कैसे अलग है यूक्रेन युद्ध का दूसरा दौर, क्या दोनबास से इतनी दूर तफरीह करने आई है रूसी सेना

Ukraine Attacks Russia By Neptune Missile

रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia – Ukraine War) का दूसरा दौर शुरू हो चुका है। रूसी विदेशमंत्री सर्जेइ लावरोव और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की (Volodymyr Zelenskyy), दोनों ने 18 अप्रैल, दिन सोमवार को इस आशय के बयान जारी किए. यह दूसरा दौर क्या है और किस मायने में यह लड़ाई के पहले दौर से अलग है? रूसियों का कहना है कि यही उनकी असली लड़ाई है और इसी के लिए उन्होंने यूक्रेन में अपना स्पेशल ऑपरेशन शुरू किया था. बाकायदा कानून बनाकर यूक्रेन में रूसी भाषा (RUSSIAN Language IN UKRAINE) को सरकारी दायरे से बाहर किया गया है। रूसीभाषी आबादी की बहुलता वाले दो यूक्रेनी प्रांतों दोनेत्स्क और लुहांस्क में बीते आठ वर्षों से केंद्रीय सत्ता के खिलाफ बगावत चल रही है. रूसी मीडिया की मानें तो इन दोनों प्रांतों में यूक्रेन की केंद्रीय सत्ता की दमनकारी गतिविधियों का स्तर वैसा ही रहा है, जैसा नाजी जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ देखा गया था. रूसियों का कहना है कि उनका मकसद यहां की सताई हुई आबादी को आजादी दिलाने का है.

लगभग दो महीने से चल रहे इस युद्ध में पहली बार पूर्वी यूक्रेन में लगभग पांच सौ किलोमीटर लंबे एक मोर्चे पर टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों के साथ आमने-सामने की लड़ाई देखने को मिल रही है. मारियूपोल में यूक्रेनियों का सांकेतिक प्रतिरोध अभी बचा हुआ है. रूसी फौज की कई बटालियनें कुछ हद तक इसमें उलझी हुई हैं. इससे यूक्रेन के लिए एक मौका बचा हुआ है कि वह पश्चिमी और मध्य यूक्रेन में मौजूद अपनी कुछ फौजों को पोलैंड और काला सागर से पहुंचने वाली बाहरी मदद के साथ दोनबास के लिए रवाना कर सके. बता दें कि दोनबास शब्द का इस्तेमाल अभी दोनों बागी प्रांतों को मिलाकर किया जा रहा है, हालांकि पारंपरिक रूप से इसे दोनेत्स नदी का बेसिन के संक्षिप्त रूप की तरह लिया जाता रहा है, जिसमें इन दोनों प्रांतों के अलावा भी कुछ इलाके आते हैं. उत्तर में यूक्रेन की पुरानी राजधानी खारकीव और दक्षिण में बंदरगाह शहर मारियूपोल पिछले आठ वर्षों में दोनबास इलाके पर काबू रखने के मुख्य ठिकाने बने रहे और यही बात पिछले दो महीनों में उनकी बर्बादी की वजह बनी.

2014 में ही शुरू हो गई थी रूस-यूक्रेन की लड़ाई

सवाल यह है कि फिर साठ किलोमीटर लंबा टैंकों का काफिला लेकर रूसी फौजें बैलोरूस के रास्ते यूक्रेन की राजधानी कीव के इर्दगिर्द इतने दिनों तक डेरा क्यों डाले हुई थीं? दोनबास से इतनी दूर वे तफरीह के लिए तो नहीं गई थीं. वहां से उनके हटने को यूक्रेन की सत्ता और उसके बाहरी समर्थकों ने आधी लड़ाई जीत लेने की तरह पेश किया था. उनपर लगे जनसंहार के आरोपों ने रूसी छवि को बहुत नुकसान भी पहुंचाया. लेकिन रणनीति के नजरिये से देखें तो रूसियों की ओर से कीव की महीना भर लंबी घेरेबंदी की कुछ और ही वजह समझ में आती है.

यूक्रेन से रूस की लड़ाई 24 फरवरी 2022 को नहीं शुरू हुई है. इसकी शुरुआत सन 2014 की फरवरी में हो गई थी, जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्तोर यानिकोविच को यूरोमैदान बगावत के जरिये सत्ता से हटाए जाने के साथ ही रूसी फौजें क्रीमिया प्रायद्वीप में दाखिल हुई थीं और 24 लाख से ज्यादा आबादी वाले रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस इलाके को रूसी हुकूमत ने 18 मार्च 2014 को अपना अभिन्न अंग घोषित कर दिया था. दोनबास की बगावत इसके थोड़े ही समय बाद शुरू हुई. उस समय से ही, यानी अब से पूरे आठ साल पहले से यूक्रेन ने अपनी तीन चौथाई या इससे भी ज्यादा सैन्य शक्ति अपनी दक्षिणी और पूर्वी सीमा पर लगा रखी है.

