत किया

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान इस बुलडोज़र का खूब प्रचार हुआ. मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को बुलडोज़र बाबा कहा गया. उन्होंने अपने भाषणों में कहा भी कि आगे भी वे अपराधियों, भू-माफ़ियाओं के क़ब्ज़े वाली ज़मीन इसी तरह तुड़वाते रहेंगे. प्रदेश की जनता ने उनके इस बयान का स्वागत किया और उनकी जीत हुई. जनता को यह लगा कि प्रदेश को अपराध मुक्त करने का एकमात्र विकल्प अपराधियों के हौसले पस्त कर देना है. उन्होंने पहले भी कहा था, कि दंगों में जिस किसी का हाथ पाया गया, उसे ही मुआवजा देना होगा. अर्थात् उसका घर कुर्क कर लिया जाएगा. ऐसा उत्तर प्रदेश में किया भी गया. शायद यही कारण रहा, कि उत्तर प्रदेश में कोई तनातनी नहीं हुई.

रामनवमी पर हिंसा के बाद और तेज चली जेसीबी

अभी राम नवमी पर देश के कई राज्यों में हिंसा हुई. मस्जिदों के सामने से राम नवमी के जुलूस निकले और फिर दोनों तरफ़ से पथराव हुए. कहीं-कहीं से फ़ायरिंग की खबरें भी आईं. ख़ासतौर पर मध्य प्रदेश के खरगौन शहर से, गुजरात के खंभात से तथा कर्नाटक में कुछ स्थानों से. दोषियों की पहचान कर उनके घर गिरवाए जाने लगे तो इसी बुलडोज़र का इस्तेमाल हुआ. आरोप है कि घर गिरवाने के नाम पर एक समुदाय विशेष को ही टार्गेट किया गया. ताज़ा मामला दिल्ली का है, जहां हनुमान जयंती (17 अप्रैल) के जुलूस पर हमला हुआ. आरोप लगा कि एक समुदाय विशेष के लोगों ने यह हमला किया. उन्हें विदेशी रोहिंग्या और बांग्ला देशी बताया गया. इसके बाद 20 अप्रैल को वहां भी बुलडोज़र से तोड़-फोड़ चलने लगी. यह अभियान दिल्ली नगर निगम ने चलाया. दोपहर बाद जब सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया तब बुलडोज़र पर रोक लगी.

जेई के पास फ़ाइल होगी

बुलडोज़र अभियान उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ और इसमें उत्तर प्रदेश के कई अधिकारी अगुआ रहे हैं. इलाहाबाद में अतिक्रमण के ख़िलाफ़ अभियान चलाने में मशहूर हुए प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी आर विक्रम सिंह के अनुसार नगर निगम और विकास प्राधिकरण तथा ज़िला प्रशासन सबके पास अवैध निर्माण और अतिक्रमण की फ़ाइल होती है, किंतु बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन! यह सोच कर कोई कार्रवाई नहीं करता. ऐसे में या तो कोई राजनेता दृढ़ता दिखाए अथवा ऊपर से अधिकारी आदेश करें, तब ही अभियान चलता है. उनका कहना है, कि जहांगीरपुरी में जो भी ध्वस्तीकरण हुआ है, उन सबकी फ़ाइल जूनियर इंजीनियर के पास होगी. कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना क़ानूनी खानापूरी के जोखिम नहीं लेगा. उत्तर प्रदेश के बुलडोज़र को अब हर सरकारें हथियार बना रही हैं. लेकिन इसे क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखने का शस्त्र नहीं बनाया जाना चाहिए. अन्यथा यह बैक मारने लगेगा .

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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