अशर सिंड्रोम: ये जेनेटिक समस्या कर देती है अंधा और बहरा, कोई इलाज भी नहीं

Usher syndrome

एक ऐसी बीमारी भी है जो आपको अंधा और बहरा कर सकती है. इस बीमारो को अशर सिंड्रोम कहते हैं. ये एक जेनेटिक समस्या है. जिसमें सुनने और देखने की क्षमता खोने का डर रहता है. हालांकि यह दुर्लभ है. लेकिन इंसान में बहरे और अंधेपन का सबसे आम कारण है. इस बीमारी में रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा हो जाता है. ये आंख की एक समस्या है जो समय के साथ आंखों के रेटिना के नुकसान का कारण बनती है. आंखों को देखने में सक्षम बनाने के लिए रेटिना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, अगर रेटिना को किसी तरह का नुकसान पहुंचता है तो आंखों को दृष्टि संबंधी समस्याएं होने लगती हैं.

ईएनटी एशियन हॉस्पिटल फरीदाबाद के सीनियर कंसल्टेंट डॉ स्वप्निल ब्रजपुरिया ने TV9 को बताया कि अशर सिंड्रोम माता-पिता से उनके बच्चों में आती है. डॉ ब्रजपुरिया ने कहा यह बच्चों को विरासत में तब मिलता है, जब माता-पिता दोनों में म्यूटेड जीन होता है. जब माता-पिता दोनों में एक असामान्य जीन हो तो गर्भावस्था के दौरान चार में से किसी एक बच्चे को अशर सिंड्रोम होने का संभावना होती है. जिसकी आंशका प्रत्येक गर्भवास्था में बनी रहती है.

अध्ययनों से पता चलता है कि 100,000 बच्चे में से लगभग चार से 17 प्रतिशत अशर सिंड्रोम के साथ पैदा होते हैं. जबकि कुछ लोगों का मानना है कि जिनको सुनने में दिक्कत होती है अगर उनकी आबादी पर गौर करें तो अशर सिंड्रोम का वास्तविक प्रसार करीब 17 प्रतिशत है. भारत में अशर सिंड्रोम की आबादी को लेकर डाटा की कमी है. लेकिन फिर भी करीब 78,000 व्यक्तियों के इससे प्रभावित होने का अनुमान है.

सिंड्रोम तीन प्रकार के होते हैं

अशर सिंड्रोम टाइप 1 से जूझने वाले शिशुओं में संतुलन बनाने की समस्या के साथ-साथ कम सुनने की क्षमता का गंभीर होने या फिर बहरापन शामिल है. ऐसे में अधिकांश बच्चे 18 महीने के होने से पहले चलना भी शुरू नहीं करते हैं. ऐसे बच्चे आमतौर पर 10 साल की उम्र के आसपास दृष्टि हानि का समस्या का अनुभव करने लगते हैं. जो समय के साथ-साथ बढ़ता ही जाता है.

अशर सिंड्रोम टाइप 2 वाले बच्चे मध्यम से गंभीर श्रवण हानि के साथ पैदा होते हैं. इन्हें आमतौर पर संतुलन बनाने में समस्या नहीं होती है. लेकिन किशोरावस्था में इनके देखने की क्षमता प्रभवित होनी शुरू हो जाती है जो उम्र बढ़ने के साथ बिगड़ती चली जाती है.

अशर सिंड्रोम टाइप 3 बहुत दुर्लभ है. ये सभी मामलों में से केवल दो प्रतिशत लोगों में देखने को मिलता है. इसमें जन्म के समय श्रवण हानि और दृष्टि हानि की समस्या कम होती है. यह आमतौर पर बचपन में ही कुछ समय बाद शुरू होता है और दृष्टि हानि किशोरावस्था में शुरू होती है. इसके अलावा टाइप 3 में भी बच्चों में संतुलन बनाने की समस्या होती है.

अशर सिंड्रोम में बीमारी के लक्षण उसके टाइप पर आधारित होते हैं. इस स्थिति में इसके कई टाइप और सब-टाइप होते हैं. एक व्यक्ति की संतुलन की क्षमता उसकी आंखों और आंतरिक कान द्वारा संचालित होती है. अगर इन्हें किसी भी तरह का नुकसान होता है तो इसका परिणाम ये होगा कि संतुलन और संचालन के साथ परेशानी होने लगेगी.

क्या है इसका इलाज है?

इसमें कॉक्लियर इम्प्लांट, सुनने का यंत्र, श्रवण प्रशिक्षण, कम दिखने पर उसके सहायक विकल्प, भाषण और व्यावसायिक चिकित्सा और गतिशीलता प्रशिक्षण शामिल है. जो एक लंबे स्वास्थ्य समस्या से निपटने में संतुलन और उसके लिए सलाह लेने में मदद करता है. डॉ. ब्रजपुरिया ने कहा, सुनने, देखने और संतुलन की समस्याएं समय के साथ खराब हो सकती हैं और बच्चे को निरंतर देखभाल और सहायता की आवश्यकता होगी, क्योंकि उसकी जरूरतें बदलती हैं.

इसका कोई रोकथाम नहीं है क्योंकि यह अनुवांशिक है

अशर सिंड्रोम विरासत में मिली स्थिति है, इसलिए इसे रोकने का कोई तरीका नहीं है. हालांकि, आनुवंशिक परीक्षण यह निर्धारित करने में मदद कर सकता है कि क्या आप और आपका साथी में सिंड्रोम के जीन हैं. ऐसी स्थिति में एक जेनिटिक काउंसलर सही व्यक्ति है जो आपकी संतानों में इस असामान्य जीन स्थानतरित करने के जोखिमों को समझने में आपकी सहायता करेगा.

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