सैन्य शक्ति के मामले में दोनों देशों के बीच कोई बड़ा फर्क नहीं

कहने को रूस यूक्रेन की तुलना में बहुत बड़ा देश है, लेकिन दोनों का आर्थिक और सैन्य स्तर कमोबेश एक जैसा है उनके हथियार ही नहीं, उन्हें बनाने और चलाने वाले भी एक ही कार्यसंस्कृति से उपजे हैं. एटमी पावर को एक तरफ रख दें तो पारंपरिक सैन्य शक्ति के मामले में दोनों देशों के बीच कोई बहुत बड़ा फर्क भी नहीं है. मोटे तौर पर कहें तो यह उस तरह की लड़ाई बिल्कुल नहीं है, जैसी हम पिछले तीस वर्षों में अमेरिका के सामने कभी इराक तो कभी अफगानिस्तान को रखकर देखते आ रहे हैं. रूसी जनरलों को पता था कि अगर वे सीधे दोनबास की लड़ाई लड़ने उतरेंगे तो बुरी तरह फंस जाएंगे. खासकर फरवरी से अप्रैल के महीनों में, जब यहां की दगाबाज बर्फ में उनके टैंक सड़क छोड़कर बिल्कुल भी आगे नहीं बढ़ सकते थे. ऐसे में उन्होंने कीव पर घेरा डालकर यूक्रेनी फौजों का एक हिस्सा दक्षिण-पूर्व से उत्तर-मध्य की ओर खींच लिया और उसकी जमी-जमाई मोर्चेबंदी बिगाड़ दी.

रूसी फौजों की रफ्तार को कृत्रिम दलदलों रोकने की रणनीति

वोलोदिमीर जेलेंस्की कह चुके हैं कि उनके 44 हजार सर्वश्रेष्ठ फौजी दोनबास में जमे हुए हैं और रूसी फौजों को वे कड़ी टक्कर देने वाले हैं। इनके स्थानीय कमांडरों से बातचीत के जो ब्यौरे बाहर आ रहे हैं, उनके मुताबिक दोनबास में यूक्रेनी रणनीति रूसी फौजों के बढ़ाव की रफ्तार को कृत्रिम दलदलों के जरिये नियंत्रित करने की है. बर्फ गलने से अचानक भर जाने वाली इस इलाके की छोटी-छोटी नदियों में पानी का स्तर अप्रैल के महीने में 25 फुट तक ऊपर चढ़ जाता है. इस पानी को नियंत्रित रखने के लिए आठ बड़े जलाशय इस इलाके में बने हुए हैं. लेकिन यूक्रेनी फौजों की पहल पर इन जलाशयों के फाटक खोल दिए गए हैं और नदियों पर बने हुए सारे पुल उड़ा दिए गए हैं.

ऐसे में रूसी फौजों के लिए अचानक आगे बढ़ जाने की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं. पूरा किस्सा घेरेबंदी का ही बचा है. कौन, कहां, किसको घेर ले. कीव के इर्दगिर्द यूक्रेनियों ने रूसियों को कई बिंदुओं पर बुरी तरह फंसाया. वे उनके टैंकों को बहकाकर घनी आबादी के बीच ले गए और वहां चारो तरफ से स्टिंगर मिसाइलें मार-मारकर दियासलाई की डिब्बियों की तरह उन्हें फूंक डाला. यह काम वे दोनबास में भी कर सकते हैं. लेकिन यहां बुनियादी फर्क यह है कि आठ साल से लड़ रहे रूसीभाषी विद्रोही दोनबास में यूक्रेनी पलटनों को बड़ी तकलीफ पहुंचाएंगे.

