अभी 2022 चला रहा है… लेकिन 1971 की जनसंख्या से ही क्यों होता है राष्ट्रपति चुनाव?

President Election

देश को जल्द ही नया राष्ट्रपति मिलने वाला है. राष्ट्रपति चुनाव (President Election) के लिए उम्मीदवारों का ऐलान हो चुका है और जल्द ही चुनाव होने वाले हैं. राष्ट्रपति चुनाव, भारत के आम चुनाव की तरह नहीं है, बल्कि इसके वोटिंग और वोट गिनने का तरीका काफी अलग है. इसमें खास तरह से राष्ट्रपति पद के चुनाव की प्रक्रिया पूरी जाती है. राष्ट्रपति चुनाव में हर वोटर के वोट की एक वैल्यू काउंट की जाती है और इस वैल्यू के आधार पर वोटों को गिनती होती है. यह वोटों की वैल्यू जनसंख्या के आधार पर निकलती है.

लेकिन, हैरानी की बात ये है कि वोट वैल्यू निकालने में जिस जनसंख्या का इस्तेमाल किया जाता है, वो आज की या 2011 की जनसंख्या नहीं है. बल्कि, ये जनसंख्या 1971 की है और उसके आधार पर ही वोट वैल्यू निकलती है. ऐसे में जानते हैं कि वोट वैल्यू कैसे निकाली जाती है और इसके लिए 1971 की जनसंख्या का इस्तेमाव ही क्यों किया जाता है.

1976 में बदला गया था नियम

बता दें कि जनसंख्या नियंत्रण को साल 1976 में संविधान में शामिल किया गया था और माना जा रहा था कि इससे जनसंख्या पर नियंत्रण आने लगा था. इसके बाद राज्य की जनसंख्या कम होने से सांसद और विधायकों के वोट वैल्यू की कम हो रही थी. इसके बाद एक संशोधन लाया गया और इसमें यह तय किया गया कि वोट वैल्यू की 1971 के हिसाब से ही की जाएगी. साथ ही यह भी कहा जाता है कि इमरजेंसी के दौरान दक्षिण भारत से उठ रही आवाजों को शांत करने के लिए इंदिरा गांधी ने 1976 में संविधान में 42वां संशोधन कर दिया और इस 42वें संशोधन को ‘मिनी-संविधान’ कहा जाता है.

इस दौरान इंदिरा गांधी सरकारी की ओर से राष्ट्रपति चुनाव के लिए बदलाव किया गया था कि जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को समवर्ती सूची में शामिल कर दिया गया. साथ ही अनुच्छेद 55 में यह एड कर दिया गया कि साल 2000 के बाद पहली जनगणना होने तक राष्ट्रपति चुनाव के लिए 1971 की जनगणना ही मान्य होगी. इसमें यह भी कहा गया था कि जब तक कि साल 2000 के बाद में कोई नई जनगणना का डेटा नहीं आ जाता है, तब तक 1971 की जनसंख्या को आधार माना गया.

2001 के बाद भी क्यों नहीं बदला नियम?

42वें संविधान संशोन में जो बदलाव किए गए थे उनके 30 साल बाद भी इन्हें बदला नहीं गया. फिर जब 2001 में जनसंख्या जनगणना के वक्त इसकी वैलेडिटी खत्म हो गई तो केंद्र में एनडीए की सरकार की थी. उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी देश के पीएम थे और उन्होंने भी इसमें बदलाव नहीं किया और इसे 2026 तक आगे बढ़ा दिया. बढ़ती आबादी के मद्देनजर राष्ट्रपति चुनाव का आधार भी नई जनसंख्या को बनाया जाए, लेकिन उस वक्त केंद्र में काबिज अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने संविधान में संशोधन कर बहस पर रोक लगा दी.इस वजह से बाद में भी बदलाव नहीं हुआ और आज भी 1971 के आधार पर ही वोट वैल्यू की गणना की जाती है.

एक वोट का मूल्य कैसे पता चलता है?

उसके क्षेत्र की जनसंख्या के क्षेत्र पर उसके वोट का मूल्य गिना जाता है. विधायक के वोट का मूल्य निकालने के लिए उस राज्य की कुल जनसंख्या में कुल विधायक का भाग दिया जाएगा और उस संख्या में 1000 का भाग दिया जाएगा. इसके बाद जो संख्या आएगी, वो उस राज्य के विधायक का वोट मूल्य होगा. इसमें जनसंख्या पुरानी ही काम में आ रही है.

Similar Posts