क्या विपक्षी दलों को एकजुट कर पाएंगी ममता बनर्जी, पहले भी कई गठबंधन दे चुके हैं सत्तारुढ़ दल को मात

Mamata Banerjee Pti

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM narendra modi) और भारतीय जनता पार्टी का सामना करने के लिए लंबे समय से विपक्षी दल एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं, कई बार शुरुआती कामयाबी मिली तो कई बार बात बनते-बनते बिगड़ गई. अब 2 साल बाद 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव (Lok sabha election) के लिए विपक्षी दल फिर से सक्रिय हो गए हैं. इसी योजना के तहत अब गैर-बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के जल्द ही मुंबई में मिलने की संभावना है. ममता बनर्जी (mamata banerjee) समेत कुछ नेता इस एकजुटता के लिए बेहद सक्रिय हैं.

भगवा पार्टी को चुनौती देने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गैर-बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है. ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में लगातार लगे हुए हैं. 2019 के चुनाव से पहले भी इस तरह की कोशिश हुई थी. अब देखना होगा कि इन दोनों नेताओं की कोशिश कितनी कामयाब होती है ये तो वक्त बताएगा, हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा कि केंद्र में ताकतवर सरकार के खिलाफ चुनाव में मुकाबले करने को लेकर पहली बीर इस तरह की कोशिश की जा रही है.

कोशिशों में जुटे ममता बनर्जी और चंद्रशेखर राव

वर्तमान दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देना किसी अकेली पार्टी के लिए आसान नहीं हैं. ऐसे में विपक्षी दल एकजुट होकर उन्हें चुनौती देने की राह पर चल रहे हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की ओर से इस तरह की कोशिशें लगातार जारी हैं. पिछले कुछ समय से चंद्रशेखर राव की ओर से प्रधानमंत्री मोदी पर हमले तेज कर दिए गए हैं. साथ ही तेलंगाना के बाहर भी उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर प्रचार करना शुरू कर दिया है. पिछले महीने 10 मार्च को पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के दौरान चंद्रशेखर ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी.

दूसरी ओर टीएमसी नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार अपनी पार्टी का दायरा बढ़ाने में लगी हुई हैं. अपने गढ़ पश्चिम बंगाल के बाहर खासतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में कई बड़े कांग्रेस नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करा चुकी हैं. अन्य राज्यों में पार्टी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश के इतर ममता बनर्जी विपक्ष को भी एकजुट करने की कवायद में लगी हुई हैं. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव के लिए वोट मांगने जाना या फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन से मिलना, ऐसे कुछ बड़े उदाहरण हैं जिसमें वह विपक्ष को साथ लाने की कोशिश में हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी इस तरह की कोशिश हुई थी. 2014 में बंपर जीत के बाद जब नरेंद्र मोदी ने देश की सत्ता संभाली तो उसके बाद उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई और कई राज्यों में बड़ी जीत हासिल की. 5 साल बाद 2019 के चुनाव से पहले भी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशें की गई थीं. चुनाव से पहले ममता बनर्जी के प्रयास के बाद विपक्षी दलों के कई नेता कोलकाता में एकत्र हुए थे. विपक्षी दलों के कई बड़े चेहरे एक साथ मंच पर नजर आए. अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक मंच पर दिखाई दिए थे.

आम चुनाव से पहले तेलंगाना विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत से उत्साहित मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी इस तरह की कोशिशों में जुटे थे. हालांकि, चुनाव को लेकर कोई विपक्षी मंच तैयार नहीं हो सका था. पिछली बार की नाकामियों के बीच ममता और राव फिर से कोशिशों में जुट गए हैं.

1977 में विपक्षी एकजुटता का पहला प्रयास जो कामयाब रहा

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी और इसको लेकर लोगों में खासा रोष था और बड़ी संख्या में विपक्षी नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया. करीब डेढ़ साल बाद इंदिरा ने जनवरी 1977 में चुनाव कराने की बात कही. इस ऐलान के बाद राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया. फिर 23 जनवरी 1977 को जनसंघ के अलावा भारतीय लोकदल, स्वतंत्र पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी जैसी कई विपक्षी पार्टियों का विलय करके जनता पार्टी के नाम से एक नई पार्टी का गठन किया गया. 1977 में हुए लोकसभा चुनाव जनता पार्टी को बड़ी जीत मिली. ताकतवर नेता के रूप में इंदिरा गांधी को हार मिली.

