जैसे-जैसे आर्थिक स्थिति को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, 3+3 कूटनीति में वित्त मंत्री को भी शामिल किया जाना चाहिए

Nirmala Sitharaman

हाल के वर्षों में रक्षा, विदेशी मामलों और अर्थशास्त्र की तिकड़ी बना कर राष्ट्रों ने अपने हितों को साधने के लिए दूसरों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. रक्षा, कूटनीति या अर्थव्यवस्था (Indian Economy) में से केवल दो के बारे में बात करना अब सही नहीं रह गया है. इसका उपयुक्त उदारहण यूक्रेन (Ukraine) को लेकर रूस (Russia) पर पश्चिमी देशों का एक हथियार के रूप में आर्थिक प्रतिबंधों का उपयोग है.

आमतौर पर आम लोगों से जुड़ा व्यापार और वाणिज्य अब तेजी से हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. केवल युद्ध के मैदान में जंग जीती जाती है, ये पश्चिमी विचार अब पुराना पड़ चुका है. अब हम सुपर-स्पेशलाइजेशन के युग में हैं जहां कार्यक्षेत्र छोटे होते जा रहे हैं और संकीर्ण और अदूरदर्शी हितों के लिए कोई जगह नहीं है. ऐसे में शब्दजाल और तकनीक से ऊपर उठ कर बड़ी तस्वीर देखने की जरूरत है. राष्ट्रीय सुरक्षा एक समग्र अवधारणा है जिसमें कई गतिशील हिस्से होते हैं जिनमें से रक्षा एक है.

2+2 मॉडल

दो देशों के बीच के संबंधों को हर देश का विदेश मंत्रालय नियंत्रित करता है. इसमें विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद के निर्णयों के आधार पर संबंध बनाए जाते हैं और प्रतिक्रिया दी जाती है. विदेश मंत्रालय उचित प्रतिक्रिया तैयार करने के लिए आवश्यक इनपुट के लिए रक्षा मंत्रालय सहित कई और मंत्रालयों के साथ चर्चा करता है. भारत के लिए पिछले कुछ दशकों में रक्षा पर विचार-विमर्श एक भारी फैक्टर के रूप में उभरा है. इसलिए कूटनीति के 2+2 मॉडल पर जोर दिया जाता है जिसमें दो देशों के विदेश और रक्षा मंत्री शामिल होते हैं. इससे द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर बातचीत के लिए एक अनूठा मॉडल तैयार होता है.


रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत में 2+2 मॉडल अपनी क्षमता बढ़ाने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के कारण काफी महत्वपूर्ण हो गया है. भारत ने अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और रूस जैसे देशों के साथ रणनीतिक संबंध विकसित करना शुरू कर दिया है. इनमें पहले तीन देश क्वॉड सुरक्षा संवाद का भी हिस्सा हैं. रक्षा और विदेश मंत्रालय रणनीतिक भागीदारों के बीच प्रभावी संवाद के लिए पर्याप्त होते थे मगर कोविड-19 ने आर्थिक रूप से व्यवधान खड़ा कर दिया. इसके बाद रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने इस रणनीति पर दोबारा सोचने को मजबूर कर दिया है.


कोविड-19 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 मार्च, 2020 को एक वैश्विक महामारी घोषित किया. इसने मानव इतिहास में हर देश को असीमित दुख, तकलीफ पहुंचाई है. इसके परिणामस्वरूप विकसित पश्चिम देशों में भी बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई. भारत सहित कई देशों ने पर्याप्त आर्थिक पैकेज जारी किए, फिर भी दुनिया भर के लोगों की आर्थिक स्थिति पर महामारी का काफी बुरा प्रभाव पड़ा. इसके कुछ सामान्य आर्थिक लक्षण थे: हाल के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी मंदी, वैश्विक प्रभाव, बड़ी तादाद में छंटनी, चिकित्सा का संकट, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति के कारण गरीबी और भूखमरी, अर्थव्यवस्थाओं के ढहने से भारी मानवीय पीड़ा

