जब महाराष्ट्र में 112 दिन तक कोई नहीं बन पाया था सीएम… शरद पवार के गेम से हुआ था गड़बड़?

Sharad Pawar 1980

महाराष्ट्र में एक बार फिर सियासी संकट पैदा (Maharashtra Political Crisis) हो गया है. शिवसेना में हो रही उथल-पुथल का नतीजा ये हो सकता है कि प्रदेश को एक बार फिर नया मुख्यमंत्री मिल सकता है. लेकिन, महाराष्ट्र की राजनीति में यह नया नहीं है और ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है. साल 2019 में भी जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने थे तो महाराष्ट्र कई उतार-चढ़ाव का गवाह बना था और फिर से वो ही स्थिति पैदा होने जा रही है. वैसे महाराष्ट्र में इन इथल-पुथल के चक्कर में तीन बार राष्ट्रपति शासन (President Rule) भी लग चुका है. महाराष्ट्र में सियासी संकट के इतिहास में एक वक्त तो ऐसा भी आया था, जब प्रदेश को 112 दिन तक कोई मुख्यमंत्री ही नहीं मिला था.

जी हां, उस वक्त प्रदेश में 112 दिन तक राष्ट्रपति शासन रहा. उस वक्त भी एनसीपी प्रमुख शरद पवार उस पूरे सिनेरियो में अहम व्यक्ति थे. ऐसे में जानते हैं उस वक्त क्या हुआ था और किस वजह से सरकार गिरी थी और उसके बाद भी कब-कब प्रदेश में राजनीतिक संकट पैदा हो चुका है.

कब कब लगा है राष्ट्रपति शासन?

प्रदेश में अभी तक तीन बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है. राज्य में सबसे पहली बार 17 फरवरी 1980 को राष्ट्रपति शासन लगा था. राज्य में 17 फरवरी से 8 जून 1980 तक यानी 112 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा था. इसके बाद 28 सितंबर 2014 को राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था. उस वक्त राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने अपने सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) सहित अन्य दलों के साथ अलग हुआ था और विधानसभा को भंग किया गया था. फिर तीसरी बार 2019 में राष्ट्रपति शासन लगा था, जब देवेंद्र फडणवीस तीन दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे.

1980 में 112 दिन तक नहीं था कोई मुख्यमंत्री

एक बार पहले साल साल 1980 में भी ऐसा ही राजनीतिक संकट गहराया था और उसके बाद सरकार गिरी और 112 दिन तक कोई भी मुख्यमंत्री नहीं बना. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1980 में पैदा हुए इस संकट की शुरुआत 1978 से हुई थी. जब आज के एनसीपी प्रमुख ने शरद पवार ने कांग्रेस में बगावत की. उस दौरान वे तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल की सरकार से अलग हो गए. वैसे आपको बता दें कि उस वक्त देश में इमरजेंसी का दौर खत्म हुआ ही था और उस वकेत वसंतदादा पाटिल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. वंसतदादा पाटिल की सरकार में शरद पवार थे, लेकिन वो 1980 में अलग हो गए.

उस दौरान शरद पवार ने प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट तैयार किया था और खुद सरकार के मुखिया बन गए. लेकिन, उनका राजनीति भी ज्यादा दिन तक कमाल नहीं दिखा पाई. साल 1980 में उनकी सरकार भी चली गई. इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बन गई.उस दौरान 17 फरवरी 1980 को शरद पवार की सरकार की बर्खास्तगी के ऑर्डर पर राष्ट्रपति ने मुहर लगा दी और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. ये करीब 112 दिन तक रहा और फिर राज्य में चुनाव हुए, इसके बाद कांग्रेस को अच्छी सीट मिली और पवार की समाजवादी कांग्रेस को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद एआर अंतुले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने.

2019 में भी आया था संकट

2019 में भी विधानसभा चुनाव में बहुमत ना मिलने पर सभी पार्टियों में सरकार बनाने की होड़ थी. इस वक्त देवेंद्र फडणवीस ने जल्दबाजी में सीएम पद की शपथ ले ली थी और वो 3 दिन ही मुख्यमंत्री रह पाए. इसके बाद उन्हें सीएम कुर्सी गंवानी पड़ी. क्योंकि, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर बीजेपी के खिलाफ अपना पलड़ा बढ़ा लिया था.

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