ऑपरेशन कमल और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स, दक्षिण भारत से शुरू हुई थी दलबदल की राजनीति

Operation Kamala

रामकृष्ण उपाध्याय:- इन दिनों की “रिसॉर्ट राजनीति” की बड़ी चर्चा है. महाराष्ट्र (Maharashtra) में शिवसेना (Shiv Sena) के बागियों द्वारा यह बेहद मनोरंजक राजनीति खेली जा रही है, जिसकी वजह से उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली तीन-पार्टियों वाली गठबंधन सरकार पतन के कगार पर है. यह राजनीति लोगों का ध्यान खींच रही है, ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कहां और कब भारतीय लोकतंत्र का ऐसा “विकास” हुआ. यह कैसे शुरू हुआ?

जिस तरह इतिहास हमें बताता है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान में) सिंधु घाटी सभ्यता के उद्गम स्थल थे, उसी तरह भविष्य के इतिहासकार निश्चित रूप से यह बताएंगे कि वास्तव में रिसॉर्ट राजनीति का उद्गम स्थल “नम्मा चेलुवा कन्नड़ नाडु”, कर्नाटक (Karnataka) है. जिसने सत्ता के स्वार्थी खेल की शुरुआत की और भारतीय राजनीति को पुनर्परिभाषित किया.

शानदार शुरुआत

मूल रूप से रिसॉर्ट राजनीति की शुरुआत अच्छे के लिए हुई थी, क्योंकि इसके कारण केंद्र द्वारा अन्यायपूर्ण तरीके से भंग की गई एक लोकप्रिय सरकार की बहाली हुई थी. यह अभिनेता से नेता बने एनटी रामाराव की सरकार थी, जिसने जनवरी 1983 में “आत्म गौरवम” (स्वाभिमान) के मुद्दे पर चुनाव जीतकर भारतीय राजनीति में एक नया मुकाम हासिल किया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कठपुतली राज्यपाल राम लाल का उपयोग कर बहुमत प्राप्त तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की सरकार को हटा दिया था. रामाराव हार्ट सर्जरी के लिए अमेरिका में थे. उस समय 15 अगस्त 1984 को इंदिरा गांधी ने गुप्त रूप से तेलुगु देशम के दलबदलू नडेंदला भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया. इस कदम से आंध्र प्रदेश की जनता का गुस्सा फूट पड़ा और वे सड़कों पर उतर आए. जब एनटीआर बाईपास ऑपरेशन के बाद लौटे, तो वे व्हीलचेयर पर सीधे राष्ट्रपति भवन गए और भारत के राष्ट्रपति के सामने अपने 181 विधायकों की परेड की.


भारतीय राजनीति में वे नाटकीय दिन थे. पूरी मीडिया और अधिकतर विपक्षी दलों ने एनटीआर के साथ अभूतपूर्व एकजुटता दिखाई थी. दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन के बाद, एनटीआर का दल कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े के निमंत्रण पर बेंगलुरु के पास नंदी हिल्स में चला गया था, ताकि उन्हें भास्कर राव समूह द्वारा अपहृत होने से “बचाया” जा सके. राजनीतिक उथल-पुथल जारी रही. आंध्रप्रदेश में रामाराव के समर्थन में बड़े पैमाने पर रैलियां, पुलिस फायरिंग, लाठीचार्ज और यहां तक कि कुछ एनटीआर समर्थकों द्वारा आत्महत्याएं देखी गईं. इस बीच टीडीपी विधायक नंदी हिल्स में कर्नाटक के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े के ‘मेहमान’ बने रहे.


हालात के नियंत्रण से बाहर जाने की धमकी के बीच, आखिरकार इंदिरा गांधी को झुकना पड़ा और उन्होंने राम लाल की जगह शंकर दयाल शर्मा को राज्यपाल बनाया. शर्मा ने बहुमत साबित करने में विफल रहने के लिए भास्कर राव कैबिनेट को बर्खास्त कर दिया और एनटीआर को एक बार फिर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. विजेता एनटीआर अपनी दूसरी पारी शुरू करने के लिए चरण सिंह, शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला और वेंकैया नायडू जैसे विपक्षी दिग्गजों के साथ हैदराबाद लौटे.

एनटीआर ने इतिहास बनाया

किसी न किसी बहाने से ‘विपक्षी’ सरकारों को बर्खास्त करना उन दिनों आम बात थी. लेकिन एनटीआर ने न्यायिक हस्तक्षेप या नए चुनाव के माध्यम के बजाए जनआंदोलन की ताकत से दोबारा सत्ता में लौटकर इतिहास रच दिया. हालांकि, सरकार के बहुमत का परीक्षण, राजभवन या राष्ट्रपति भवन के बजाए विधानसभा के पटल पर अनिवार्य करने का चलन, एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद आया. इस निर्णायक दौर के दौरान, कर्नाटक के नंदी हिल्स ने देश में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी.

