क्या होता है व्हिप… जब भी सांसदों या विधायकों के एक होने की बात होती है, ये चर्चा में आता है

Whip Political Parties

महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक गतिरोध (Maharashtra Political Crisis) के बीच व्हिप को लेकर काफी चर्चा हो रही है. हाल ही व्हिप की चर्चा (What is Whip) इसलिए भी हुई थी, क्योंकि एकनाथ शिंदे ने विधायक भरत गोगावाले को पार्टी विधानमंडल का नया प्रतिनिधि नियुक्त किया. इससे पहले शिवसेना के चीफ व्हिप सुनील प्रभू ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें पार्टी के सभी विधायकों को आज यानी बुधवार शाम होने वाली मीटिंग में आने के लिए कहा गया था. इस पत्र के मुताबिक अगर कोई विधायक मीटिंग में नहीं पहुंचता तो ये माना जाता कि उसने पार्टी छोड़ दी है.

इसके साथ ही हाल ही में जब राष्ट्रपति चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ था तो चुनाव आयोग ने पार्टियों की ओर से व्हिप जारी करने पर रोक लगा दी थी. इसके बाद से कोई भी पार्टी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर व्हिप जारी नहीं कर सकती है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर व्हिप क्या होता है और जब व्हिप जारी हो जाता है तो राजनीतिक पार्टियों के सदस्यों को किन शर्तों को पूरा करना होता है. तो जानते हैं व्हिप और इससे होने वाले असर से जुड़ी खास बातें…

व्हिप क्या होता है?

वैसे तो व्हिप किसी भी राजनीतिक दल का एक अधिकारी होता है, जिसका काम विधायिका में पार्टी अनुशासन सुनिश्चित करना होता है. इसे सचेतक भी कहा जाता है. इसका मतलब है कि संगठन के इस व्यक्ति को यह सुनिश्चित करना है कि पार्टी के सदस्य अपनी व्यक्तिगत विचारधारा या अपनी इच्छा की बजाय पार्टी द्वारा तय किए नियमों या फैसलों को फॉलो करें. जैसे कई बार फ्लोर टेस्ट होता है तो पार्टी व्हिप के जरिए अपने सभी सदस्यों को एक करती है और उन्हें विधायिका में उपस्थित होने का आदेश देती है.

वैसे आम तौर जब कोई भी पार्टी अपने सदस्यों को एक मैंडेट जारी करती हैं, उसको पार्टी के सदस्यों को मानना होता है और ऐसा हर पार्टी को करना होता है. इसे व्हिप कहा जाता है, जो पार्टी के एक आदेश की तरह है. व्हिप का पालन ना करने पर या फिर पार्टी का आदेश ना मानने पर पार्टी अपने संविधान के हिसाब से उस व्यक्ति पर कार्रवाई कर सकती है. अब बात आती है तो कोई सदस्य उल्लंघन कर दे तो क्या होगा. व्हिप के उल्लंघन पर पार्टी स्तर पर कार्रवाई तो हो सकती है, पर दल-बदल कानून उल्लंघन की कार्रवाई नहीं हो सकती है. व्हिप उल्लंघन करने पर पार्टी से निकालने या अगली बार टिकट न देने का फैसला लिया जा सकता है. ऐसे में सांसद या विधायक विधायिका का सदस्य बना रहेगा.

किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की है अलग व्यवस्था?

कई बार आपने देखा होगा कि राज्यसभा चुनाव आदि के वक्त भी पार्टी की ओर से व्हिप जारी किया जाता है. हालांकि, इलेक्शन कंडक्ट रूल्स 1961 का सेक्शन 39 ए(ए) के अनुसार, इन चुनावों में व्हिप पूरी तरह लागू नहीं होता. वह विधानसभा सत्र के अंदर लागू होता है, मगर इसमें वोट के लिए किसी को भी बाध्य नहीं किया जा सकता है.

कई तरह के होते हैं व्हिप

व्हिप भी कई तरह के होते हैं. जैसे वन लाइन व्हिप में सदस्यों को वोट के लिए जानकारी दी जाती है. इस स्थिति में पार्टी सदस्य अपने हिसाब से फैसला ले सकते हैं. वहीं एक व्हिप होता है, जिसे टू लाइन व्हिप कहा जाता है. टू-लाइन व्हिप में सदस्यों को निर्देश दिया जाता है कि वो वोटिंग के वक्त सदन में मौजूद रहें और इसमें वोटिंग के लिए खास निर्देश जारी किए जाते हैं. थ्री लाइन व्हिप में सदस्यों का कहा जाता है कि वो पार्टी लाइन के हिसाब से ही वोट दें. ये सबसे सख्स व्हिप माना जाता है.

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