जनहित में जारी फिल्म में मौजूद हास्य इस फिल्म के महत्वपूर्ण संदेश को कमजोर नहीं करता

Janhit Me Jaari Poster

यह देखना बहुत दुखद है कि जय बसंतु सिंह की जनहित में जारी (Janhit Mein Jaari) जैसी शानदार फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला. इस फिल्म में एक सामाजिक संदेश को मनोरंजन का जामा पहनाकर प्रस्तुत किया गया है. मैंने दो बार फिल्म देखी और हर बार मैंने अपने आस-पास के लोगों को हंसते, ताली बजाते और इस फिल्म की प्रशंसा करते हुए पाया. मुझे लगाता है कि राज शांडिल्य और शान यादव द्वारा लिखी गई यह कहानी दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच लाने में कामयाब होती अगर इसमें बड़े सितारों को साइन किया जाता.

जबकि मनोकामना की भूमिका निभाने वाली नुसरत भरूचा (Nushrratt Bharuccha), रंजन की भूमिका निभाने वाले अनुद सिंह ढाका और केवल की भूमिका निभाने वाले विजय राज तीनों ही बेहतरीन एक्टर हैं लेकिन वे भीड़ खींचने वाले अदाकारों में से नहीं हैं. मुझे उम्मीद है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म (OTT Platform) पर रिलीज होने पर फिल्म को बेहतर रिस्पॉन्स मिलेगा. क्योंकि यह फिल्म पुरुषों को केवल सेक्सुअल पार्टनर बनने की जगह महिलाओं का पार्टनर बनने का संदेश देती है. यह उन्हें महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ (प्रजनन स्वास्थ्य) के बारे में जानने के लिए प्रोत्साहित करती है और महिलाओं का सहयोगी बनने के लिए उन्हें गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करती है जो दिखाता है कि उन्हें अपनी महिला सहयोगी की चिंता है.

फिल्म का प्लॉट ऐसा है जो आपको सोचने पर मजबूर करता है

फिल्म में यह महत्वपूर्ण संदेश कॉमेडी के जरिए देने की कोशिश की गई है लेकिन फिल्म में मौजूद हास्य इस संदेश को कही कमजोर नहीं पड़ने देता. यह फिल्म एक पब्लिक सर्विस अनाउंसमेंट से कहीं ज्यादा है. इसमें ऐसे पात्र हैं जो आपको उनकी खुशियों में हंसाते हैं और उनके दुखों में आपको शरीक करते हैं. इस फिल्म का प्लॉट ऐसा है जो आपको यह सोचने पर मजबूर करता है कि अब आगे क्या होगा. इसमें ऐसे गाने हैं जो सुनने में अच्छे लगते हैं. और यह फिल्म वही कहती है जो भारत में हम में से कई लोगों को सुनने की जरूरत है – “भारत में हर साल डेढ़ करोड़ से ज्यादा अबॉर्शन (गर्भपात ) होते हैं.”


जनहित में जारी फिल्म में अबॉर्शन की वजह से महिलाओं की हेल्थ और सेफ्टी पर क्या असर पड़ता है बताने की कोशिश की गई है. यह उस पुरानी सोच को खारिज करती है जिसमें पार्टनर्स के बीच विवाह पूर्व यौन संबंध को कलंकित माना जाता है और अनियोजित गर्भधारण की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर थोप दी जाती है. मनोकामना जो एक कंडोम मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में काम करती है, वह विस्तार में बताती है कि पुरुषों द्वारा गर्भनिरोधक का इस्तेमाल न करने की वजह से अनियोजित गर्भधारण के कारण महिलाओं को तत्काल और दीर्घकालिक किन शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक प्रभाव का सामना करना पड़ता है और बाद में पितृसत्तात्मक समाज जो ऐसी महिलाओं को खराब चरित्र की कहने से गुरेज नहीं करता उनकी यह सोच महिलाओं को गर्भपात करवाने के लिए किस तरह दबाव बनाती है.