लेकिन, तब से ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ कई दूसरे राज्यों में फैल चुकी है और इसका ज्यादातर इस्तेमाल सत्ता के भूखे विधायक कर रहे हैं. पैसा और मंत्री पद ऑफर देकर सत्ता हथियाने या बचाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है. चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अब ‘आत्म गौरवम’ की परवाह नहीं है और यह चुनावी ‘निवेश’ पर शानदार रिटर्न पाने का जरिया बन गया है. दूसरी ओर, जनता ने भी भ्रष्टाचार को सार्वजनिक जीवन का हिस्सा मान लिया है. ऐसा लगता है कि कर्नाटक, खास तौर पर बेंगलुरु, देश के राजनीतिक दलों के लिए अपने विधायकों का हफ्तों तक “मनोरंजन” कराने का एक पसंदीदा स्थान बन गया है. जब तक पिछले दरवाजे से कोई डील नहीं हो जाती.

जेडी(एस) ने इस राजनीति को आगे बढ़ाया

रिसॉर्ट राजनीति में इस नए चलन ने शायद तब गति पकड़ी जब 2004 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु जनादेश आया. बीजेपी पहली बार 90 सीटें जीतकर सत्ता के करीब आई. लेकिन यह बहुमत से कम था. एसएम कृष्णा के नेतृत्व वाली सत्ताधारी कांग्रेस सरकार 65 सीटों पर सिमट गई और जनता दल (सेक्युलर) ने 58 सीटों पर जीत हासिल की. कांग्रेस और जद(एस) दोनों ने बीजेपी को “अछूत” माना और सरकार बनाने पर बातचीत शुरू कर दी. एचडी देवेगौड़ा ने जद(एस) को एक रीजनल पार्टी के रूप में स्थापित करने के अवसर को भांपते हुए, अपने विधायकों को बीजेपी या कांग्रेस द्वारा से बचाने के लिए रिसॉर्ट में भेजा. उन्होंने लगभग एक महीने तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कड़ी सौदेबाजी के बीच उलझाए रखा. उन्हें अपनी पसंद के मुख्यमंत्री धर्म सिंह बनाने के लिए राजी किया और अपने वफादारों के लिए कई अहम मंत्रालय हासिल करने में कामयाब भी रहे.


वैसे तो डेढ़ साल से धरम सिंह अहम फैसलों पर देवेगौड़ा से ही ‘आदेश’ ले रहे थे, लेकिन गौड़ा ने अपने दूसरे बेटे एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तख्तापलट की एक शानदार योजना बनाई. उन्होंने सोनिया गांधी को विश्वास दिलाया कि कुमारस्वामी ने उनके खिलाफ बगावत कर दी है. और 40 विधायकों को अपने साथ ले गए हैं. इस तरह वह धरम सिंह सरकार के पतन का कारण बने. कुमारस्वामी ने वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए बीजेपी नेता बीएस येदयुरप्पा को गुप्त बातचीत में शामिल किया. जेडीएस और बीजेपी ने अपने-अपने विधायकों को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया. जहां कुमारस्वामी ने गोवा में अपना दल भेजा, वहीं बीजेपी ने अपने विधायकों को चेन्नई और महाबलीपुरम में भेज दिया. इस बीच, गौड़ा ने कुमारस्वामी के कदम को सार्वजनिक रूप से अस्वीकार कर दिया और विधानसभा अध्यक्ष कृष्णा को पत्र लिखकर कहा कि वह पार्टी से बागी विधायकों को निकाल रहे हैं. लेकिन निजी तौर पर गौड़ा के वफादार कृष्णा को जद(एस) के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू न करने के लिए कहा गया.


हालांकि, बीजेपी के पास 90 विधायक और जद(एस) के पास 58 विधायक थे, येदयुरप्पा ने कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाना स्वीकार कर लिया और उपमुख्यमंत्री के रूप में उनके अधीन काम करने के लिए सहमत हो गए. असल में बीजेपी राज्य में पहली बार सत्ता का स्वाद चखने के लिए बेताब थी. कुमारस्वामी 20 महीने बाद येदयुरप्पा को सत्ता सौंपने के लिए सहमत हो गए थे, लेकिन गौड़ा ने बीजेपी के साथ संबंध तोड़ने के लिए हस्तक्षेप किया. इसका खुलासा उन्होंने बाद में किया. उनके मुताबिक, वह कर्नाटक में एक “सांप्रदायिक पार्टी” के विस्तार को बढ़ावा नहीं देना चाहते थे! जब राज्य में मध्यावधि चुनाव हुए, तो येदयुरप्पा ने लोगों से समर्थन की अपील की और कहा कि उन्हें जेडीएस ने “धोखा” दिया है. लोगों ने बीजेपी का समर्थन किया और पार्टी को 110 सीटें देकर सत्ता के मुहाने पर ला दिया, हालांकि यह अभी भी बहुमत से तीन कम था.