हालांकि सत्ताधारी दल के खिलाफ बना यह गठबंधन ज्यादा समय तक साथ नहीं चल सका और अंदरुनी कलह के चलते तीन साल में ही जनता पार्टी की सरकार गिर गई. पार्टी में टूट पड़ गई और भारतीय जनता पार्टी समेत कई अन्य पार्टियां वजूद में आईं.

1989 में राजीव गांधी के खिलाफ विरोधी गठबंधन, मिली जीत

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी जीत मिली. लेकिन साल 1989 में एक बार फिर सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ विपक्ष एकजुट हुआ. विपक्षी दलों को एक साथ लाने की कोशिश की विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) ने. कभी राजीव गांधी के करीबी माने जाने वाले वीपी सिंह ने उन्हीं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. 1988 में वीपी सिंह ने जनता पार्टी से अलग हुईं लोकदल, जन मोर्चा और कांग्रेस (जगजीवन) जैसी कई पार्टियों को जोड़कर जनता दल के नाम से एक नया दल बनाया.

लोकसभा चुनाव में जनता दल ने तत्कालीन आंध्र प्रदेश की तेलगू देशम पार्टी, तमिलनाडु के डीएमके और असम की असम गढ़ परिषद जैसे क्षेत्रीय दलों को अपने साथ लिया तो भारतीय जनता पार्टी के साथ ही वामपंथी लेफ्ट पार्टियां भी इस गठबंधन से जुड़ गईं. वीपी सिंह की अगुवाई में नेशनल फ्रंट राजीव गांधी और कांग्रेस को हराने में कामयाब रहा. हालांकि यह गठबंधन भी सत्ता में तो आ गया, लेकिन लंबे समय तक बना नहीं रह सका और भारतीय जनता पार्टी के समर्थन वापस लेने से वीपी सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई और सरकार का पतन हो गया.

वीपी सिंह की सरकार के गिरने के बाद जनता दल में विभाजन हो गया और चंद्रशेखर की अगुवाई में एक गुट ने कांग्रेस के बाहर से दिए गए समर्थन से केंद्र में सरकार बना ली. हालांकि, ये सरकार भी ज्यादा नहीं टिकी और चंद्रशेखर की सरकार भी गिर गई.

अब तक लोकसभा चुनाव से पहले 2 बार (1977 और 1989) विपक्षी दलों ने गठबंधन किया और सत्तारुढ़ पार्टी को सत्ता से दूर कर दिया. 1996 का गठबंधन पिछली दो बार के मुकाबले में थोड़ा अलग रहा. 1996 के आम चुनाव में किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला. चुनाव बाद जनता दल, वाम दलों और कई क्षेत्रीय दलों ने मिलकर एक मोर्चा बनाया. 13 दलों के इस मोर्चा को संयुक्त मोर्चा नाम दिया गया. गठबंधन के साथ ही संयुक्त मोर्चा सत्ता में आ गया. कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन से केंद्र में सरकार बनी. हालांकि महज दो साल के अंदर ही दो प्रधानमंत्री बनाने पड़े. पहले एचडी देवगौड़ा पीएम बने फिर इंद्र कुमार गुजराल. दोनों ही अपना कार्यकाल सालभर से ज्यादा नहीं चला पाए.

1990 का दशक देश में राजनीतिक अस्थिरता के लिए जाना जाता है. इस दशक में गठबंधन की कई सरकारें बनीं और कोई भी सरकार लंबे समय तक चल नहीं सकी. जल्दी-जल्दी गठबंधन टूटता रहा. संयुक्त मोर्चा के सत्ता से बाहर होने के बाद 1998 में आम चुनाव कराए गए. 1998 में भारतीय जनता पार्टी ने 20 से अधिक छोटे दलों के साथ मिलकर एनडीए सरकार बनाई. फिर 1999 में भी बीजेपी की अगुवाई में एनडीए सरकार बनी. इसके बाद 2004 और 2009 में जब यूपीए सत्ता में आई तब भी कई दलों का गठबंधन था. हालांकि, सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी. तीन दशक बाद 2014 में किसी पार्टी (बीजेपी) को अकेले दम पर बहुमत हासिल हुई थी. भाजपा ने 2014 में अकेले 282 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए बहुमत हासिल कर लिया, लेकिन सरकार एनडीए के तहत ही बनी. बीजेपी कई दलों के गठबंधन एनडीए की अगुवा पार्टी है और अभी वह सत्ता में है.

Similar Posts