वह एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं बनना चाहती. वह तो एक नौकरी चाहती है जिससे अपने पैरों पर खड़े होकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सके ताकि आर्थिक सुरक्षा के लिए उसके माता-पिता उस पर शादी के लिए दबाव न बनाएं. वह महिलाओं के यौन और प्रजनन अधिकारों के लिए अपनी आवाज तब उठाती है जब उसके सामने एक ऐसा मामला आता है जिसमें एक असफल गर्भपात की वजह से महिला की मौत हो जाती है. इस मामले के सामने आने के बाद वह महिलाओं को लेकर चिंतित हो जाती है और इसलिए महिलाओं को उनके शरीर के बारे में शिक्षित करने का मिशन बनाती है. उसका तर्क सरल है: पुरुष गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करने की जरूरत को नहीं समझते हैं क्योंकि उन्हें अनियोजित गर्भधारण और असफल गर्भपात का सामना नहीं करना पड़ता है. महिलाएं हाथ पर हाथ रख इस बात का इंतजार करती नहीं बैठी रह सकती कि एक दिन वे इसका महत्व समझेंगे.

जनहित में जारी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण फिल्म है

यहां तक कि रंजन जो अपनी पत्नी मनोकामना से बहुत प्यार करता है और उसके पीरियड्स (मासिक धर्म) की वजह से होने वाले दर्द के लिए गर्म पानी की थैलियां लाता है और उसके पैरों की मालिश करता है उसके लिए भी यह समझना मुश्किल हो जाता है कि मनोकामना इस मुद्दे के बारे में इतना भावुक क्यों महसूस करती है. केवल जब मनोकामना यह खुलासा करती है कि रंजन के भाई की पत्नी को भी दो गर्भपात प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा है तब रंजन को महसूस होता कि पुरुषों का गैर-जिम्मेदार यौन व्यवहार कितना व्यापक है और इसका उदाहरण उसके घर में बहुत मौजूद है.


रंजन एक तरफ अपनी पत्नी और दूसरी तरफ अपने पिता केवल के बीच फंसा हुआ महसूस करता है. दोनों में से किसी को भी दुखी देखना उसके लिए आसान नहीं है लेकिन उसे किसी एक पक्ष का चुनाव करना होगा. और इस चुनाव की प्रक्रिया के जरिए हम एक व्यक्ति के रूप में उसमें आ रहे पॉजिटिव बदलाव को देखते हैं. उसे महसूस होता है कि वह केवल एक बेटा ही नहीं है बल्कि एक पति भी है और उसे उस महिला के लिए खड़े होने की जरूरत है जिससे उसने शादी की है. यह देखना दिल को छू जाता है कि वह अपनी पत्नी की बात सुनकर कैसे सीखता है और खुद में सुधार लाता है. केवल की अपनी अलग सोच है जो रंजन की तुलना में ज्यादा गहरी है जिसे बदलना आसान नहीं है. लेकिन जब केवल की बेटी बच्चे के जन्म के दौरान मरने वाली होती है तब वह यह समझ पाता है कि जो दंपत्ति बच्चे पैदा करने का प्लान नहीं कर रहे उनके लिए गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करना कितना जरूरी है. पॉलिटिशियन केवल अपनी बहू मनोकामना को उस सम्मान से वंचित करने के लिए माफी मांगता है जिसकी वह हकदार है.


फिल्म जहां मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर चंदेरी पर आधारित है वहीं शहरी इलाकों में भी कंडोम के प्रति लोगों की अरुचि दिखाई देती है. इसे #MeToo मूवमेंट के दौरान महिलाओं द्वारा उजागर किया गया था – स्टीलथिंग एक ऐसी प्रैक्टिस जिसमें पुरुष महिला की सहमति के बिना संभोग के दौरान अपना कंडोम उतार देता है. कुछ देशों में इसे रेप माना जाता है. तो संक्षेप में जनहित में जारी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण फिल्म है क्योंकि इसका उद्देश्य न केवल महिलाओं के लिए बल्कि सभी के लिए इस गंभीर विषय पर संवाद को बढ़ावा देना है. यह फिल्म अभी सिनेमाघरों में जारी चल रही है. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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