जांच एजेंसियां ​​सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंटेंट को कैसे कंट्रोल करती हैं?

पंजाब के मोहाली की चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने उनके आपत्तिजनक वीडियो लीक होने का आरोप लगाया है. ऐसे में सवाल उठता है कि जांच एजेंसियां कैसे सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंंटेंट को कंट्रोल करती हैं. 6 पॉइंट में जानिए जांच एजेंसी कैसे इसका पता लगाती है…

मोहाली एमएमएस मामले में
जांच एजेंसी यह पता लगाएगी कि क्या आपत्तिजनक कंटेंट वायरल हुआ है.

पंजाब के मोहाली की चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने उनके आपत्तिजनक वीडियो लीक होने का आरोप लगाया है. इस मामले में पंजाब पुलिस ने कार्रवाई की है. आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों से ऐसी सामग्री को कंट्रोल करने की बात कही है. जांच एजेंसी यह पता लगाएगी कि क्या आपत्तिजनक कंटेंट वायरल हुआ है. अगर हुआ है तो ऐसा कैसे हुआ.

ऐसे में सवाल उठता है कि जांच एजेंसियां कैसे सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंंटेंट को कंट्रोल करती हैं. 6 पॉइंट में जानिए जांच एजेंसी कैसे इसका पता लगाती है…

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  1. सबसे पहले जांच एजेंसी यह समझने की कोशिश करती है कि किस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक सामग्री जैसे तस्वीर, वीडियो या ऑडियो मैसेज सर्कुलेट हुआ है. जांच एजेंसी इसकी शुरुआत आरोपी के बयान से करती है. एजेंसी पहले गिरफ्तारी के बाद आरोपी से पूछताछ और उसके खुलासे पर भरोसा करते हुए प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है.
  2. सोशल मीडिया पर जिन-जिन यूजर्स के पास से वो आपत्तिजनक सामग्री शेयर की गई उसका पता लगाया जाता है. इसके बाद उस सोशल मीडिया कंपनी के हेडर्क्वाटर से संपर्क किया जाता है. इसके दो तरीके होते हैं. पहला है इमरजेंसी और दूसरा है रूटीन. इमरजेंसी में ऐसे मामले सामने आते है. जैसे- देश की सुरक्षा, किसी इंसान की जान मुश्किल पड़ने या बच्चे को एब्यूज या परेशान किया जा रहा होता है. ऐसे मामलों में सम्बंधित सोशल मीडिया कंपनी से एक्शन लेने को कहा जाता है.
  3. रूटीन मामले में एजेंसी उस डिवाइस का आईपी एड्रेस पता लगाती है और एक्शन लेती है, जिसके जरिए कंटेंट वायरल हुआ है. जांच एजेंसी के कम करने के तरीके को पंजाब के मामले से जोड़कर समझें तो यह इमरजेंसी जैसी स्थिति है. ऐसे में जांच एजेंसी सोशल मीडिया कंपनी को यह बताएगी कि जो आपत्तिजनक कंटेंट वायरल हो रहा है वो कितना खतरनाक है.
  4. अगर सोशल मीडिया कंपनी जांच एजेंसी की बात पर राजी होती है वो उस कंटेंट को अपने प्लेटफॉर्म से या तो हटाती है या पूरी तरह से डिलीट कर देती है. सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 कहता है कि ऐसे हालात में पीड़ित किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के शिकायत निवारण अधिकारी से सम्पर्क करने के लिए स्वतंत्र है. इस नियम के तहत देश में जो भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं, उनके लिए शिकायत निवारण अधिकारियों की तैनाती करना अनिवार्य है.
  5. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले सेंट्रल डिटेक्टिव ट्रेनिंग स्कूल के सायबर फैकल्टी हेड गुरुचरन सिंह का कहना है कि ऐसे मामलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के शिकायत निवारण अधिकारी समस्या का समाधान करने के लिए बाध्य हैं. इस तरह के केस में 24 घंटे के अंदर मामला दर्ज करना अनिवार्य और 15 दिन के अंतर कार्रवाई करना अनिवार्य है. इस तरह भी अपनी समस्या उन तक पहुंचाई जा सकती है.
  6. गुरुचरन सिंह कहते हैं, फेसबुक और ट्विअर के मुकाबले वॉट्सऐप पर आरोपी का पता लगाना ज्यादा मुश्किल होता है. अगर कोई आपत्तिजनक सामग्री फेसबुक और ट्विटर पर वायरल होती है तो जांच एजेंसी उस आरोपी का पता आसानी से लगा सकती है, लेकिन वॉट्सऐप के मामले में सामग्री इतनी तेजी से शेयर की जाती है कि पता लगाना मुश्किल हो जाता है.

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