काम की खबर: चुराने पर ही नहीं, चोरी का मोबाइल इस्तेमाल करते पकड़े जाने पर भी लगाने होंगे थाने और कोर्ट के चक्कर

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ऐसा नहीं है कि कोई शख्स मोबाइल चोरी-झपटमारी (Mobile Snatching) करता हुआ पकड़े जाने पर ही जेल जाएगा. अगर चोरी या झपटमारी का मोबाइल आप इस्तेमाल करते हुए भी पाए जाएंगे तो भी, आपको थाने-चौकी कोर्ट कचहरी के धक्के खाने होंगे. असल चोर या मोबाइल झपटमार (Mobile Theft in Delhi) मिले या न मिले. इससे पुलिस और कानून के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. फर्क सिर्फ और सिर्फ चोरी का मोबाइल इस्तेमाल करते हुए पकड़े गए इंसान पर ही पड़ेगा. भले ही चाहे यह काम आप गलती या अनजाने में क्यों न शुरू कर दें. माफी की कहीं कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी गई है. भले ही क्यों न सही असली दोषी तो वही हो जिसने मोबाइल चोरी या झपटमारी करके आपको बेचा था. ऐसा ही एक मामला फिलहाल हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली (Delhi Police)और बिहार के मुंगेर जिले से जुड़ा हुआ सामने आया है.

इस मुकदमे में दिल्ली रेलवे पुलिस को मोबाइल झपटने वाला असली छपटमार तो नहीं मिला. बिहार का रहने वाला एक युवक झपटमारी का मोबाइल इस्तेमाल करता हुआ जरूर हाथ लग गया. दिल्ली पुलिस ने उसे ही दबोचकर कानूनी शिकंजे में कसकर झपटा गया मोबाइल जब्त कर लिया है. बुधवार को टीवी9 भारतवर्ष से बातचीत में आमजन को सावधान करते इस हैरतंगेज मामले की पुष्टि, खुद दिल्ली पुलिस डीसीपी रेलवे जितेंद्र मणी ने की. डीसीपी दिल्ली रेलवे पुलिस के मुताबिक, “आरोपी का नाम सोनू कुमार है. जोकि मूल रूप से मुंगेर (बिहार) का रहने वाला है. 12वीं पास सोनू इन दिनों बेरोजगार है. वह जीवनयापन के लिए नौकरी की तलाश में लगा हुआ था.” इसी बीच जाने-अनजाने चोरी-झपटमारी का मोबाइल खरीदकर उसे इस्तेमाल करने के आरोप में उसे पकड़ लिया गया.

दिल्ली पुलिस की इस टीम ने खोला मामला

मतलब एक अदद छोटी सी अनजान भूल ने एक युवा को घर बैठे बिठाए ही थाने-चौकी कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसवा डाला. घटना की जानकारी देते हुए डीसीपी दिल्ली रेलवे पुलिस जितेंद्र मणी ने आगे कहा, “इस साल के शुरूआत में 6 जनवरी 2022 को दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को एक सूचना मिली थी. जिसमें 24 साल की शिकायतकर्ता लड़की ने बताया था कि वह दिल्ली के नांगलोई इलाके में रहती है. शिकायतकर्ता ने आगे बताया था कि वह गोरखधाम एक्सप्रेस ट्रेन से नई दिल्ली स्टेशन से सफर के लिए रवाना हुई थी. उसी वक्त अनजान शख्स उसके हाथ से मोबाइल झपटकर भाग गया. पुलिस ने पुलिस कंट्रोल रूम को मिली उसी सूचना पर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया था. मामले की जांच के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन थाने में तैनात सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) याद राम को दी गई थी.”

दिल्ली रेलवे पुलिस ने महीनों इंतजार किया

घटना के वक्त या फिर उसके बाद भी मोबाइल के बारे में कोई जानकारी हासिल नहीं हो सकी थी. पुलिस ने मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया था. ताकि जैसे ही मोबाइल पर बातचीत शुरू हो, पुलिस उसे इस्तेमाल करने वाले तक पहुंच सके. इसके बाद भी मगर एएसाई याद राम और उनके साथ टीम में शामिल हवलदार मनोज व सिपाही विक्रम को मोबाइल चालू होने का लगातार तीन चार महीने तक इंतजार करते रहे. जैसे ही मोबाइल चालू हुआ वैसे ही टीम में शामिल हवलदार मनोज को बिहार के मुंगेर में भेज दिया गया. वहां दिल्ली पुलिस ने झपटमारी के मोबाइल सहित सोनू को धर-दबोचा. सोनू ने बताया कि उसने मोबाइल किसी से खरीदा था. दिल्ली पुलिस अब उस शख्स की तलाश में है जिससे सोनू ने मोबाइल खरीदा था. डीसीपी जितेंद्र मणि के मुताबिक सोनू को गिरफ्तार तो नहीं किया गया है. मगर उसे कानूनी तौर पर बंधक बनाया गया है.

क्या होता है ‘बंधक’ यानी “बांडडाउन”?

यहां पाठकों को बताना जरूरी है कि दरअसल कानून या पुलिसिया भाषा-शैली में यह ‘बंधक’ क्या है? ‘बंधक’ वह कानूनी प्रक्रिया है जो पुलिस अमल में लाती है. इस प्रक्रिया के तहत गैर-कानूनी रूप से चोरी-झपटमारी की चीज इस्तेमाल करते हुए पुलिस द्वारा पकड़े गए शख्स के खिलाफ कानूनी कदम उठाया जाता है. इस बावत काफी समय पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अर्नेस कुमार वर्सेज स्टेट ऑफ बिहार के मामले में एक दिशा निर्देश जारी किया था. जिसके मुताबिक जाने-अनजाने किसी भी चोरी की चीज का इस्तेमाल करते हुए पकड़े जाने वाले शख्स के खिलाफ कानूनन ‘बंधक’ का कार्यवाही की जाती है. इसके तहत पुलिस हिरासत में लिए गए शख्स को जेल तो नहीं भेजती है. मगर उससे लिखित रूप में एक कानूनी शपथ-पत्र जिसे पुलिसिया भाषा में ‘बॉन्डडाउन’ कहा जाता है, भरवा लेती है.

ताकि जब भी असली मुलजिम पुलिस द्वारा पकड़ा गया. या फिर कानूनी रुप से पुलिस को कभी भी उस शख्स की जरूरत गवाही के लिए महसूस हो, जिसके कब्जे से किसी अन्य अपराधी द्वारा चोरी या झपटी गई वस्तु (मोबाइल इत्यादि) जब्त या बरामद हुई थी, पकड़ा जाए तो अदालत में, उस शख्स को जिससे माल बरामद हुआ, असली मुलजिम के खिलाफ गवाह बनाकर कोर्ट में खड़ा किया जा सके. यह तमाम कानूनी प्रक्रिया सीआरपीसी की धारा 41-ए के तहत पुलिस द्वारा अमल में लाई जाती है.

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