गुजरात में कांग्रेस कैसे हुई सत्ता से बाहर, क्या है BJP का लगातार सरकार में बने रहने का अचूक फॉर्मूला

Gujraat Election 2022

गुजरात में विधानसभा चुनाव (Gujarat Assembly Election) इस साल के आखिर में होने हैं. वैसे तो गुजरात में भाजपा और कांग्रेस दो ही दल सत्ता में रहे हैं, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी भी चुनाव मैदान में उतर चुकी है. कांग्रेस ने गुजरात पर लंबे समय तक राज किया है, लेकिन अब पार्टी पिछले 27 सालो से सत्ता से बाहर है, जबकि राज्य का गठन 1 मई 1960 को हुआ. जिसके बाद से आपातकाल के दौर को छोड़कर 1990 तक राज्य पर कांग्रेस ने शासन किया. 1962 से अब तक कुल 13 विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिसमें अब तक 7 बार कांग्रेस की सरकार रही है.

1995 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात में जीत का स्वाद चखा और भाजपा की तरफ से केशु भाई पटेल पहले मुख्यमंत्री बने. उन दिनों केशुभाई पटेल ने यह नारा दिया था कि ”आप वोट देने जाओ तो लतीफ को मत भूलना” यह नारा खूब चर्चाओं में रहा. उन दिनों माफिया डॉन अब्दुल लतीफ का गुजरात मे खौफ था. वहीं बीजेपी ने वादा किया था कि वह सत्ता में आते ही गुजरात को माफिया राज से मुक्ति दिलाएंगे. भाजपा को गुजरात की सत्ता में बने रहने का फॉर्मूला मिल चूका है तो वहीं कांग्रेस सत्ता का वनवास खत्म करने के लिए प्रयासरत है.

गुजरात में कैसे स्थापित हुई बीजेपी

गुजरात में बीजेपी पहली बार अपने दम पर 1995 में सत्ता में आई. हालांकि इससे पहले जनता दल के साथ 1990 में सत्ता में आ चुकी थी. बीजेपी को सत्ता में बने रहने का फॉर्मूला अब मिल चुका है. 1995 से पहले कांग्रेस के दिग्गज नेता माधव सिंह सोलंकी ”खाम थ्योरी” के बल पर 1985 में गुजरात का अब तक का सबसे बड़ा बहुमत हासिल कर चुके थे, तब लगता था कि अब राज्य में कांग्रेस को हराना मुश्किल है. ऐसे में बीजेपी को भी तलाश थी कि गुजरात में सत्ता पाने के फॉर्मूले की. ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने तय किया कि राज्य की सबसे ताकतवर जाति का भरोसा जीतना होगा. इसलिए बीजेपी ने केशुभाई पटेल को आगे किया.

उन दिनों चिमन भाई पटेल जनता दल के बड़े नेता थे. वहीं केशुभाई पटेल पाटीदारों के दूसरे बड़े नेता थे. भाजपा को यह समझ में आ चुका था कि दलित, मुस्लिम और क्षत्रिय मतदाता कांग्रेस के साथ हैं. ऐसे में पाटीदार समुदाय को साथ लेकर चुनाव जीता जा सकता है. भाजपा का यह प्रयोग सफल हुआ और 1990 में पहली बार कांग्रेस की हार हुई. जनता दल और भाजपा की मिली जुली सरकार बनी. भाजपा को पटेल समुदाय ने अपना खुलकर समर्थन दिया. इसका पूरा फायदा 1995 में भाजपा को मिला.

विधानसभा चुनाव में भाजपा को 182 में से 121 सीटें पर जीत मिली. यह भाजपा की गुजरात में पहली जीत थी और इसके नायक बने केशुभाई पटेल. हालांकि वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. बीच में कुछ समय के लिए शंकर सिंह वाघेला ने बीजेपी से अलग होकर सरकार जरूर बनाई. इसके बाद बीजेपी को गुजरात की सत्ता में बने रहने का ऐसा फॉर्मूला मिल चुका था, जिसके दम पर भाजपा पिछले 27 सालों से सत्ता में बनी हुई है.

गुजरात में कांग्रेस को कैसे मिला वनवास

गुजरात के गठन के बाद पहली बार 1962 में चुनाव हुए. गुजरात में जीव नारायण मेहता पहले मुख्यमंत्री बने. इसके बाद बलवंत राय मेहता दूसरे मुख्यमंत्री बने. कुल मिलाकर कहा जाए तो 1960 से लेकर 1975 तक गुजरात पर कांग्रेस का ही एकछत्र राज रहा. आपातकाल के दौरान गुजरात ही नहीं देश में कई जगहों पर चुनी हुई कांग्रेस सरकार को जनता ने नकार दिया और हर जगह जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई. इसी दौरान माधव सिंह सोलंकी जैसे दिग्गज नेता की कांग्रेस में एंट्री हो चुकी थी. उन्होंने गुजरात की राजनीति में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को लेकर एक नया आंदोलन छेड़ दिया. उन्होंने इस वर्ग को आरक्षण दिया. उन्होंने ”खाम थ्योरी” भी बनाई जिसमें क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमानों को लेकर कांग्रेस ने 1985 में 182 में से 149 सीटें जीत ली. हालांकि इस जीत के नायक रहे माधव सिंह सोलंकी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके.

माधवसिंह सोलंकी की ”खाम थ्योरी” से कांग्रेस को गुजरात में और भी ज्यादा मजबूती मिल चुकी थी, लेकिन 1990 आते-आते कांग्रेस गुजरात की जनता के दिलों से उतर चुकी थी. ऐसा नहीं है कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिए कोशिश नहीं की, लेकिन 1990 से 2017 तक उन्हें सफलता नहीं मिली. अब तो गुजरात में पाटीदार समुदाय के युवा नेता हार्दिक पटेल भी पार्टी छोड़कर बीजेपी में जा चुके है. हार्दिक के जाने से गुजरात में कांग्रेस को झटका लगा है, जिसकी भरपाई करना आसान नहीं है.

Similar Posts