दोनबास में रूसियों की बसावट की बड़ी वजह खदानें

कुछ बातें यूक्रेन की भीतरी राजनीति और उसके आर्थिक भूगोल पर भी कर ली जानी चाहिए, जिनका महत्व लड़ाई के इस दूसरे दौर में बहुत बढ़ गया है. दोनबास पर चर्चा तेज होने के कारण दोनेत्स नदी पर काफी बातचीत होने लगी है, लेकिन यह यूक्रेन की एक छोटी नदी ही है. यह रूस से निकलती है और यूक्रेन पार करके वापस रूस में ही विशाल दोन नदी में मिल जाती है, जिसका मुहाना अजोव सागर में है. 100 मीटर से ज्यादा चौड़ा इसका पाट जहां-तहां ही देखने को मिलता है. कहीं-कहीं यह सिर्फ 40 मीटर चौड़ी धारा के रूप में बहती है. लेकिन इसका बेसिन खनिजों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. यूक्रेन की सबसे पुरानी और बड़ी कोयला खजानें यहीं हैं. इस्पात सबसे ज्यादा दोनबास क्षेत्र में ही बनता है और दवाओं से लेकर रासायनिक उद्योगों तक का गढ़ भी इसी इलाके को माना जाता है. पिछले डेढ़ सौ वर्षों से दोनबास में रूसियों की बसावट की बड़ी वजह यहां की खदानें ही रही हैं.

लेकिन यूक्रेन की पहचान जिस नदी से जुड़ी हुई मानी जाती रही है, वह द्नीप्रो है, जो यूक्रेन को पूर्वी और पश्चिमी, दो हिस्सों में बांटती है. समूचे यूरोप की पांचवीं सबसे बड़ी और चौड़ी नदी के रूप में प्रतिष्ठित द्नीप्रो के दोनों किनारों पर अलग-अलग सांस्कृतिक और राजनीतिक रुझान देखे जाते रहे हैं. एक अर्से तक इसके पश्चिम तरफ वाला यूक्रेन पोलैंड और लिथुआनिया की साझा सैन्य शक्ति के अधीन रहा और आज भी उधर का मुख्य राजनीतिक रुझान यूरोपियन यूनियन और नाटो का हिस्सा बनने का है. जबकि द्नीप्रो के पूरब वाला हिस्सा रूसी संस्कृति और राजनीति के प्रभाव में रहा है और पश्चिम को लेकर उसमें संदेह का भाव देखा जाता रहा है.

यानिकोविच और यूक्रेन की एकता-अखंडता

फरवरी 2014 तक यूक्रेन की राजनीति पर काबिज विक्तोर यानिकोविच की ख्याति एक पुरबिया मिजाज के नेता की थी, हालांकि उनके खिलाफ आरोपों की लंबी सूची उनके विरोधियों के पास थी. पश्चिमी अखबारों ने उन्हें 1991 से पहले वाले सोवियत संघ के जमाने के नेताओं में से एक की तरह पेश किया. रूस के तलवे चाटने वाला, पुतिन का चमचा, तानाशाही समर्थक भ्रष्ट नेता. जबतक यानिकोविच सत्ता में थे, यूक्रेन की एकता-अखंडता पर कहीं कोई सवाल नहीं था. लेकिन जब नाटो और यूरोपियन यूनियन से दूरी बनाने के उनके फैसले को लेकर कीव में जमा हुई एक बहुत बड़ी भीड़ ने उन्हें सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर किया तो पासा पलट गया और हालात यहां तक चले आए.

व्लादिमीर पुतिन की कोशिश अभी यूक्रेन के इस पारंपरिक टकराव का फायदा उठाने की भी है, हालांकि 26 फरवरी 2022 से लेकर आज तक द्नीप्रो और दोनेत्स, दोनों ही नदियों में काफी पानी और बहुत सारा खून भी बह चुका है. जिस हद तक बर्बादी यूक्रेन के शहरों की हो चुकी है, उसे देखते हुए एक औसत यूक्रेनी यह तो जरूर चाहता होगा कि यह लड़ाई जल्दी खत्म हो. लेकिन इससे रूस के प्रति किसी तरह का लगाव वह अपने भीतर नहीं महसूस करेगा, भले ही संस्कृत और राजनीति की दृष्टि से उसका ठेठ पुरबिया रुझान ही क्यों न रहा हो. यह भी स्पष्ट है कि रूस की कोशिश अब सिर्फ दोनबास लेने की नहीं रहेगी. क्रीमिया पहले से ही उसके हाथ में है, तो समूचा दक्षिणी और पूर्वी यूक्रेन अपने नक्शे में मिलाने का प्रयास उसकी तरफ से देखने को मिलेगा. जाहिर है, लड़ाई रूस के पक्ष में खत्म हो जाए तो भी यह यूरोप में एक चिर-स्थायी स्थिरता की बारूदी सुरंग बिछाने जैसा होगा.

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