नई आर्थिक वास्तविकताएं

दुनिया भर के देश कोविड के करण हुए लॉकडाउन और उसके बाद की आर्थिक तबाही से उबर ही रहे थे कि 24 फरवरी से रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हो गया. इस जारी युद्ध के कारण बड़ी संख्या में मौत हो रही है और अभूतपूर्व विनाश हुआ है. इसका प्रभाव केवल इन दो देशों तक ही सीमित नहीं है. वास्तव में, इसका प्रभाव सभी महाद्वीपों में महसूस किया जा रहा है. आर्थिक स्थिति से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रभाव निम्नलिखित हैं:


पिछले कुछ साल में रूसी संघ और यूक्रेन गेहूं, मक्का, रेपसीड, सूरजमुखी के बीज और सूरजमुखी के तेल के शीर्ष तीन वैश्विक निर्यातकों में से एक रहे. युद्ध के कारण इन खाद्य तेल और बीजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो गई है और आम लोगों के भोजन में शामिल इन चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. चूंकि रूस और यूक्रेन यूरोप और नॉर्थ अमेरिका को गेहूं सप्लाई करते थे, वहां इनकी कीमतें काफी बढ़ गई हैं. इसी संदर्भ में भारतीय प्रधानमंत्री ने दुनिया भर के देशों को गेहूं और अनाज की आपूर्ति की पेशकश की ताकि उन्हें भूख और दुख का सामना न करना पड़े.


रूस और यूक्रेन उर्वरकों की भी आपूर्ति करते हैं. युद्ध के कारण इनकी आपूर्ति भी समान रूप से बाधित हुई है. अमेरिका, नाटो और कुछ दूसरे देशों ने मिल कर रूस पर प्रतिबंध लगा दिये हैं. यहां तक कि तेल और गैस के आयात पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है. इसने इन देशों को भी काफी हद तक प्रभावित किया है. महंगाई कई बार 50 फीसदी तक को पार कर रही है. प्रतिबंधों के तहत रूस को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए जरूरी स्विफ्ट प्रणाली से बाहर कर दिया है. यह दर्शाता है कि केवल चुनिंदा देश ही इनका फायदा उठा रहे हैं. इससे असमानता भी सामने आती है. सबसे बुरी बात यह है कि सत्ता में बैठे चंद लोगों के फैसले के कारण आम लोग परेशानी में पड़ गए हैं.

वित्त मंत्री को भी शामिल करें

इसलिए यह स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि इस दशक में और उसके बाद भी आर्थिक संबंधों का अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक प्रमुख स्थान होगा. इस प्रकार यह आवश्यक है कि 2+2 संवादों को 3+3 संवादों में बदल दिया जाना चाहिए. विदेश और रक्षा मंत्री के साथ वित्त मंत्री को भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चा का एक अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए. आर्थिक और वाणिज्यिक का महत्वपूर्ण जगह होने के कारण इस तरह के चर्चा में हर हाल में वित्त मंत्री को भी शामिल होना चाहिए.


भारत को भी अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ अपने संवाद को मौजूदा 2+2 से बढ़ाकर 3+3 करना चाहिए. तभी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वास्तविक चर्चा संभव हो सकती है. अब तक अंतरराष्ट्रीय चर्चा में हिस्सा नहीं लेने वाले वित्त मंत्री को ऐसे सम्मेलनों में जरूर शामिल करना चाहिए. भारत को इसकी शुरुआत रूस, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जेसे अपने पुराने भागीदारों के साथ करना चाहिए. बाद में इसे दूसरे देशों के साथ भी विस्तार दिया जा सकता है.


इजरायल, फ्रांस और जर्मनी जैसे कुछ महत्वपूर्ण देश हो सकते हैं जहां 2+2 संवाद को 3+3 मॉडल के साथ शुरू किया जाना चाहिए. भरा पूरा अनाज भंडार, एक मजबूत दवा उद्योग और जनसंख्या में युवाओं की ज्यादा मौजूदगी के कारण भारत एक वैश्विक नेता बनने के कगार पर है. ऐसे में भारत को विदेश और रक्षा मंत्री के साथ वित्त मंत्री को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में शामिल करना चाहिए. चीन के छोटे देशों को कर्ज देकर फंसाने और शोषण की रणनीति को तभी कमजोर किया जा सकता है जब हमारे छोटे, कमजोर पड़ोसी देश भूख और आर्थिक संकट का सामना नहीं करें.

(लेखक रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर हैं और कारगिल युद्ध के अनुभवी होने के साथ-साथ रक्षा विश्लेषक भी हैं.)

Similar Posts