कांग्रेस की चुनावी रणनीतियों की खामियों को दूर करने के साथ क्या पीके पार्टी नेतृत्व की स्थिति मजबूत कर सकेंगे?

Prashant Kishor Rahul Gandhi

मरणासन्न कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए प्रशांत किशोर के खाके की रूपरेखा हाल के दिनों में उनके कई इंटरव्यू के माध्यम से सामने आ चुकी है. साक्षात्कार के मुख्य बिंदु हैं; हिंदुत्व के आकर्षण को जरूरत से ज्यादा करके आंका जा रहा है. एक ज्यादा आकर्षक वैकल्पिक मॉडल पेश करके भाजपा के कल्याणकारी नीतियों का आसानी से काट निकाला जा सकता है. कांग्रेस को अपने निर्णय लेने की क्षमता को और विस्तृत करने की जरूरत है. कांग्रेस बीजेपी को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चल कर आसानी से पटखनी दे सकती है. उसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे पार्टी के प्रतीकों की भूमिका के बारे में अपने काडर को बता कर उनमें और जनता में एक नई जागरुकता लाने की जरूरत है. कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के प्रति पहले से ज्यादा उदारता दिखानी होगी.

संक्षेप में, प्रशांत किशोर कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी की तरह देखते हैं जिसमें बीजेपी के एजेंडे से दिगभ्रमित हुए बगैर अपने रास्ते पर चलते हुए अपने खोए हुए जनाधार को आसानी से दोबारा प्राप्त कर लेने की क्षमता है. पार्टी को अपनी विचारधारा का ही पालन करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी विचारधारा के मूल तत्व जमीनी स्तर तक पहुंचें. पीके कांग्रेस को अपने गौरवशाली अतीत की यादों में खोने के बजाय वर्तमान राजनीतिक गतिशीलता के हिसाब से एक व्यावहारिक संगठन के रूप में उभरते देखना चाहते हैं.

निश्चित रूप से कांग्रेस के पुनरुद्धार के लिए इस तरह के विचारों को व्यक्त करने वाले प्रशांत अकेले शख्स नहीं हैं. 2014 से पार्टी के पतन की शुरुआत के बाद से कांग्रेस के भीतर और बाहर कई लोग इसी तरह के विचार पेश करते रहे हैं. लेकिन दूसरों के विपरीत, पीके के बताए रोडमैप में अधिक वजन है. उनके पास अलग-अलग तरह के राजनीतिक दलों की सफलता में शानदार भूमिका निभाने का रिकॉर्ड है. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता के लिए गंभीर बातचीत शुरू होने पर क्षेत्रीय दलों में उनके कनेक्शन कांग्रेस के लिए एक बड़ा बरदान साबित हो सकते हैं.

कांग्रेस प्रशांत किशोर के विचारों से सहमत नजर आती है

उन्हें चुनाव के वक्त संख्या बढ़ाने या घटाने के काम में और मतदाताओं का मूड पहचानने में बेमिसाल माना जाता है. वैसी योजनाओं को लागू करने में कांग्रेस पीके को एक प्रभावी एजेंसी के रूप में देखती है जो गांधी परिवार समेत दूसरे कांग्रेस में रहते हुए नहीं पूरा कर पाते. इसी में चुनाव रणनीतिकार का महत्व सामने आता है और इसलिए कांग्रेस प्रशांत किशोर के विचारों से सहमत नजर आती है. पांच राज्यों के चुनावों के आए नतीजे अगर अलग होते तो कांग्रेस पीके को दोबारा साथ लेने के बारे में नहीं सोचती. चुनाव में बुरी तरह से पराजय ने कांग्रेस को पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए पीके के उपायों को लागू करने को मजबूर किया. पार्टी ने महसूस किया है कि किशोर की पार्टी को प्रभावित करने वाली बीमारियों के इलाज का तरीका विवादित हो सकता है, मगर बीमारी को पकड़ने की उनकी तकनीक सचमुच बेजोड़ है. एक चुनावी रणनीतिकार को शामिल करने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी उनके ब्लूप्रिंट को लागू करने के लिए उन्हें कितनी आजादी देने को तैयार है.

किशोर की नई पारी अब कांग्रेस के एक हिस्से के रूप में होगी

10 मार्च के चुनाव परिणामों के बाद लगता है कि कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि देश में मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उसकी स्थिति को क्षेत्रीय दल कड़ी चुनौती दे रहे हैं. कांग्रेस के भीतर गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं. G-23 नेता स्पष्ट रूप से सामने आए हैं. किशोर को कांग्रेस की चुनावी रणनीतियों की कमजोरियों को दूर करने के साथ पार्टी नेतृत्व की स्थिति को मजबूत करने के एक साधन के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने क्षेत्रीय नेताओं के साथ काम करके अपने इस काबलियत को कई बार सिद्ध किया है. यह साफ है कि किशोर की नई पारी अब कांग्रेस के एक हिस्से के रूप में होगी न की पहले की तरह केवल सलाहकार के रूप में.

किशोर के कांग्रेस में महासचिव के रूप में शामिल होने की चर्चा तेज

अप्रैल में पार्टी में इस बात की जोरदार चर्चा थी कि किशोर कांग्रेस में महासचिव के रूप में शामिल होंगे. घोषणा होने ही वाली थी लेकिन अंतिम समय में उसे रद्द कर दिया गया. तब कांग्रेस और पीके दोनों ने ही कहा कि वे पार्टी में शामिल होने के कगार पर हैं. उन्हें अब भी महासचिव बनाया जा सकता है लेकिन यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किशोर ने पार्टी में किसी विशिष्ट पद की मांग नहीं रखी है; उन्होंने 2024 के लिए अपनी योजना को लागू करने की पूरी आजादी जरूर मांगी है. यदि उन्हें वास्तव में यह अधिकार दिया जाता है तो यह उन्हें गांधी परिवार के बाद पार्टी में सबसे शक्तिशाली नेता बना देगा, चाहे उन्हें कोई भी पद मिले. पीके गांधी परिवार के साथ दो साल से अपने विचारों पर चर्चा करते रहे है और बताया जाता है कि दोनों पक्षों ने 90 फीसदी मुद्दों पर सहमति जताई है. बाकी बचे 10 फीसदी पर उनकी बातचीत पिछले सितंबर में टूट गई. उन्होंने जमीन पर काम करने से पहले अपनी रणनीति कि व्यापक रूपरेखा सामने रख दी है.

हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की बहस पर न पड़े कांग्रेस

चुनावी रणनीतिकार ने पहले कई साक्षात्कारों में यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा के हिंदुत्व का मुद्दा चुनावी रूप से उतना शक्तिशाली नहीं है जितना कि बताया जा रहा है. चुनावी आंकड़ों का हवाला देते हुए उनका तर्क है कि दो हिंन्दुओं में से एक ने ही भाजपा को वोट दिया. इसलिए, कांग्रेस को उनकी सलाह हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व पर बहस में नहीं पड़ने की होगी. उन्होंने जो खाका दिया है उसमें कथित तौर पर कांग्रेस को स्वतंत्रता संग्राम के अपने राष्ट्रवाद के प्रतीकों की यादों को दोबारा जनता तक ले जाने और भाजपा के प्रचार का अधिक आक्रामक रूप से मुकाबला करने का सुझाव है.

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