ऑपरेशन कमल की उत्पत्ति

2008 में, खनन कारोबारी गली जनार्दन रेड्डी, जिन्होंने बीजेपी में प्रमुख भूमिका निभाई थी, को बहुमत हासिल करने के लिए विधायकों को जुटाने का काम सौंपा गया. रेड्डी ने कर्नाटक की राजनीति में ‘ऑपरेशन कमल’ का एक नया अध्याय शुरू किया. येदयुरप्पा के कहने पर उन्होंने न केवल तीन, बल्कि 15 विधायक जुटा लिए थे. ये सब कांग्रेस और जेडीएस से अलग हुए विधायक थे. इन विधायकों को बेहतरीन रिसॉर्ट्स और पांच सितारा होटलों में शानदार सुविधाएं दी गईं. येदयुरप्पा ने उन्हें इस्तीफा दिला दिया और बाद में उनमें से अधिकतर को बीजेपी के टिकट पर फिर से चुनाव लड़ाया और उन्हें मंत्री बना दिया. हालांकि, इससे उनकी पार्टी में नाराजगी भी फैली. 2004, 2006, 2008, 2009 और 2012 में अस्थिर सरकारों के बीच कर्नाटक में रिसॉर्ट राजनीति का चरम देखा गया और कांग्रेसी नेता भी इस खेल में शामिल हुए. मौजूदा केपीसीसी अध्यक्ष डीके शिवकुमार, उनके भाई, डीके सुरेश, एमबी पाटिल, रोशन बेग, केजे जॉर्ज सहित कई दूसरे नेताओं का इस्तेमाल कांग्रेस ने कई बार, न केवल कर्नाटक के विधायकों, बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों के विधायकों की सुरक्षा के लिए किया.


2013 से 2018 तक सत्ता में रही सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार अपेक्षाकृत स्थिर थी, लेकिन 2018 में एक खंडित फैसले ने फिर से राजनीतिक अनिश्चितता पैदा कर दी और पार्टियों ने रिसॉर्ट राजनीति का सहारा लिया. बीजेपी को इस बार 104 सीटें मिलीं और येदयुरप्पा को राज्यपाल वजुभाई वाला ने शपथ दिलाई और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का पर्याप्त समय दिया. लेकिन, शिवकुमार चट्टान की तरह खड़े रहे और अपने विधायकों को टूटने से बचाया. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद येदयुरप्पा को सत्ता संभालने के तीन दिनों के भीतर इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन, येदयुरप्पाने एक बार फिर कांग्रेस और जद(एस) के 17 विधायकों को तोड़ दिया. उनमें से कई को करीब एक महीने के लिए मुंबई ले जाया गया और वह जद(एस)-कांग्रेस गठबंधन सरकार को गिराने में सफल रहे. और अपने राजनीतिक जीवन में चौथी बार सत्ता में लौट आए. समय-समय पर गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों के नेताओं ने कर्नाटक की सेवाएं लीं. 2017 में, डीके शिवकुमार और डीके सुरेश ने गुजरात कांग्रेस के 44 विधायकों को बीजेपी से दूर रखने के लिए मेजबान की भूमिका निभाई और राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल की बारीक जीत सुनिश्चित की.


मार्च 2020 में, जब मध्यप्रदेश के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ बगावत किया, तो उनके 19 वफादार विधायकों ने बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में तब तक शरण ली जब तक कि कमलनाथ सरकार ने हार नहीं स्वीकारा. बाद में बीजेपी ने सिंधिया को पुरस्कृत किया और नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया. एक ऐसा पोर्टफोलियो जिसे उनके पिता माधवराव सिंधिया ने सितंबर 2001 तक संभाला था, जब एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी. रिसॉर्ट राजनीति में कर्नाटक की दागदार छवि इतनी ‘लोकप्रिय’ हो गई है कि विधानसभा चुनावों में एक खंडित फैसले के बाद केरल पर्यटन बोर्ड के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने ट्वीट किया था, “#कर्नाटक के फैसले के बाद, हम सभी विधायकों को देवताओं के इस स्थान पर सुरक्षित और सुंदर रिसॉर्ट्स में आराम के लिए आमंत्रित करते हैं.” हालांकि, बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया. खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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