जानिए SIMI से बने संगठन PFI पर क्यों पाबंदी लगा सकती है सरकार?

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द पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (Popular Front of India) 2001 में अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद बैन किए गए स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) की एक शाखा है. पीएफआई को तैयार करने के लिए सिमी के अलावा तीन कट्टरपंथी मुस्लिम ग्रुप कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी, नेशनल डेवलपमेंट फंड (केरल) और मनीथा नीथी पासराय (तमिलनाडु) का भी विलय हुआ था. अब यह उत्तर भारत में एक बड़े संगठन के रूप में विकसित हो गया है. इसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) कथित तौर पर हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) के नेतृत्व वाली AIMIM पार्टी के समर्थन से अपनी राजनीतिक जगह तलाशने की कोशिश कर रही है.

केरल के अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर पी कोया ने सिमी पर प्रतिबंध के बाद संगठन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अल्पसंख्यक समुदाय की बड़ी संख्या के कारण कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में ये पार्टी सक्रिय है. PFI हिजाब विवाद के दौरान भी काफी चर्चा में रही थी. पीएफआई और उसके सहयोगियों पर हिजाब पहनने के अधिकार के विरोध में मुस्लिम महिलाओं को भड़काने और सांप्रदायिक अशांति फैलाने के लिए पीछे से काम करने का आरोप लगाया गया था. कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के अपने फैसले में अशांति के पीछे उनके “छिपे हुए हाथ” का संकेत भी दिया था.

मध्य पूर्वी देशों से संगठन को मिल रहा फंड

सूफी खानकाह एसोसिएशन के प्रमुख सूफी मोहम्मद कौसर हसन मजीदी ने कहा, ‘दिल्ली, राजस्थान और एमपी में सांप्रदायिकता भड़क उठी है इसलिए इसमें बहुसंख्यक समुदाय दक्षिणपंथी ताकतों के साथ पीएफआई की भूमिका होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.’ वह पीएफआई के खिलाफ चुनाव प्रचार करते रहे हैं. मजीदी ने यह भी आरोप लगाया है कि संगठन को मध्य पूर्वी देशों से फंड मिल रहा है. फरवरी में पीएफआई ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘पॉपुलर फ्रंट डे’ का आयोजन किया. जिसमें उसने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की मौजूदगी में आरएसएस नेतृत्व पर हमला बोला.

यूपी के पूर्व डीजीपी बृजलाल (जो अब बीजेपी के राज्यसभा सदस्य हैं) ने मायावती शासन (2007-2012) के दौरान पद पर रहते हुए पीएफआई का मुद्दा उठाया था और कहा था कि यह हिजबुल तहरीर (पार्टी ऑफ लिबरेशन) से जुड़ा है, जो भारत और बांग्लादेश में सभी कट्टरपंथी ताकतों का एक छात्र संगठन है. यह बाटला हाउस एनकाउंटर के दौरान सुर्खियों में आया था. पीएफआई के जरिए एचयूटी ने आजमगढ़ क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी. बृजलाल ने कहा कि बाराबंकी, गोंडा, बहराइच और पूर्वी यूपी के अन्य क्षेत्रों में पीएफआई की गतिविधियां देखी गई हैं. सूत्रों का कहना है कि इसकी गतिविधियां अब मध्य यूपी मुख्य रूप से कानपुर में फैल रही हैं.

केरल से हो रहा पीएफआई का नेतृत्व?

CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान यूपी पुलिस ने दिसंबर 2019 में मेरठ, शामली, मुजफ्फरनगर और लखनऊ में लगभग दो दर्जन पीएफआई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. गौरतलब है कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में 19 लोगों की मौत हो गई थी. यूपी सरकार ने तब केंद्र सरकार को संगठन पर प्रतिबंध लगाने के लिए लिखा था. यह कहा जा सकता है कि ओएमए अब्दुल सलाम, ई एम अब्दुल रहिमन आदि के जरिए पीएफआई का नेतृत्व केरल से किया जा रहा है.

पीएफआई युवाओं को इस्लाम के सलाफी नस्ल के प्रति कट्टर बना रहा है. हालांकि संगठन की ओर से इस आरोप को बार-बार खारिज किया गया है कि वह किसी भी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल था. संगठन ने आरएसएस पर भारतीय समाज में दरार डालने का आरोप लगाया है. पीएफआई के पॉलिटिकल ग्रुप – सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के एक वरिष्ठ सदस्य मुजाहिद पाशा के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वे सलाफी इस्लाम के “चरम और रूढ़िवादी” रूप को बढ़ावा नहीं देते हैं.

‘सरकार के खिलाफ उठाएंगे आवाज’

SDPI और PFI को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. जिन्हें समाज में फैली हर बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. हम अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और ऐसे लोगों के साथ काम करते हैं जो हाशिए पर हैं. इसी तरह PFI राजस्थान इकाई के सचिव ताज मोहम्मद पठान के हवाले से रिपब्लिक टीवी की एक रिपोर्ट में कहा गया है, हमें आधिकारिक तौर पर किसी प्रतिबंध का आदेश नहीं मिला है. अगर सरकार ऐसा करती है तो हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करके सरकार के खिलाफ आवाज उठाएंगे. अब तक पीएफआई पर कोई आरोप साबित नहीं हुआ है. जब तक हमारा संगठन संवैधानिक तरीके से काम कर रहा है और हम कानूनी तौर पर वैध हैं.”

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