अयोध्या महा मण्डपम विवाद के जरिए साउथ की पॉलिटिक्स में कितनी जगह बना पाएगी बीजेपी?

Jp Nadda

भारतीय राजनीति में एक और अयोध्या (Ayodhya) को लेकर माहौल गरमाने लगा है. शुक्र मनाइए कि यह नया अयोध्या उत्तर भारत में नहीं है और इस अयोध्या के साथ किसी मस्जिद का विवाद भी जुड़ा हुआ नहीं है. नाम है अयोध्या अश्वमेधा महा मण्डपम जो तमिलनाडु (Tamil Nadu) की राजधानी चेन्नई में स्थित है. विवाद इसके सरकार द्वारा अधिग्रहण को लेकर है और इसी मुद्दे पर बीजेपी और डीएमके के बीच खींचतान (BJP DMK Controversy) शुरू हो गई है. वैसे तो राज्य में जब भी किसी मंदिर को हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एडोमेंट्स डिपार्टमेंट के तहत लाया जाता है तो विरोध होता है. लेकिन इस बार का मामला थोड़ा अलग है क्योंकि इसका संचालन करने वाले श्रीराम समाज के साथ बीजेपी आकर खड़ी हो गई है. बीजेपी ने इसे हिन्दू बनाम द्रविड़ राजनीति का मुद्दा बना दिया है.

बीजेपी तमिलनाडु में अपना पांव जमाने के लिए लंबे वक्त से संघर्ष कर रही है. लिहाजा अब इस बात को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई है कि चेन्नई स्थित पश्चिमी मंबालम के आर्य गौड़ा रोड पर बने अयोध्या महा मण्डपम के जिस विवाद को तूल दिया जा रहा है, क्या इसके जरिये बीजेपी दक्षिण भारत की राजनीति में अपनी हैसियत बढ़ाने में कामयाब हो सकती है? क्या बीजेपी के लिए एक और अयोध्या उसकी राजनीतिक सत्ता के लिए लकी होने जा रहा है? निश्चित रूप से इस बात पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इससे पहले जानना और समझना जरूरी है कि आखिर यह अयोध्या महा मण्डपम है क्या और इसको लेकर विवाद क्या है?

क्या है अयोध्या अश्वमेधा महा मण्डपम?

चेन्नई के पश्चिमी मंबालम में आर्य गौड़ा रोड पर स्थित है अयोध्या अश्वमेधा महा मण्डपम. कहा जाता है कि स्थानीय ब्राह्मणों ने 1950 के दशक में श्रीराम समाज की स्थापना की थी. इसके तहत एक कोष बनाया गया ताकि बड़े पैमाने पर रामनवमी का त्योहार मनाया जा सके. मौजूदा वक्त में श्रीराम समाज एक मंदिर, एक स्कूल और एक कम्युनिटी हॉल का संचालन करता है. श्रीराम समाज के इसी मंदिर का नाम है अयोध्या महा मण्डपम. जिस स्थान पर मंदिर बनाया गया इस बारे में कहा जाता है उसे कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने चुना था. श्रीराम समाज की वेबसाइट के अनुसार, शंकराचार्य इस जगह पर जब आए तो कुछ देर तक चहलकदमी करते रहे और फिर जमीन पर जिस जगह पर बैठे वहीं पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गईं.

कुछ लोग कहते हैं कि यहां राम की एक तंजौर पेंटिंग है उसी की पूजा होती है तो कुछ लोग कहते हैं कि मण्डपम में कुछ मूर्तियां स्थापित की गई हैं जिसकी विधिवत पूजा होती है. श्रीराम समाज संस्था के पूर्व अध्यक्ष एम.वी. रमाणी के मुताबिक, संस्था 100 फीसदी जनता के दान पर चलती है. इस संस्था के पास करीब 100 करोड़ से अधिक की संपत्ति है. विवादों से इतर हाल में अयोध्या महा मण्डपम की चर्चा इसलिए जोर-शोर से हुई थी क्योंकि बीते 1 अप्रैल 2022 को तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने 69वें रामनवमी कार्यक्रम का उद्घाटन किया था. इस दौरान उन्होंने कहा था कि हम महात्मा गांधी के उस सपने को सच करने की तरफ बड़ रहे हैं जब उन्होंने कहा था कि भारत में रामराज्य हो.

अयोध्या महा मण्डपम पर क्यों हो रहा विवाद?

अयोध्या महा मण्डपम पर विवाद दो चीजों को लेकर है. पहला यह कि यह मंदिर है या सिर्फ एक मंडप और दूसरा चढ़ावे में आने वाले पैसे और सोने का बंदरबांट. इन्हीं दो वजहों से अयोध्या महा मण्डपम के सरकारी अधिग्रहण की प्रक्रिया साल 2013 में तभी शुरू हो गई थी जब प्रदेश में डीएमके की धुर विरोधी एआईएडीएमके की सरकार थी और जे. जयललिता मुख्यमंत्री थीं. विवाद पहली बार साल 2013 में तब शुरू हुआ जब श्रीराम समाज के पूर्व अध्यक्ष एमवी रमाणी ने श्रीराम समाज में पैसे की हेराफेरी और टैक्स चोरी का आरोप लगाया. मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने रूलिंग दी कि अयोध्या महा मण्डपम को राज्य के हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एडोमेंट्स डिपार्टमेंट के तहत लाया जाए. डिपार्टमेंट ने रमाणी के आरोपों की जांच की.


कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विभाग ने यह भी पाया कि समाज ने मण्डपम में राम और सीता की मूर्तियां भी स्थापित की थीं जिनकी दिन में दो बार पूजा की जाती है. इसके आधार पर विभाग ने माना कि पूजा के नियमों के अनुसार अयोध्या महा मण्डपम एक मंदिर है. एचआरसीई डिपार्टमेंट की जांच के बाद कोर्ट के आदेश दिया कि श्रीराम समाज और अयोध्या मण्डपम के कामकाज की देखरेख के लिए विभाग एक उचित व्यक्ति की नियुक्ति करे. जब डिपार्टमेंट ने 31 दिसंबर 2013 को उचित व्यक्ति की नियुक्ति का निर्णय लिया तो श्रीराम समाज ने इस आदेश को चुनौती दी. इसपर हाईकोर्ट ने स्टे ऑर्डर दे दिया जो आठ साल तक बना रहा.


स्टे ऑर्डर की मियाद पूरी होने के बाद बीते 11 अप्रैल 2022 को कोर्ट ने स्टे हटाया और डिपार्टमेंट को आदेश दिया कि वह मण्डपम को अपने दायरे में ले. श्रीराम समाज ने इस पर ऐतराज जताया और मंदिर का कंट्रोल अपने हाथ में लेने गए सरकारी अधिकारियों को खदेड़ दिया. विरोध करने वालों में इलाके के लोगों के अलावा बीजेपी के कार्यकर्ता भी थे. अब ये विवाद आने वाले वक्त में क्या रूप लेगा यह सब अभी भविष्य के गर्त में है लेकिन इतना तो तय है कि बीजेपी दक्षिण भारत के इस अयोध्या को भी राजनीतिक चश्मे से देख रही है और पूरी कोशिश होगी कि मामले को 2024 के लोकसभा चुनाव में चुनावी मुद्दा बनाया जाए ताकि तमिलनाडु की राजनीतिक जमीन पर भी कमल खिल सके.

क्या बीजेपी के लिए यह अयोध्या भी लकी होगा?

अयोध्या महा मण्डपम का अधिग्रहण आज की तारीख में तमिलनाडु की राजनीतिक बिसात पर सत्तारूढ़ डीएमके और बीजेपी के बीच सियासी संग्राम का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने आरोप लगाया है कि मंदिर अधिग्रहण का यह खेल डीएमके सरकार की ओर से जानबूझ कर अयोध्या मण्डपम में होने वाले पूजा-पाठ, राम भजन और कीर्तन आदि के कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए किया जा रहा है. अन्नामलाई का मानना है कि अयोध्या मण्डपम के सरकारी अधिग्रहण का फैसला डीएमके सरकार की ओर से हिन्दुओं खासकर ब्राह्मणों को निशाना बनाने के लिए लिया जा रहा है. लेकिन बीजेपी इस बात को भूल रही है कि यह उत्तर प्रदेश का वो अयोध्या नहीं जिसमें बाबरी मस्जिद का टैग लगा था.


दूसरी अहम बात यह है कि बीजेपी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जीरो टॉलरेंस नीति पर काम करती है. श्रीराम समाज पर पैसों की हेराफेरी और टैक्स चोरी का आरोप है. ऐसे में बीजेपी श्रीराम समाज और अयोध्या महा मण्डपम के अधिग्रहण का विरोध कैसे कर सकती है. तीसरी अहम बात यह कि बीजेपी यह भी भूल रही है कि इस मंदिर का सरकारी अधिग्रहण पहली बार कोर्ट के आदेश पर 2013 में किया गया था. इसे सरकार के अधीन लाने का आदेश दिसंबर 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता की सरकार द्वारा जारी किया गया था. आदेश में तब कहा गया था कि श्रीराम समाज तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 6(20) के तहत एक सार्वजनिक मंदिर है. समाज के कुछ सदस्यों द्वारा मंदिर और धन के कुप्रबंधन की शिकायतों के बाद 2013 में यह आदेश जारी किया गया था. ये अलग बात है कि कोर्ट के स्टे-ऑर्डर की वजह से मामला 8 साल के लिए टल गया.


ये वही एआईएडीएमके है जिसके साथ बीजेपी 2021 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन में लड़ी थी और गठबंधन बुरी तरह से हार गई थी. बीजेपी को बामुश्किल चार सीटें मिली थीं. 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी को यह भूलना नहीं चाहिए कि जब पूरे देश में मोदी की लहर चलरही थी, तमिलनाडु में नरेंद्र मोदी जहां भी चुनाव प्रचार करने पहुंचते थे GoBackModi ट्रेंड करने लगता था. बीजेपी का वोट शेयर तमिलनाडु में 2014 में 5.56% था जो 2019 में घटकर 3.66% रह गया. बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 5 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन सभी को हार का सामना करना पड़ा था. इस तरह के सियासी चक्रव्यूह में यह कहना कठिन है कि बीजेपी की राजनीतिक सत्ता के लिए तमिलनाडु का यह अयोध्या भी लकी साबित होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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